एमपी में कमलनाथ “कमल” खिलने से रोक पाएंगे?

एमपी में कमलनाथ “कमल” खिलने से रोक पाएंगे?


अब्दुल रशीद
 प्रधान संपादक,उर्जांचल टाइगर 

साल 1980 से मध्य प्रदेश के आदिवासी बाहुल्य जिले छिंदवाड़ा से लगातार सांसद रहे कमलनाथ को जब मध्यप्रदेश कांग्रेस की कमान सौंपा गया तब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उन्हें दोस्त कहा, तो पलट कर कमलनाथ ने शिवराज सिंह को नालायक दोस्त कह दिया,उस वक्त इस बात से शिवराज सिंह इतने घबरा गए कि वे भोपाल के नजदीक सीहोर की आमसभा में भीड़ से पूछते नजर आए कि बताओ, क्या मैं नालायक हूं. 

मध्यप्रदेश में कांग्रेस को जीत के लिए ऐसे नेता की जरुरत थी,जो न केवल केवल विपक्षी खेमें में हलचल पैदा कर दे बल्कि कांग्रेस के अन्दर की गुटबाजी को भी ध्वस्त कर,सबको एक जुट कर सके. कमलनाथ को अध्यक्ष बना कर कांग्रेस आलाकमान ने मजबूत कदम बढ़ाया है,मध्य प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर. इस बात को प्रदेश के अधिकांश बुध्दिजीवी वर्ग भी मानते हैं. 

गुटबाजी मध्य प्रदेश में कांग्रेस के हार की एक प्रमुख वजह रही है. ८० के दशक में यह गुटबाजी 4 गुटों में बंटी थी, अर्जुन सिंह गुट, विद्याचरण शुक्ला गुट, माधवराव सिंधिया गुट और कमलनाथ गुट. होता यह रहा के जिस गुट के लोग को टिकट मिलता था उसको हारने में बाकी लग जाते थे,नतीजा विपक्षी दलों को अपना पांव जमाने का पूरा मौक़ा मिलता रहा और कांग्रेस कमजोर होती चली गई. 

उस समय से अब तक मध्यप्रदेश कांग्रेस में जो भी होता था उसमे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दिग्विजय का सहमती होता ही था,यही वजह रही है प्रदेश का हर नेता दिग्विजय का लिहाज करता था,लेकिन इस लिहाज के खेल में कांग्रेस के चुनावी जीत का खेल बना कम बिगड़ा ज्यादा. कमलनाथ के अध्यक्ष बनने से अब दिग्विजय भी एक सूत्रीय कार्यक्रम के तहत कांग्रेस को एक जुट कर जीत दिलाने में लग गए हैं, हालांकि कमल नाथ को अध्यक्ष बनाने में उनकी सहमती रही है. 

इस बार प्रदेश में भाजपा सरकार से मध्यम व मजदूर वर्ग,कर्मचारी व किसान,युवा सभी सरकार से असंतुष्ट है,कारण शिवराज सिंह चौहान द्वारा दिया जाने वाला हर मर्ज की दवा, घोषणा. कड़वी दवा पी कर भी असर होता नहीं और मर्ज जस के तस बना हुआ है. अब तो और ज्यादा गंभीर हो चला है. 

शिवराज सिंह चौहान ने सिंगरौली जिले की घोषणा करते समय सिंगरौली वासियों को यह सपना दिखाया था के इस जिले को सिंगापूर बना देंगे,उस जिले का नाम दस साल बाद देश के सौ सबसे पिछड़े गांव में तीसरे स्थान पर दर्ज होगया.प्रदूषण की मार झेल रहें इस जिले को प्रदुषण मुक्त करने के प्रति सरकार कितनी गंभीर है इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है,की प्रदुषण नियंत्रण विभाग का कार्यालय उसी परियोजना के कैम्पस में खुलवा दिया गया,जिन्हें प्रदुषण के लिए जिम्मेदार माना जाता रहा है,बेरोजगारी का यह आलम है के संविदा पर नौकरी दिलाने के लिए भाजपा के नेताओं को भी परियोजना के अधीन कम्पनीयों के विरोध में आंदोलन करना पड़ रहा है. 

फिलहाल जो हालात है प्रदेश में वह कांग्रेस के पक्ष में दिखाई दे रहा है,इस सुनहरे मौके को जीत में तब्दील करने में मध्यप्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष कमलनाथ कोई कोर कसर छोड़ते नहीं दिख रहें. शिवराज सरकार पर लगातार सियासी वार और तीखे बयान ने प्रदेश में उन कार्यकर्ताओं में भी जान फूंक दिया है,जो सुसुप्ता अवस्था में निष्क्रिय थे,वे सभी अब दिखने लगें हैं. 

मध्यप्रदेश में भाजपा के किले को ढहाना इतना आसान भी नहीं है,वजह भाजपा के कार्यकर्त्ता प्रदेश के हर बूथ पर मौजूद हैं जबकि मौजूदा समय में कांग्रेस के पास ऐसी कोई टीम नहीं. हां कांग्रस कार्यकर्ताओं में जोश भरने वाला अध्यक्ष जरुर इस बार मैदान में अपनी पूरी ताक़त लगता हुआ नज़र आ रहा है,जिसके तेवर से मध्यप्रदेश भाजपा में हलचल दिख रही है. 

कमलनाथ के तेवर से जो मध्यप्रदेश कांग्रेस में जीत की उम्मीद दिखाई दे रही है वह परवान चढ़ेगा या नहीं यह तो भविष्य के गर्भ में है,लेकिन उनके अध्यक्ष बनने से जो गुटबाजी ख़त्म हुई नजर आ रही है,इसको चुनाव तक कायम रखना कमलनाथ के लिए चुनौती होगा,साथ ही कार्यकर्ताओं में जोश भरना और इस बात को समझाना भी एक चुनौती होगा की इस बार आर या पार क्योंकि अबकी चुके तो फिर कभी नहीं. 

महज़ सेनापति के आसरे जंग नहीं जीती जा सकती है,जंग जितने के लिए सैनिकों को अपना सर्वश्रेष्ठ देना होता है,कमलनाथ के आसरे जीत का दिव्य स्वप्न यदि देख रहें हैं तो इस बात को लिख लीजिए,हार तय है.
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