खनन से सूख रही धरती की कोख

बालू,खनन,भूजल स्तर



विकास की आवश्यकता है लेकिन विनाश के कीमत पर तो विकास नहीं हो सकता।

अनीता वर्मा@उर्जांचल टाइगर
वर्तमान में किसी भी देश के विकास हेतु अर्थव्यवस्था को गति देना आवश्यक है।अर्थव्यवस्था को गतिशीलता प्रदान करने में आधारभूत संरचना महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। आधारभूत संरचना के अंतर्गत फ्लाईओवर, बाँँध,सेतु,सड़क आदि तत्व सम्मिलित है।ज्ञातव्य है कि सभी संरचनाओं के निर्माण में बालू की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।इसके अतिरिक्त व्यावसायिक और गैर व्यावसायिक इमारतों के निर्माण में भी बालू एक महत्वपूर्ण घटक है।

दरअसल बालू एक ऐसा तत्व है जो जल में घुलनशील नहीं होता है और सीमेंट के साथ मिलकर इमारतों, फ्लाईओवर आदि को मजबूती प्रदान करता है और मौसम के मार जैसे बरसात और आंधी से भी सुरक्षित रखता है, इसलिए भारत में आधारभूत संरचना के निर्माण से लेकर व्यावसायिक और गैर व्यावसायिक इमारतों का निर्माण होता है ।समस्या यह है कि बालू के दोहन का स्त्रोत तो नदियां है और नदियों से पर्यावरणीय मानकों का उल्लंघन कर बालू का दोहन व्यापक पैमाने पर हो रहा है।ऐसे में नदियां अपना मूलस्वरूप खोती जा रही है।

ध्यातव्य है कि पृथ्वी पर कोई च़ीज यूं ही नहीं है बल्कि अपनी उपयोगिता को लिए हुए है।इसी प्रकार नदियों के भी बहुद्देशीय उपयोग है ।कुछ तो हम सभी लोग जानते है जैसे नदी के जल को सिंचाई, पीने के लिए पानी,बिजली बनाने आदि के उपयोग के लिए इस्तेमाल किया जाता है।इसके अलावा भी नदी का एक महत्वपूर्ण कार्य है भूजलस्तर को बनाए रखना ,लेकिन कुछ वर्षों से जिस प्रकार नदियों से बालू का दोहन जारी है उससे कुछ नदियों में बालू समाप्त हो चुका है और कुछ में समाप्त होने के कगार पर है।

जैसे झारखंड के गोड्डा जिले में स्थित कझिया नदी को देखा जा सकता है।अवैध खनन से इस नदी का अस्तित्व तो संकट में है साथ ही प्राणियों का अस्तित्व भी संकट में है इसलिए कझिया को बचाने के लिए गोड्डा में लोग आंदोलन कर रहे है।दरअसल अवैध खनन के फलस्वरूप कझिया नदी बालू से महरुम हो चुकी है और सिंचाई और पेय जल के समक्ष संकट उत्पन्न हो रहा है क्योंकि भूजल स्तर भी काफी नीचे जा चुका है।ऐसे में स्थानीय लोगों के समक्ष आंदोलन के अतिरिक्त कोई मार्ग शेष नहीं है।

कुछ समय पूर्व कझिया नदी का एक ऐसा दृश्य दिखाई दिया जिसमें इस नदी के पानी में केवल पीली दिखाई दी।ऐसा लग रहा था कि यह नदी न होकर किसी गढ्ढे में जल को एकत्रित कर दिया गया है।ऐसे में यह पानी तो इस्तेमाल लायक था ही नहीं।जैसे केरल में भीषण बाढ़ के फलस्वरूप पानी तो चारों ओर था लेकिन इस्तेमाल लायक नहीं था। ज्ञातव्य है कि नदियों का महत्वपूर्ण कार्य भूजल स्तर को बनाए रखना भी होता है जिन क्षेत्रों से गुजरती है ,लेकिन अवैध खनन की सनक इस तरह हावी है कि केवल बालू उद्योग को चलाने पर तो ध्यान है लेकिन उसके दुष्प्रभाव पर ध्यान नहीं है।

पहला दुष्प्रभाव तो उस क्षेत्र में जल संकट का गहराना तय है।दूसरा नदियों में भी खाद्य श्रृंखला होता है वह भी प्रभावित होगा।तीसरा बालू का कार्य नदियों के जल को स्वच्छ करना भी है।ऐसे में बालू के अभाव में नदियों में केवल गंदा पानी ही नज़र आएगा।ऐसे में उस पानी को कैसे इस्तेमाल किया जा सकता है।चौथा नदियों में बालू नदियों के तटबंध को स्थिरता प्रदान करता है।जिससे नदियाँ एक निश्चित दिशा में प्रवाहित होती है ,लेकिन जिस प्रकार अवैध खनन हो रहा है और नदियों से बालू को निचोड़ लिया जा रहा है ।उससे नदियों में कटाव करने की प्रवृत्ति बढ़ती है।जो विनाश को आमंत्रित करता है।

ऐसा नहीं है कि भारत में अवैध खनन किसी एक राज्य ,एक नदी की समस्या है बल्कि लगभग सभी नदियों इसी संकट से जूझ रहे है।यमुना नदी के संदर्भ में देखेंं तो यही स्थिति है।दिल्ली आने से पूर्व ही यमुना के पानी को बांध बनाकर रोका गया है जिससे कारण कई किलोमीटर तक यमुना में पानी ही नहीं है।ऐसे में यहाँ तो यमुना नदी के अंदर से बालू का अवैध खनन किया गया जिसके परिणामस्वरूप नदी में बालू नाममात्र भी नहीं है जिसके कारण यह इलाका पानी के संकट से जूझ रहा है और कृषि प्रभावित हो रही है।

बिहार के डेहरी आन सोन में सोन नदी भी अवैध खनन से प्रभावित हो रही है।ऐसा नहीं है अवैध खनन से कोई एक नदी प्रभावित है बल्कि अन्य नदियाँँ जैसे घाघरा ,गंडक ,यमुना,टोंंस आदि अवैध खनन से प्रभावित है। अवैध खनन से आश्य निर्धारित सीमा से ज्यादा बालू का खनन करना जो नदियां के पारिस्थितिकी तंत्र से मनुष्यों द्वारा खिलवाड़ करना है ,लेकिन यह सोचने की आवश्यकता है कि हम नदियों को कुछ नहीं दे रहे है बल्कि उनसे ले रहे है।तो क्या नदियों से छेड़छाड़ कर मनुष्य अपने लिए संकट को निमंत्रण को निमंत्रण नहीं दे रहा है और साथ साथ उन पशु पक्षियों जो नदियों के जल को पेय जल के रुप में इस्तेमाल करते है उनके अस्तित्व को भी मनुष्य अपनी स्वार्थी नीति के कारण संकट में डाल रहा है।

विकास की आवश्यकता है लेकिन विनाश के कीमत पर तो विकास नहीं हो सकता।क्षणिक विकास भले ही कुछ समय के सुखद अनुभूति दे सकता है लेकिन दीर्घकालिक तो अंततः दुख के ही कारण बनेंगे।जैसे जल ही जीवन है अर्थात बिना पानी के जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है।यदि पानी की उपलब्धता सूखा पड़ने के कारण कम हो जाए और भूजलस्तर काफी नीचे चला जाए ।ऐसी स्थिति में तो पीने के पानी को प्राथमिकता दी जाएगी न की कृषि को और अन्य कार्यों को।ऐसा गुजरात के संदर्भ में देखा गया कि सरदार सरोवर डैम में पानी की कम उपलब्धता के कारण वहां के मुख्यमंत्री ने कहा कि किसान खेती नहीं करें।पानी का इस्तेमाल पेयजल के लिए उपलब्ध कराया जाएगा।यहाँ देखा जाए तो आवश्यकता तो जीवन के लिए सर्वप्रथम पेयजल को उपलब्ध कराना है लेकिन उसके पश्चात जीवन के लिए खाद्य फसलें भी आवश्यक है ।इसके साथ साथ वाणिज्यिक फसलें भी आवश्यक है और सभी फसलों हेतु जल की आवश्यकता होती है। ऐसे में यदि जल संकट गहराएगा तो विकास कैसे संभव है ?दक्षिण अफ्रीका के केपटाउन में कई वर्षों से सूखा पड़ने के कारण वहाँ भी पानी की राशनिंग भी की गई।

ऐसे में आवश्यता है कि देश में आधारभूत संरचना और गैर आधारभूत संरचना के कंस्ट्रक्शन हेतु भारी मात्रा में बालू का प्रयोग हो रहा है ।उसके स्थान पर वैकल्पिक तत्व की तलाश करनी चाहिए जिससे नदियों को बचाया जा सके।दूसरा अवैध खनन पर भी लगाम लगाना चाहिए क्योंकि इससे नदियों से कई गुना बालू निकाला जाता है।जिससें नदियों में या आसपास बालू दिखाई ही नहीं पड़ता है जिसके कारण नदी की जल को अवशोषित करने की क्षमता न के बराबर हो जाती है। इसका दुष्प्रभाव भूजलस्तर काफी नीचे चला जाता है । ज्ञातव्य है भारत में खेतों को जल पहुंचाने हेतु कई साधनों का प्रयोग किया जाता है जैसे तालाब ,नहर ,कुंआ,नलकूप आदि।उत्तर प्रदेश सरीखे राज्य में नलकूपों से अत्यधिक सिंचाई होती है।ऐसे में भूजल का स्तर नीचे जाने का अर्थ सूखे को निमंत्रण देगा। दूसरा भूजल के नीचे जाने का अर्थ पेयजल के समक्ष संकट उत्पन्न होना है क्योंकि आज भी भारत में ज्यादातर पेयजल हेतु जमीन के नीचे के जल को उपयोग में लाया जाता है।अतः आवश्यक है कि सरकारों और प्रशासन को इस मसलेे पर गंभीरता से विचार करना चाहिए ताकि आने वाले संंकटो से लोगों को बचाया जा सके।

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