हिन्दू मुस्लिम एकता की मिसाल : नातिया कलाम के हिन्दू शायर "तिलकराज पारस"

Independence2018,स्वतंत्रता दिवस विशेष,


अवधेश सिंह 
कवि –लेखक,पूर्व मीडिया अधिकारी भारत सरकार

हिन्दू धर्म में जिस तरह जगराता और भजन संध्या को जनमानस अध्यात्म और भक्ति से जुड़ा मन को शांति व संकल्प को संतोष देने वाला गीत संगीत से जुड़ा कार्यक्रम होता है वैसे ही मुस्लिम समुदाय में नात शायरी की हैसियत है । रमजान के मौके पर इसके आयोजन बहुतायत में होते हैं । उर्दू और फ़ारसी में इसे नात ए शरीफ़ कहते हैं यह इस्लामी साहित्य में एक पद्य रूप है, जिस में पैगंबर हज़रत मुहम्मद साहब की तारीफ़ करते लिखी जाती है, इस पद्य रूप को बडे अदब से गाया भी जाता है। अक्सर नात ए शरीफ़ लिखने वाले आम शायर को नात गो शायर कहते हैं और इसे महफिल में प्रस्तुत करने वाले को नात ख्वां कहते हैं। यह नात ख्वानी का चलन भारत, पाकिस्तान और बंगलादेश में आम है। भाषा के अनुसार उर्दू ,पश्तो, पंजाबी - सिंधी व बंगाली भाषा में नात ख्वानी प्रचलित है। अन्य मुस्लिम देशों में नात ख्वां तुर्की, फ़ारसी, अरबी, कश्मीरी भाषा में भी पढ़ी जाती है। 

देश में जहां कई जगहों पर छोटी-छोटी बातों को लेकर दोनों संप्रदायों के बीच जहर घोलने की कोशिश की जाती है, वहीं इससे इतर जबलपुर मध्य प्रदेश के निवासी तिलक राज पारस सांप्रदायिक सौहार्द की अनोखी पहल को अंजाम पिछले 40 सालों से कर रहें हैं । आश्चर्य होता है की मुस्लिम संस्कृति के इस धार्मिक और अध्यात्म से जुड़े लेखन में कोई एक शख्स है जो हिन्दू होकर भी इसमें रमा है और अपने तरीके से हिंदू मुस्लिम एकता की मिसाल कायम कर रहा है । 

नात शरीफ़, नात ए पाक शायर, नातिया कलाम के हिन्दू शायर ,तिलक राज पारस का शुमार हिंदोस्तान के बहुत ही मशहूर शायरों में होता है गैर मुस्लिम होते हुए भी उन्होने बेहद खूबसूरत नाते पाक कहें हैं । 23 जनवरी 1951 के जन्में, जिनका पूरा नाम तिलक राज तिलवानी है जो कि सिंधी समाज से आते हैं । शायर का उपनाम पारस रखा जो बाद में तिलक राज पारस के नाम से नात शायरी के पुख्ता स्तम्भ के रूप में दिख रहा है । इनके उस्ताद अब्दुल है अंजुम साहब थे और इनहोने इस आदाबी शायरी का सफर 1975 से शुरू किया । 

ऐसे वक्त जब वर्तमान सरकार “सेकुलर हिन्दू राष्ट्र” की अवधारणा में एक के बाद एक मुस्लिम समाज की दिक्कतों को दूर करते हुए विकास की मुख्य धारा से उन्हे जोड़ने का काम कर रही है तब हिन्दू शायर के द्वारा मुस्लिम समाज को नात शायरी के रूप में दिया जा रहा तोहफा राष्ट्र की इस अवधारणा को मजबूत कर रहा है । पिछले दिनों दिल्ली में उनसे हुई मुलाक़ात को आपके सामने रखते हुए हम मौजूदा सरकार की कोशिशों में एक शख्स की कोशिशों को भी जानने का प्रयास कर रहे हैं । 

अवधेश सिंह - ये नात शायरी है क्या । इसे हिन्दू समाज कि रूप में लेता है । 

पारस : नातिया शायरी हज़रत मोहम्मद की तारीफ और तौसीफ के लिये होती है हिन्दु शायर इसे भजन के जैसा पवित्र मानते हैं 

अवधेश सिंह - हिन्दू मुस्लिम एकता में इस शायरी कि क्या भूमिका है । 

पारस : कोई मुस्लिम जब हिन्दू शायर की लिखी हुई नात पढ़ता है तो वह भवविवहल होकर दोनों समुदाय के बीच की धार्मिक कटुता भुला कर एक होने का प्रयास करता है । दो समुदायों में परस्पर विश्वास व एकता का आधार इससे बढ़ता है 

अवधेश सिंह -जब आम शायर मोहब्बत और गम को शायरी का मुख्य विषय बनाते हैं तब आपने ये विषय परिवर्तन कब और कैसे किया । आपका रुझान इधर क्यों हुआ । 

पारस : मैंने अपनी खुली आँखों से हिन्दू मुस्लिम फसाद की भीषण लोमहर्षक खूनी तबाही देखी है अवसर वादी और अति महत्वकांक्षी व अतिवादी सोंच के कारण बेगुनाह मासूम लोगों का ख़ून सड़को पर बहता हुआ देख चुका हूँ । इसकी टीस ने मुझे प्रेरित किया तभी दोनों समुदायों में कटुता कम करे इसलिये मैंने नात को शायरी की विधा के रूप में चुना। 

अवधेश सिंह -चूंकि आप सरहदों से पार मुस्लिम देशों में भी नात से पहचाने जाते हैं जिसमें जिसमें अफगानिस्तान , पाकिस्तान , बांग्लादेश या कहें उर्दू भाषी एशिया के सभी देश आते हैं तब आप अपनी इस शायरी को किस रूप में आगे ले जाना चाहते हैं । 

पारस : दुनिया के बहुत मुल्क हैं मेरी नातिया शायरी के दीवाने हैं , बेशुमार मुस्लिम समाज के लोग हैं जो मुझे बड़ी इज़्ज़त की निगाह से देखते हैं तो मेरी कोशिश है की एक हिन्दू के रूप में हर मुस्लिम समाज तक शायरी के माध्यम से हमारी धार्मिक सहिशुणता का परिचय पहुँचे ताकि हम एकता के बँधन में इन्सानियत को पुर्न जीवित कर सकें। 

अवधेश सिंह -मशहूर नात “मेरी आँख रो रही है ॥ दुश्वार अब है जीना । मेरे रब मुझे दिखा दे एक बार तो मदीना । मेरी आँख रो रही है ........ऐसी नात जिसे लिखते वक़्त आपके जेहन में क्या था कि आप रो दिये थे । 

पारस : मेरे एहसास में नफरत की वो ज्वाला थी , जो दोनों समुदायों को जला रही है था जिससे मुझे रोना आ गया था 

अवधेश सिंह -इस गज़ल को लिखते समय आप में क्या विचार चल रहा था । “जाने हम इंसान हैं कैसे आपस में लड़ जाते है / एक शजर में कई तरह के पंक्षी रात बिताते हैं”। 

पारस : इस गजल को लिखते समय मेरे जेहन में वो फसाद थे जो मैंने जबलपुर नागपुर और सूरत में देखे थे । 

अवधेश सिंह -कुछ चुनिन्दा शायरी - 

पारस : देखिये मेरी लिखी कुछ शायरी :- 


दिल है बेताब नज़र खोई हुई लगती है 
ज़िंदगी दुख में बहुत रोई हुई लगती है 
तुझ को सोचों तिरी ताअत में रहूँ तो मुझ को 
ख़ुशबुओं से ये ज़मीं धोई हुई लगती है 
साँस लेते ही धुआँ दिल में उतर जाता है 
आग सी शय यहाँ कुछ बोई हुई लगती है 
सामने हश्र नज़र आता है लेकिन दुनिया 
ख़्वाब-ए-ग़फ़लत में अभी सोई हुई लगती है 
सब ज़फ़र-याब हुए अपने सफ़र में 'पारस' 
मेरी मंज़िल ही फ़क़त खोई हुई लगती है 


मुस्कुराते हुए फूलों का अरक़ सब का है 

उन के जल्वों से अयाँ है जो सबक़ सब का है 
जिस को पढ़ने से मिरी ज़ीस्त ज़िया-बार हुई 
उस पे तहरीर ख़ुदा की है वरक़ सब का है 
जितनी हाजत हो मियाँ उतना ही हिस्सा लेना 
अपने अतराफ़ के सामान पे हक़ सब का है 
मुट्ठियाँ भर के लहू मैं ने उछाला बरसों 
इस से तश्कील हुआ रंग-ए-शफ़क़ सब का है 
लोग किस तरह दिखाते हैं तबस्सुम की नुमूद 
रूह कजलाई है चेहरा भी तो फ़क़ सब का है ।


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