केजरीवाल का बिखरता कुनबा,संकटों के भंवर में ‘आप’

संकटों के भंवर में ‘आप’


केजरीवाल की राजनीति की शुरूआत दिल्ली के रामलीला ग्राउंड में अन्ना हजारे के आन्दोलन से हुई थी, जहां से वो ‘भ्रष्टाचार विरोधी योद्धा’ के रूप में उभरकर सामने आए थे।

योगेश कुमार गोयल
भाजपा विरोधी गठबंधन में घुसपैठ के लिए प्रयासरत दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल अब खुलकर कांग्रेस की खिलाफत में उतर आए हैं और स्पष्ट कर दिया है कि उनकी पार्टी भाजपा विरोधी इस महागठबंधन का हिस्सा नहीं होगी। मुख्यमंत्री ने दावा किया है कि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को मात्र 9 प्रतिशत वोट मिलेंगे और असली मुकाबला भाजपा तथा ‘आप’ के बीच ही होगा। भले ही मुख्यमंत्री इस प्रकार के बयान देकर अपने समर्थकों को यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि उनकी पार्टी कांग्रेस के साथ हाथ मिलाने नहीं जा रही है क्योंकि कांग्रेस के साथ दिखने का माहौल ‘आप’ की सेहत पर भारी पड़ रहा है। पार्टी नेतृत्व का कहना है कि पंजाब में उसका सीधा मुकाबला कांग्रेस से ही है और हरियाणा में वह भाजपा का विकल्प बनेगी, इसलिए कांग्रेस के साथ जाने का कोई औचित्य ही नहीं है किन्तु यह पार्टी जिस तरह नए-नए संकटों के भंवर में घिरती जा रही है, उसके मद्देनजर इस तरह के दावे ख्याली पुलाव पकाने से ज्यादा और कुछ नहीं लगते। 

एक ओर जहां 19 फरवरी को मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के आवास पर दिल्ली के मुख्य सचिव के साथ हुई मारपीट का मामला थमने का नाम नहीं ले रहा है, वहीं दूसरी ओर पार्टी के पंजाब कैडर में मचा घमासान ‘आप’ के जी का जंजाल बन गया है और रही-सही कसर एक-एक कर पार्टी से विदा हो रहे दिग्गज पूरी कर रहे हैं। लोकसभा चुनाव से ठीक पहले पार्टी के वरिष्ठतम नेताओं में से एक आशुतोष और उसके बाद आशीष खेतान द्वारा पार्टी से इस्तीफा देने के घटनाक्रम से भी पार्टी सकते में है। मुख्य सचिव के साथ मारपीट मामले में गत दिनों उस समय नया मोड़ आ गया, जब दिल्ली पुलिस ने अदालत में 1533 पन्नों का आरोप पत्र दाखिल किया, जिसमें मुख्यमंत्री केजरीवाल, उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया सहित 13 ‘आप’ नेताओं को आरोपी बनाया गया है। इसमें इन सभी आरोपियों पर सरकारी अधिकारी के साथ मारपीट, उसे बंधक बनाने, सरकारी कामकाज में बाधा डालने, अपराधिक साजिश रचने तथा सभी आरोपियों पर दंगे के उद्देश्य से एकजुट होने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। इसी मामले में केजरीवाल को दिल्ली की पटियाला हाउस अदालत से गत 25 अगस्त को झटका लगा है, जब अदालत ने इस मामले में पुलिस को मीडिया ब्रीफिंग न करने देने के आप विधायकों के अनुरोध को ठुकरा दिया। 

दिल्ली के इतिहास में यह पहला अवसर है, जब किसी मुख्यमंत्री के खिलाफ अदालत में इस प्रकार आरोप पत्र दाखिल किया गया है। गौरतलब है कि 19 फरवरी 2018 की रात मुख्यमंत्री आवास पर घटित इस घटना के वक्त वहां मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री तथा आप के 11 विधायकों के अलावा मुख्यमंत्री के तत्कालीन कानूनी सलाहकार वी के जैन, विधायकों के साथ समन्वय का कामकाज देख रहे विवेक यादव तथा केजरीवाल के निजी सचिव विभव कुमार को भी सरकारी गवाह बनाया है। इस चार्जशीट के बाद ‘आप’ की मुसीबतें बढ़ना तय है। कानून के जानकारों का मानना है कि यदि अदालत अगली सुनवाई में इस आरोप पत्र पर संज्ञान लेती है तो केजरीवाल सहित सभी 13 आरोपियों को जमानत लेनी होगी और यह अदालत के विवेक पर निर्भर करेगा कि वो इन्हें जमानत देती है या हिरासत में लेने का आदेश देती है। केजरीवाल के लिए इस मामले में थोड़ी राहत की बात यह अवश्य है कि विभव कुमार पुलिस के आरोप पत्र के बाद दिल्ली पुलिस की थ्योरी को ही पूरी तरह नकारते नजर आए हैं और साफ शब्दों में कह रहे हैं कि मुख्यमंत्री को बदनाम करने के लिए यह साजिश रची जा रही है। 

जहां तक पार्टी के कद्दावर नेता आशुतोष के इस्तीफे का सवाल है तो पार्टी के लिए उस वक्त शर्मनाक स्थिति उत्पन्न हो गई, जब पार्टी के राज्यसभा सांसद सुशील गुप्ता ने बगैर पार्टी नेतृत्व से सलाह मशविरा किए बयान दे डाला कि आशुतोष कुछ समय से पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल थे किन्तु जब पार्टी के मुखिया केजरीवाल ने आशुतोष का इस्तीफा स्वीकार करने से इन्कार करते हुए कहा कि वो इस जन्म में तो आशुतोष का इस्तीफा स्वीकार नहीं कर सकते, तब सुशील गुप्ता ने एकाएक पलटी मारते हुए आशुतोष से इस्तीफा वापस लेने की मांग करते हुए ट्वीट किया। आशुतोष भले ही केजरीवाल के बेहद करीबी माने जाते रहे हैं किन्तु राज्यसभा चुनाव के बाद से ही वे पार्टी नेतृत्व से नाराज थे। 

दिल्ली हो या पंजाब, हर कहीं सुशील गुप्ता सरीखे पार्टी से जुड़े वरिष्ठ लोगों की इस प्रकार की अति सक्रियता पार्टी की सेहत पर भारी पड़ती रही है। ‘आप’ के लिए निश्चित रूप से यह विड़म्बनात्मक स्थिति ही है कि चंद वर्षों पहले इस पार्टी के गठन में अहम भूमिका निभाने वाले कई प्रमुख सहयोगी अपनी उपेक्षा के चलते पार्टी से किनारा कर चुके हैं। कुमार विश्वास भले ही आज भी ‘आप’ का हिस्सा हैं किन्तु वे पार्टी के भीतर खुद को किनारे कर दिए जाने की वजह से अक्सर विभिन्न मंचों से नेतृत्व पर गंभीर निशाना साधते रहे हैं। ‘आप’ के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले प्रशांत भूषण ने जब 2015 के चुनाव के बाद नेतृत्व पर सवाल उठाए थे तो उन्हें पार्टी की पीएसी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। उन्हीं के साथ ‘आप’ की चुनावी रणनीति बनाने में अहम भूमिका निभाने वाले और पार्टी के थिंक टैंक माने जाते रहे योगेन्द्र यादव को भी बाहर निकाल दिया गया था, जिन्होंने बाद में ‘स्वराज पार्टी’ के नाम से एक नई पार्टी का गठन कर लिया था। ‘आप’ के बैनर तले 2014 का लोकसभा चुनाव लड़ने वाले प्रो. आनंद कुमार को 2015 में पार्टी विरोधी गतिविधियों के चलते पार्टी से निकाल दिया गया था। मंत्रालय बंटवारे से नाराज विधायक विनोद कुमार बिन्नी को 2014 में ही पार्टी से निकाला गया था। इसी प्रकार अन्ना आन्दोलन के समय से जुड़ी रही और बाद में ‘आप’ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का हिस्सा रही शाजिया इल्मी ने कुछ विवादों के बाद पार्टी छोड़ दी थी। ‘आप’ सरकार में मंत्री रहे कपिल मिश्रा को पार्टी से बाहर करने का मामला तो काफी चर्चित रहा है, जो 2017 में पार्टी से निकाले जाने के बाद से केजरीवाल और उनके प्रमुख सहयोगियों के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। 

केजरीवाल की राजनीति की शुरूआत दिल्ली के रामलीला ग्राउंड में अन्ना हजारे के आन्दोलन से हुई थी, जहां से वो ‘भ्रष्टाचार विरोधी योद्धा’ के रूप में उभरकर सामने आए थे। निरंकुश सत्ता और बेलगाम भ्रष्टाचार के खिलाफ उपजे इसी आन्दोलन के दौरान अन्ना हजारे के साथ मंच पर भारी शक्ति प्रदर्शन करने के बाद उन्होंने एक राजनीतिक पार्टी ‘आम आदमी पार्टी’ का गठन किया था और उस समय जिस तरह की घोषणाएं, दावे और वायदे किए गए थे, उससे हर किसी को लगने लगा था कि ‘आप’ दूसरी पार्टियों से हटकर भारतीय राजनीति में सुधार के लिए कुछ अलग करिश्मा करके दिखाएगी लेकिन किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि यह पार्टी कदम दर कदम सवालों के घेरे में घिरी नजर आएगी। दरअसल जब से केजरीवाल सरकार दिल्ली में प्रचण्ड बहुमत के साथ सत्ता में आई है, तभी से उसका और विवादों का चोली-दामन का साथ बना रहा है। 

पिछले साल पंजाब में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान ‘आप’ को मुंह की खानी पड़ी थी और तब कयास लगाए जाने लगे थे कि हर हार से सबक लेकर पार्टी की चाल, चेहरा व चरित्र बदलेगा किन्तु जिस प्रकार पार्टी के भीतर निरंतर असंतोष के स्वर बुलंद होते रहे हैं और दिल्ली हो या पंजाब, हर कहीं भारी उठापटक चलती रही है, उससे अक्सर जाहिर होता रहा है कि पार्टी का आंतरिक ढ़ांचा चरमराया हुआ है। 2014 के लोकसभा चुनाव में ‘आप’ ने 432 प्रत्याशी मैदान में उतारे थे किन्तु पार्टी को सिर्फ पंजाब में सफलता मिली, जहां उसे 4 सीटें हासिल हुई थी। 2017 के पंजाब विधानसभा चुनाव में ‘आप’ सरकार बनाने का मंसूबा संजोये थी किन्तु यहां वह उम्मीदों से काफी पीछे रही, हां, उसने भाजपा-शिअद गठबंधन को पीछे छोड़ते हुए 20 सीटें हासिल कर एक प्रमुख विपक्षी पार्टी बनने में सफलता अवश्य प्राप्त की थी किन्तु उसके बाद से ही पंजाब में जिस तरह के घटनाक्रम चल रहे हैं, वह पार्टी के भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं हैं। पिछले दिनों विक्रम मजीठिया पर नशा तस्करी के आरोप लगाने के मामले में केजरीवाल द्वारा माफी मांगने से नाराज पार्टी के पंजाब अध्यक्ष भगवंत मान द्वारा अपने पद से इस्तीफा देने के बाद पार्टी की काफी फजीहत हुई थी, हालांकि बाद में मान को मना लिया गया था लेकिन अब सुखपाल सिंह खेहरा को विधायक दल के नेता पद से हटाकर दलित कार्ड के नाम पर हरपाल चीमा को नेता प्रतिपक्ष बनाए जाने के बाद पार्टी दो गुटों में बंटकर रह गई है। खेहरा गुट केजरीवाल तथा आलाकमान पर पार्टी के मूल सिद्धांत ‘स्वराज’ को भुलाकर तानाशाही अपनाने का आरोप लगा रहा है। 

वैसे पंजाब हो या दिल्ली, केजरीवाल पर यह आरोप प्रायः लगते रहे हैं कि पार्टी में कुछेक लोगों का ही ख्याल रखा जाता है और इसी के चलते जनता से सीधे जुड़े मुद्दों से सरोकार रखने वाले नेताओं की अक्सर उपेक्षा होती है लेकिन इस प्रकार के आरोप बार-बार लगते रहते जाने के बावजूद पार्टी की ओर से कभी संतोषजनक जवाब नहीं मिला। संभवतः यही कारण हैं कि आधे से ज्यादा संस्थापक नेता पार्टी को अलविदा कह चुके हैं। इस प्रकार के घटनाक्रमों के चलते पार्टी की साख कमजोर हो रही है और इसका खामियाजा पार्टी को आगामी लोकसभा चुनाव में उठाना पड़ सकता है। 

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं)
Labels:
Reactions:

Post a Comment

MKRdezign

Contact Form

Name

Email *

Message *

Powered by Blogger.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget