झारखंडेश्वर महादेव के दरबार से कोई खाली नही लौटा

झारखंडेश्वर महादेव के दरबार से कोई खाली नही लौटा

नैसर्गिक सौंदर्य के बीच पर्यटन की हैं असीम संभावनाएं!
डॉ0 अशोक कुमार मिश्र 'विद्रोही'
चंदौली।। जनपद मुख्यालय से लगभग 32 किमी0 उत्तर धानापुर विकास खण्ड की ग्राम पंचायत अमादपुर में गंगा की गोंद में नयनाभिराम प्राकृतिक अटखेलियो के मध्य बसते हैं भूत भावन प्रलयंकर शंकर झारकण्डेश्वर महादेव। घने वृक्षों से पूरी तरह आच्छादित इस सुरम्य स्थल पर प्रकृति मानो खुद ब खुद शिव का श्रृंगार कर उनसे अटखेलियॉ करती प्रतीत होती है,17वीं शताब्दी के उत्तरार्ध मे इस स्व स्फूर्त शिव लिंग को मंदिर का रूप देने का श्रेय जाता है। धानापुर कस्बा निवासी मुकुंद रस्तोगी (कपड़ा वाले) के परदादा को जिसके पीछे वेहद रोमांचकारी व आत्ममुग्ध कर देने वाली एक कहानी है। इस शिव मंदिर के गर्भगृह के अंदर नंदी के ठीक पीछे दीवाल से सटा एक शिलालेख है जो अब तक अपठनीय है। अगर पुरातत्व विभाग की नजरें इनायत हो तो इसे पढ कर बहुत कुछ जाना जा सकता है। यहाँ पर बेहद मोहक व मनोरम वातावरण के मध्य निर्भय भाव से हिरण, खरगोस, मयूर व अन्यान्य वन्य जीव कुलाँचे भरते रहते हैं। इस वन क्षेत्र में तमाम कल्याणकारी रोग नाशक जड़ी बूटियॉ भी किसी आकर्षण से कम नही हैं। इस शिव मंदिर की विशेषता है कि जो भी याचक भाव से चौखट पर मत्था पटका वह कभी खाली नही रहा, झारकण्डेश्वर महादेव ने उसकी सोच से भी ज्यादा उसकी झोली भर दिया। इस शिव मंदिर के बगल में शिव के 11वें रुद्रावतार बजरंगबली की आदमकद प्रस्तर प्रतिमा स्थापित है जिससे निरंतर एक आकर्षक तेज निःसृत होता रहता है। यहाँ की एक आश्चर्यजनक प्राकृतिक व्यवस्था है कि मंदिर के गर्भगृह मे पद्मासन की मुद्रा मे बैठा व्यक्ति भी ठीक उसी तरह गंगा का विहंगम अवलोकन कर सकता है जैसे गंगा के किनारे खड़ा व्यक्ति, बावजूद इसके यह समूचा परिसर आज तक कभी बाढ से प्रभावित नही हुआlयहॉ पर वर्षों पूर्व से बाल ब्रम्हचारी त्यागी बाबा रहते आ रहे हैं, जिनके विषय मे अटूट जन विश्वास है कि बाबा का आशीष कभी निष्फल नही होता वशर्ते वह अपने फकीरी मस्ती मे हों तब बाबा के साथ ऐसी मस्ती दिन मे कभी कभी ही होती है अन्यथा वह अक्सर तीक्ष्ण तेवर मे ही दिखते हैं।
अपने आप मे पर्यटन की समूची सम्भावनाओ को समेटे यह भक्ति प्रेम और प्राकृतिक माधुर्य से रससिक्त क्षेत्र प्रशासनिक उपेक्षा के कारण अब तक जनपद के पर्यटन मान चित्र मे अपनी जगह नही वना पाया, प्रकृति के इस अनमोल साम्राज्य का रख रखाव यहॉ के पुरवासी आज भी आपसी सहयोग से ही करते है, काश! यहाँ पर प्रशासन और पर्यटन की नजरे इनायत हो जातीं!

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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