नोटबंदी -अर्थव्यवस्था को स्पष्ट रूप से धक्का पहुँचा है

नोटबंदी


अब जब 10 हजार करोड़ रुपये छोड़कर सारी रकम बैंकों में आ गई है,तो नोटबंदी को सरकार सफल कैसे कह सकती है?

राहुल लाल@उर्जांचल टाइगर 
भारतीय रिजर्व बैंक की जारी वार्षिक रिपोर्ट काफी हद तक सरकार की नोटबंदी की कवायद पर नतीजे पेश करती है।सरकार ने 8 नवंबर 2016 को 500 और 1000 रुपये की तत्कालीन मुद्रा बंद करने की घोषणा की थी,जो कुल प्रचलित मुद्रा का 86 फीसदी थी।रिजर्व बैंक के अनुसार नोटबंदी के समय देशभर में 500 और 1000 के कुल 15 लाख 41 हजार करोड़ रुपये के नोट चलन में थे,लेकिन इनमें से 15 लाख 31 हजार करोड़ रुपये के नोट बैंकिंग सिस्टम में वापस आ गए।इस तरह 500 और 1000 के 99.3% नोट बैंकों में लौट आए हैं।इसका आशय है कि केवल 10,000 करोड़ रुपये के नोट सिस्टम में वापस नहीं आए।यह कोई बड़ी रकम नहीं है।आरबीआई की इस बात के लिए सराहना की जानी चाहिए कि उसने अंतिम आँकड़े जारी करने में सावधानी बरती,भले ही ये आँकड़े मौजूदा सरकार के आर्थिक निर्णय पर प्रश्न खड़े कर रहे हैं।नीतिगत दृष्टि से देखें तो अब यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि नोटबंदी के लिए तय लक्ष्य प्राप्त नहीं हो सके हैं।

सर्वाधिक आशावादी दृष्टिकोण दो अनुमानों पर आधारित था।पहला अनुमान यह था कि बहुत बड़ी मात्रा में नकदी को कर अधिकारियों से छुपाकर रखा गया है।दूसरा अनुमान यह था कि यह नकदी तंत्र में वापस नहीं आएगी,कम से कम उचित कर दर पर तो बिल्कुल नहीं।अगर नकदी उच्च कर दर पर वापस आती तो सरकार को अच्छा खासा कर प्राप्त होता।अगर ऐसा नहीं होता तो इसे आरबीआई के बैलेंस सीट पर प्रचुर लाभ के रुप में दर्ज किया जाता,क्योंकि वह तब इसे सरकार को सौंप सकती थी।परंतु 99.3% बंद नोटों की वापसी ने इस आकलन की धज्जियां उड़ा दी।उस समय अनुमान लगाया जा रहा था कि करीब ढाई-तीन लाख करोड़ रुपये बैंकों में लौटने वाले नहीं और वे रद्दी हो जाएँगें।अब जब 10 हजार करोड़ रुपये छोड़कर सारी रकम बैंकों में आ गई है,तो नोटबंदी को सरकार सफल कैसे कह सकती है?

नोटबंदी एक प्रमुख लक्ष्य नकली नोटों पर लगाम लगाना भी था।नकली नोटों पर अंकुश लगा पाने में भी सरकार कामयाब नहीं हुई है।रिजर्व बैंक के मुताबिक 2017-18 के दौरान भी जाली नोटों को पकड़े जाने का क्रम जारी है।इस दौरान 500 के 9892 और 2000 के 17,929 नोट पकड़े गए हैं।स्पष्ट है कि नोटबंदी के बाद भी जाली नोटों का सिस्टम में आने का चलन बना हुआ है।इसके अलावा चूँकि 500 और 1000 रुपये की नोट की जगह 2000 रुपये की नोट जारी किए गए,तो यह भी स्पष्ट नहीं होता है कि भला उच्च मूल्य मुद्रा में होनेवाले लेन देन या भारी भरकम नकद राशि के भंडारण पर रोक कैसे लगेगी।

नोटबंदी के प्रमुख लक्ष्यों में " कैशलैस इकॉनोमी" भी बताया गया था।9 दिसंबर 2016 को रिजर्व बैंक के अनुसार आम लोगों के पास 7.8 लाख करोड़ रूपये थे,जो जून 2018 तक बढ़कर 18.5 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच गया है।मोटे तौर पर आम आदमी के पास नकदी नोटबंदी के समय से दोगुनी हो गई है।

सरकार का कहना है कि नोटबंदी का व्यापक लक्ष्य था कि गैर कर अनुपालन वाले समाज से कर अनुपालन वाले समाज में बदलना।वित्त मंत्री के अनुसार पहले दो वर्ष में आय कर संग्रह में क्रमशरू 6.6 फीसदी और 9 फीसदी की वृद्धि हुई थी,जबकि नोटबंदी के बाद इसमें 15 फीसदी का सुधार हुआ और यह सिलसिला जारी है।मार्च 2014 में कुल 3.8करोड़ आयकर रिटर्न फाइल किए गए थे,जबकि 2017-18 में ये बढ़कर 6.86 करोड़ हो गए।करदाताओं की संख्या में वृद्धि को तो नोटबंदी की एक सफलता के तौर पर अवश्य रेखांकित किया जा सकता है,लेकिन सभी जानते हैं कि यह इस फैसले का मूल उद्देश्य नहीं था।मूल उद्देश्य तो काले धन वालों की कमर तोड़ना था।नोटबंदी से देश की आर्थिक विकास दर की गति पर असर पड़ा है। 2015-16 के दौरान जीडीपी ग्रोथ रेट 8.01फीसदी थी,जो 2016-17 के दौरान 7.11 फीसदी और अब 6.1 फीसदी रह गई है।

नोटबंदी पर आलोचना के घेरे में आई सरकार ने बचाव में कहा है कि बैंकों में जमा हो गए सारे धन को सफेद नहीं कहा जा सकता है और लगभग 18 लाख जमाकर्ता संदिग्ध किस्म के पाए गए हैं।वित्तमंत्री के अनुसार उनसे यह पूछताछ की जा रही है कि उन्होंने जो राशि जमा की है,वह उनकी आय से मेल खाती है या नहीं।उन पर कर और जुर्माना लगाया जाएगा।बेहतर हो कि सरकार की ओर से यह साफ कर दिया जाए कि अब तक टैक्स और जुर्माने से कितनी राशि वसूली जा चुकी है और सभी संदिग्ध खाताधारकों की जाँच पड़ताल कब तक पूरी हो जाएगी? यह ठीक है कि 18 लाख लोगों से जवाब तलब एक बड़ा काम है,लेकिन प्राथमिकता के आधार पर इसमें तीव्रता लाई जानी चाहिए और इसमें वैसी देर नहीं होनी चाहिए जैसी नोटबंदी पर रिजर्व बैंक की रिपोर्ट आने में हुई।

नोटबंदी का एक प्रमुख उद्देश्य चरमपंथी हमलों पर अंकुश भी बताया गया था।परंतु नोटबंदी से कश्मीर में चरमपंथी हमलों पर कोई अंकुश नहीं लगा है।गृह मंत्रालय की 2017 की सलाना रिपोर्ट के अनुसार जम्मू कश्मीर में 342 चरमपंथी हमले हुए,जो 2016 में हुए 322 हमले से ज्यादा थे।इतना ही नहीं,2016 में जहाँ चरमपंथी हमलों में केवल 15 लोगों की मौत हुई थी,वहीं 2017 में 40 आम लोग इन हमलों में मारे गए।कश्मीर में चरमपंथी हमले 2018 की शुरुआत से ही जारी है।
नोटबंदी से केवल 10 हजार करोड़ रुपये ही बैंकों में जमा नहीं हुए।लेकिन अब एक नजर नोटबंदी को क्रियान्वित करने के खर्चे पर भी डाला जाए।नोटों के प्रिटिंग पर रिजर्व बैंक को 7,965 करोड़ रुपये खर्च करने पड़े।इसके अलावा नकदी की किल्लत नहीं हो,इसके लिए ज्यादा नोट बाजार में जारी करने के लिए 17,426 करोड़ रुपये का ब्याज भी चुकाना पड़ा।इसके अलावा देश भर के एटीएम को नए नोटों के अनुरूप कैलिब्रेट करने में भी करोड़ों रुपया का खर्च सिस्टम को उठाना पड़ा।इस तरह नोटबंदी से फायदे से उलट इसे लागू करने में रिजर्व बैंक को हजारों करोड़ रुपये का नुकसान अलग उठाना पड़ा।

दुख की बात यह है कि नोटबंदी की कवायद ने आम घरों की बचत पर नकारात्मक प्रभाव डाला।आरबीआई ने बीते वर्षों के दौरान आम घरों की बचत के जो आँकड़े जारी किए हैं,वो भी काफी कुछ बताते हैं।आम पारिवारिक बचत में छोटे असंगठित क्षेत्र के उद्यमों की बचत भी शामिल होती है।इन्हें भी नोटबंदी ने तगड़ा झटका दिया।हालांकि आम पारिवारिक बचत 11 फीसदी सकल राष्ट्रीय व्यय योग्य आय के साथ कई वर्षों के उच्चतम स्तर पर है,परंतू इसकी बनावट का विश्लेषण दिलचस्प है।

सच तो यह है कि आम परिवारों के पास अब नोटबंदी के पहले से ज्यादा नकदी बचत के रूप में है।बैंक जमा आई उल्लेखनीय गिरावट की यह भी एक वजह हो सकती है।हांलाकि शेयर बाजार का बेहतर प्रदर्शन भी इसका एक कारण है।दूसरे शब्दों में कहे तो बचत को वित्तीय क्षेत्र में लाने की कोशिश नाकाम रही।चाहे जो भी हो,सकल घरेलू उत्पाद में नकदी का अनुमान ऐसे स्तर पर पहुँच चुका है जिसकी तुलना नोटबंदी के पहले के स्तर से की जा सकती है।ऐसा प्रतीत होता है कि नोटबंदी से जो भी बदलाव आए वे सरकार की अपेक्षाओं से परे थे।

अब आशा की जानी चाहिए कि सरकार भविष्य में नीतियाँ बनाते समय इस घटना से जरूरी सबक लेगी और नोटबंदी जैसे ऐसे कदमों से बचेगी जिन्होंने अर्थव्यवस्था को स्पष्ट रूप से धक्का पहुँचाया।
(लेखक- राहुल लाल, आर्थिक मामलों के जानकार हैं।)

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