गिरते रुपये का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव।

भारतीय अर्थव्यवस्था


भारत में इस वक्त जो महंगाई है उसका कारण डीजल और पेट्रोल का महंगा होना है।उसमें मुख्य रुप से डीजल की भूमिका है।यह आश्चर्य है कि भारत कई देशों को भारत में बिक रहे पेट्रोल और डीजल की की कीमतों की तुलना में आधे दामों पर निर्यात कर रहा है।इसका अर्थ यह है कि यहाँ डीजल और पेट्रोल पर अत्यधिक टैक्स लिया जा रहा है जो कंपनियों द्वारा मुनाफाखोरी है।


अनीता वर्मा
डॉलर के मुकाबले रुपया ऐतिहासिक रूप से लगातार कमजोर हो रहा है।रुपया बुधवार को रिकॉर्ड 72.91 के स्तर पर लुढ़कने के बाद संभला और 72.19 रुपये प्रति डॉलर के मूल्य पर बंद हुआ।दुनिया के देशों से लेन-देन के लिए आमतौर पर डॉलर की जरूरत होती है।ऐसे में डॉलर के तुलना में भारतीय मुद्रा के कमजोर होने का हमारे अर्थव्यवस्था पर व्यापक और गहरे प्रभाव होंगे।इस वर्ष जनवरी में जहाँ डॉलर एक डॉलर के लिए 63.64 रुपये देने होते थे,वहीं अब एक डॉलर के लिए 72 रुपया।इस तरह रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हुआ है।भारत को कच्चे तेल का आयात करने के लिए काफी डॉलर की जरूरत होती है और हाल के दिनों में तेल की कीमतों में जोरदार तेजी आई है,जिससे डॉलर की माँग बढ़ गई है।

विश्व में ऐसा कोई भी देश नहीं है जो केवल वस्तुओं का निर्यात ही करते हो और आयात न करते हो।किसी भी देश का निर्यात उस समय बढ़ जाता है जब उसके देश की मुद्रा कमजोर होती है क्योंकि आयातक देश को कम पैसे देकर ज्यादा सामान मिल जाता है।लेकिन यदि कोई देश दूसरे देश से किसी वस्तु को आयात करता है और उसकी मुद्रा डॉलर के मुकाबले कमजोर होती है तो उसको नुकसान उठाना पड़ना है क्योंकि ज्यादा पैसा खर्च करके भी कम सामान मिलता है।भारत की मुद्रा रुपया इन दिनों एक डॉलर 72.19 रुपये का हो गया है। जिसके फलस्वरूप कागज उद्योग के शेयरों के मूल्य में वृद्धि हुई है।

कागज का महंगा होना तय है।

पेपर उद्योग के संदर्भ में देखे तो भारत में बल्लारपुर, इंडस्ट्रीज, शेषशायी पेपर,वेस्ट कोस्ट पेपर,तमिलनाडु न्यूज़ प्रिंट जैसी अन्य कागज विनिर्माताओं कंपनियों के शेयरों में एक महीने के दौरान काफी वृद्धि हुई है।दरअसल कागज की मांग लगातार बढ़ रही है लेकिन कुछ वर्षों से घरेलू उत्पादन की क्षमता में वृद्धि नहीं हुआ है।जिसके फलस्वरूप बाजार में मांग आपूर्ति से अधिक हो गई है और जिस प्रकार रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हुआ है आसियान देशों से कागज का आयात महंगा हो गया है जिसके फलस्वरूप यह मांग स्थानीय कंपनियों के पास चला गया है।यहाँ देखा जाए तो रुपया कमजोर होने के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार से कागज का आयात करना महंगा पड़ रहा है।अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में भी चीन से बढ़ती मांग के फलस्वरूप कागज के सभी किस्मों में 100 से 150 डॉलर प्रति टन की वृद्धि हुई है।देखा जाए तो इस समय कागज के दाम 750 से 800 डॉलर प्रति टन हो गया है।2018 में पल्प की कीमतों में अभूतपूर्व वृद्वि हुई है।


ज्ञातव्य है कि कागज का उपयोग किताब बनाने,अखबार हेतु,फोटोग्राफी,फोटोकॉपी, पैकेजिंग करने आदि में होता है।ऐसे में घरेलू कंपनियां मांग को पूरा करने में सक्षम नहीं है क्योंकि कुछ वर्षों से उत्पादन में वृद्धि ही नहीं हुआ है और आयात महंगा हो गया है।इस प्रकार कागज का महंगा होना तय है।यदि रुपये की स्थिति मजबूत होती तो कागज पर महंगाई की मार पड़ने से बचाया जा सकता था।

ट्रेड वार के युग में रुपये का कमजोर होना भी निर्यात को नहीं बढ़ा सकता क्योंकि कई देश अपने देश के उद्योगों को संरक्षित करने हेतु उच्च दर पर आयात शुल्क लगा रहे है जैसे अमेरिका ने भारत से आयातित धातु से तैयार पाइपों पर 50.50 प्रतिशत डंपिंग रोधी शुल्क लगाया है।ऐसे में निश्चित ही धातु से तैयार पाइपों का दाम अमेरिका में बढ़ जाएगा जिससे उसकी ब्रिक्री काफी कम हो जाएगी।ऐसे में व्यापार बुुरी तरह प्रभावित होगा। तो यहाँ यह कहना कि यदि किसी देश की मुद्रा कमजोर हो जाए तो उसका निर्यात ट्रेड वार के समय नहीं बढ़ सकता है।

बीमार लोगों की दवा हो जाएगी मंहगी 

भारत में दवा कंपनियां भी केंद्र सरकार के नियंत्रण के तहत आने वाली दवाओं के मूल्य में वृद्धि की गुजारिश कर रहे है।
दवा उद्योग के संदर्भ में देखे तो भारतीय दवा विनिर्माता कच्चे माल हेतु चीन पर निर्भर है।केपीएमजी सीआईआई के अनुसार कुल इस्तेमाल का लगभग 60 से 70 फीसदी बल्क दवाओं का आयात चीन से किया जाता है।

ऐसे में रुपया के कमजोर होने का नकारात्मक प्रभाव यहाँ भी देखा जा रहा है।दरअसल पिछले महीनों में कच्चे माल की कीमतों में 20 से 90 फीसदी की वृद्धि हुई है।जिससे दवा कंपनियां केंद्र सरकार के मूल्य नियंत्रण के तहत आने वाली दवाइयों की कीमतों में अस्थायी तौर इजाफा चाहती है जिससे कच्चे माल की बढ़ी कीमत को वहन किया जा सके।कंपनियों का कहना है कि इन दवाओं के उत्पादन पर उन्हें नुकसान हो रहा है और उन्हें उत्पादन में कटौती करने को मजबूर होना पड़ सकता है। यदि कंपनियां ऐसा करती है तो दो प्रकार की समस्याएं है।यदि सरकार कंपनियों की मांगे मानती है तो 1.23 लाख घरेलू बाजार के करीब 16 फीसदी मूल्य सरकार के नियंत्रण वाले दवाओं के दाम बढ़ जाएंगे जिसमें सिप्ला,कैडिला हेल्थकेयर, जीएसके फार्मास्युटिकल इंडिया ,एलकेम लेबोरेटरीज और सन फार्मा सम्मिलित है।


ऐसे में बीमार लोगों को दवा खरीदने हेतु ज्यादा खर्च करना पड़ेगा।दूसरा यदि सरकार इन कंपनियों के आग्रह को स्वीकार नहीं करती है तो कंपनियाँ अपने खर्च वहन करने हेतु दवाओं के उत्पादन में कटौती करती है तो उपलब्धता प्रभावित होती है तो दवाओं के मूल्य में वृद्धि होगी क्योंकि यहाँ बाजार मांग और आपूर्ति के आधार पर कार्य करेगा।चूंकि यहाँ मांग ज्यादा रहेगी और आपूर्ति कम।कुल मिलाकर समस्या जनता के समक्ष खड़ी होगी।

रुपये के कमजोर होने से व्यापार घाटा भी बढ़ेगा।इसको पाटने के लिए और निर्यात बढ़ाना होगा।लेकिन जिस प्रकार वैश्विक अर्थव्यवस्था का माहौल है जैसे ट्रंप द्वारा संरक्षणवादी रुख अपनाना,एशियाई मुद्राओं में भारतीय मुद्रा का सबसे खराब प्रर्दशन आदि के होते हुए कैसे संभव है।

विदेशों में पढ़ाई करना खर्चीला होगा



रुपया के कमजोर होने से उन देशों में पढ़ाई करना खर्चीला होगा जिस देशों की मुद्राएं रुपये के मुकाबले ज्यादा मजबूत है।जैसे अमेरिका, यूरोप, ब्रिटेन, हान्गकाँग ,चीन,सिंगापुर ।जबकि रुपया,न्यूजीलैंड,ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया के मुद्राओं के मुकाबले स्थिर है तो यहाँ स्थिति जस की तस बनी रहेगी।जब तक भारत द्वारा निर्यात किए गए वस्तु पर ये देश भारी भरकम टेरिफ न लगाए जैसा ट्रेड वार में देखा जा रहा है।कुछ देश ऐसे भी है जिनकी मुद्राओं के मुकाबले रुपया मजबूत हुआ है जैसे श्रीलंका, तुर्की और रूस।ऐसे में इन देशों में उच्च शिक्षा लेना सस्ता होगा और घूमने जाने के दृष्टिकोण से सस्ता होगा।


चूंकि भारत अपनी आवश्यकता का 85% क्रूड तेल का आयात करता है।ऐसे में डीजल पेट्रोल भी महंगे होगें।डीजल पेट्रोल महंगे होने का दुष्प्रभाव प्रत्येक क्षेेत्र मेें पड़ेगा ।जैसे आवागमन, खाद्य पदार्थों ,कृषि क्षेत्र आदि।भारत मेें मौजूद वक्त में केवल 42 फीसदी रेलवे ट्रैक का ही विद्युतीकरण किया जा सका है।ऐसे में 58 फीसदी रूटों पर रेलगाड़ियां डीजल से ही चलती है।ऐसे में रेल यात्रा का टिकट महंगा होना तय है। बसों,ट्रको ,टैक्टर,मोटरसाइकिल, कार आदि के संदर्भ में देखे तो डीजल और पेट्रोल ही ईधन के रूप में मुख्य रुप से इस्तेमाल किया जाता है हालांकि कुछ सीएनजी बसेंं और आटो भी चलती हैै लेकिन सीमित है। यहाँ बसों का प्रयोग छोटी से बड़ी दूरी (100 किलोमीटर से लेकर 1200 किलोमीटर से ऊपर ) यात्रा हेेतु साधन के रूप मेें प्रयोग किया जाता है।जैसे गोरखपुर से दिल्ली, जयपुर से दिल्ली,इलाहाबाद से जौनपुुुर,वाराणसी से इलाहाबाद, बलिया से कानपुर आदि।

ऐसे में यात्री को यात्रा करने हेतु ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ेगा।इसी प्रकार ट्रकों,मालगाड़ी से माल ढुलाई भी महंगी होगी और इसका प्रभाव फल,सब्जी और खाद्य पदार्थों पर पड़ेगा।किसानों हेतु कृषि करना भी खर्चीला होगा क्योंकि कई क्षेत्रों में बिजली की स्थिति बेहतर नहीं होने के कारण पंप सेट से खेतों की सिंचाई होती है जो डीजल से चलता है।दूसरा जुताई और बोआई भी टैक्टर से होती है।वह भी डीजल नामक ईंधन से ही चलता है।लेकिन डीजल पेट्रोल के संदर्भ में आरटीआई के तहत एक ऐसी जानकारी आई है जो आश्चर्य में डालती है।

दरअसल भारत कई देशों को पेट्रोल डीजल ,भारत में बिक रहे दामों से आधा दाम पर मुहैया करा रहा है।जैसे मलेशिया में 36.26 लीटर डीजल,हांगकांग में 38.26 लीटर, मॉरिशस में 36.30 पेट्रोल और 37.06 लीटर डीजल, यूएई में 33.30 रूपये लीटर पेट्रोल उपलब्ध कराया जा रहा है। पेट्रोलियम मंत्रालय ने भी माना है कि 1 जनवरी 2018 से 30 जून 2018 के मध्य 15 देशों को पेट्रोल और 29 देशों को डीजल निर्यात किया है।


जिस प्रकार डॉलर के मुकाबले रुपया 11 फीसदी तक गिरा है और एशियाई मुद्राओं में इसका सबसे खराब प्रदर्शन रहा है ।वह चिंता का विषय है।आरबीआई ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट में कहा था कि चालू खाते की घाटे की भरपाई विदेशी निवेश से होगा।जबकि शेयर बाजार में गिरावट को देखने से लग रहा है कि विदेशी निवेशक शेयर को बेचने के मूड में है।बुधवार को 3.8 अरब रूपये के शेयर बेचे।जबकि घरेलू संस्थागत निवेशकों ने 1.77 अरब रूपये के शेयर खरीदे।

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि रूपया में जिस प्रकार नरमी है तो आरबीआई के पास ब्याज दर को बढ़ाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है लेकिन ब्याज दर बढ़ने से निश्चित ही मांग और विकास प्रभावित होगा।भारत में महंगाई इस समय काफी बढ़ गई है।यहाँ सरकार मान कर चलती है कि महंगाई इसलिए बढ़ी है क्योंकि मार्केट में लिक्विडिटी ज्यादा है।लेकिन मार्केट में लिक्विडिटी और महंगाई का कोई डायरेक्टर संबंध नहीं होता है।इसलिए ब्याज दर बढ़ाने से महंगाई नियंत्रित नहीं होगी।मार्केट से कुछ लिक्विडिटी को कम अवश्य किया जा सकता है।

भारत में इस वक्त जो महंगाई है उसका कारण डीजल और पेट्रोल का महंगा होना है।उसमें मुख्य रुप से डीजल की भूमिका है।यह आश्चर्य है कि भारत कई देशों को भारत में बिक रहे पेट्रोल और डीजल की की कीमतों की तुलना में आधे दामों पर निर्यात कर रहा है।इसका अर्थ यह है कि यहाँ डीजल और पेट्रोल पर अत्यधिक टैक्स लिया जा रहा है जो कंपनियों द्वारा मुनाफाखोरी है। जब रूपया की कीमत इस प्रकार अंतरराष्ट्रीय बाजर में कम नहीं था तब भी पेट्रोलियम कंपनियों द्वारा डीजल और पेट्रोल के दामों में कोई कमी नहीं की गई थी।दूसरा कुछ समय पहले तक अंतरराष्ट्रीय बाजा़र में कच्चे तेल की कीमत प्रति बैरल काफी कम था बावजूद डीजल और पेट्रोल के मूल्य आसमान छूते रहे। अतः सरकार को पेट्रोलियम कंपनियों पर मूल्य कम करने के लिए दबाव बनाना चाहिए ताकि महंगाई से राहत मिल सके।

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