बैंकों का जटिल विलय एवं बैंक विलय की प्रमुख चुनौतियाँ।

बैंक विलय


हाल ही में बैंक ऑफ बड़ौदा,विजया बैंक और देना बैंक के विलय का निर्णय केंद्र सरकार ने लिया है।बैंकों के समुचित विलय से भारतीय बैंकिंग व्यवस्था,जो गंभीर एनपीए की समस्या से जूझ रहा है,निपट सकता है।लेकिन सरकार जिस तरह बैंक ऑफ बड़ौदा के साथ देना बैंक जैसे बीमार बैंक का विलय कर रही है।वह बैंक ऑफ बढ़ौदा जैसे मजबूत बैंक के स्वास्थ्य के लिए समुचित नहीं है। अच्छा होता,यदि पहले बीमार बैंक का समुचित इलाज होता और फिर उसका विलय होता। 

राहुल लाल
केंद्र सरकार ने बैंक ऑफ बड़ौदा,विजया बैंक और देना बैंक के विलय का फैसला लिया है।तीनों को मिलाकर बनने वाला नया बैंक देश का तीसरा सबसे बड़ा बैंक होगा।विलय के प्रस्ताव पर अब तीनों बैंकों के बोर्ड विचार करेंगे।परंतु अब वह केवल औपचारिकता भर है।सरकार का यह कदम उसकी इस सोच का ताजा नमूना है कि उसे लगता है कि सरकारी बैंकों को सुदृढ़ करने की आवश्यकता है।इस विलय को फंसे हुए कर्ज की समस्या के दवा के तौर पर देखा जा रहा है।सरकार का कहना है कि तीनों बैंक विलय के बाद भी स्वतंत्र रूप से काम करना जारी रखेंगे और सभी बैंक कर्मचारियों की नौकरी सुरक्षित है।यह पहला मौका है,जब तीन बैंकों के एकीकरण की पहल सरकार ने की है।इससे पूर्व स्टेट ऑफ इंडिया और उसके 5 सहयोगी बैंकों का विलय तथा एसबीआई द्वारा भारतीय महिला बैंक का अधिग्रहण किया जा चुका है।उल्लेखनीय है कि देश में कुल 21 सरकारी बैंक हैं,जिनकी अधिकांश हिस्सेदारी सरकार के पास है।इन तीन बैंकों के विलय के बाद देश में 19 सरकारी बैंक रह जाएँगें।इन सरकारी बैंकों की एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की बैंक परिसंपत्ति में दो तिहाई से अधिक हिस्सेदारी है।हालांकि इसके साथ इन सार्वजनिक बैंकों की फंसे कर्ज में भी बड़ी हिस्सेदारी है।साथ ही वैश्विक बेसल-तीन पूँजीगत नियमों के अनुपालन के लिए अगले दो साल में करोड़ों रूपये चाहिए।

सरकार ने यह कदम ऐसे समय में उठाया है,जब फंसे कर्ज की मार झेल रहे देना बैंक का शुद्ध एनपीए 11 फीसदी से अधिक हो गया है और रिजर्व बैंक ने इसे पीसीए यानी प्रॉम्प्ट करेक्टिव एक्शन श्रेणी में डाल दिया है।ऐसे में इस बैंक पर कई तरह की बंदिशे लग गई हैं।वित्त मंत्री अरुण जेटली का कहना है कि बैंक कर्ज में वृद्धि से कारपोरेट सेक्टर के निवेश पर असर पड़ रहा था।कई बैंक एनपीए बढ़ने की वजह से नाजुक स्थिति में पहुँच गए थे।इसलिए तीन बैंकों के विलय के बाद जो बैंक बनेगा,उससे बैंकिंग ऑपरेशन में सुधार आएगा।दूसरे शब्दों में सरकार मानती है कि यह बैंक विलय का निर्णय न केवल बैंकों के कर्ज देने की क्षमता में वृद्धि करेगी,अपितु बैंकिग प्रणाली को दुरूस्त करने तथा आर्थिक वृद्धि को गति देने के सरकार के प्रयासों को गतिमान बनाएगी।माना जा रहा है कि तीनों बैंक विलय प्रक्रिया तय सीमा में निपटाएंगे और वित्त वर्ष 2018-19 के अंत तक सभी जरुरी नियामकीय प्रक्रिया पूरी होने की उम्मीद है।नया बैंक 1 अप्रैल 2019 से चालू हो जाएगा। 

विलय के पक्ष में सरकार के अन्य तर्क

सरकार को उम्मीद है कि बैंक ऑफ बड़ौदा,देना बैंक तथा विजया बैंक के प्रस्तावित विलय से बैंक शाखाओं की संख्या कम होने से सालाना 10 अरब रुपये की बचत होने की उम्मीद है।बैंक ऑफ बड़ौदा और देना बैंक की शाखाएँ आसपास के इलाकों में ही है और इससे कम से कम 1000 जगहों पर शाखाओं का एकीकरण हो सकता है,जिससे 10-12 अरब रुपये की बचत हो सकेगी। 

क्या होगा नए बैंक का हाल?

तीनों बैंकों के विलय के बाद जो नया बैंक बनेगा,उसमें तीनों बैंकों के कर्मचारी होंगे।अभी बैंक ऑफ बड़ौदा में 56,361 ,विजया बैंक में 15,874 और देना बैंक में 13,400 कर्मचारी काम कर रहे हैं।ये सब मिलकर नए बैंक में कुल 85,615 कर्मचारी होंगे।इसी तरह बैंक ऑफ बड़ौदा का कुल कारोबार 10,29,811 करोड़ रूपये है,वहीं विजया बैंक का कारोबार 2,79,674 करोड़ तथा देना बैंक का 1,74,931 करोड़ रुपये है।इस तरह नए बैंक का कुल कारोबार 14,82,422 करोड़ रूपये का होगा।

एनपीए के लिहाज से देखें तो बैंक ऑफ बड़ौदा का नेट एनपीए फिलहाल 5.4%,विजया बैंक का 4.1% और देना बैंक का 11.4% है।इस तरह तीनों बैंकों के विलय के बाद औसत 5.7% होगा,जो सरकारी बैंकों के औसत 12.13% से अच्छा रहेगा।इसी तरह इन बैंकों का सीएएसआर अनुपात यानी तीनों बैंकों में चालू और बचत खाते में जमा राशि का अनुपात 34 फीसदी होगा।इन तीनों बैंकों का लागत-आय अनुपात भी 48.94% होगा,जबकि सरकारी बैंकों का औसत लागत आय अनुपात 53.92% है।इसी तरह तीनों बैंकों का सीआरएआर यानी कैपिटल टू रिस्क असेट रेश्यो भी 12.25% होगा,जबकि निर्धारित नियमानुसार यह 10.875% ही होना चाहिए।तीनों बैंकों का प्रॉविजनल कवरेज रेश्यो भी इन सरकारी बैंकों के औसत से अच्छा होगा। 

विलय की चुनौतियाँ

तीनों बैंकों की शाखाओं के एकीकरण और इसकी प्रक्रिया विलय की बड़ी चुनौती होगी।पिछले वर्ष स्टेट बैंक में उसके 5 संबद्ध बैंकों के विलय के बाद ,इस वर्ष एलआईसी द्वारा आईडीबीआई बैंक के अधिग्रहण प्रस्ताव की बात सामने आई थी।इस समावेशन प्रक्रिया के पीछे असली प्रेरणा थी कि व्यवस्था में फंसे हुए कर्ज की समस्या से निपटना।ऐसे विलयों की उपादेयता का आकलन करने के लिए अतीत में जाना आवश्यक है।अतीत में हुए ऐसे ही विलयों का रिकॉर्ड भी बहुत अच्छा नहीं है।

स्टेट बैंक ऑफ सौराष्ट्र और स्टेट बैंक ऑफ इंदौर का विलय क्रमशः 2008 व 2010 में एसबीआई के साथ किया जा चुका है।सरकार की उन्नीस क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों का विलय भी बीते सालों में कर चुकी है।न्यू बैंक ऑफ इंडिया और पंजाब नेशनल बैंक का विलय तथा ग्लोबल ट्रस्ट बैंक और ओरियंटल बैंक ऑफ कॉमर्स का विलय स्पष्टतः दिखता है कि इससे अधिग्रहीत और अधिग्रहणकर्ता में से किसी का भला नहीं हुआ।स्टेट बैंक का विलय भी एक और उदाहरण सामने रखता है।सरकारी बैंकों के सुदृढ़ीकरण की माँग नई नहीं है।

आरबीआई के पूर्व गवर्नर एम नरसिम्हन के नेतृत्व वाले एक पैनल ने सन 1998 में ही भारतीय बैंकों के तीन स्तरीय ढांचे की बात कही थी।बाजार आधारित अर्थव्यवस्था में बैंकिंग ढांचों के साथ मनमाना व्यवहार नहीं किया जा सकता।इसके बजाए नीति निर्माताओं को बाजार को बैंकों का आकार और स्वरूप निर्धारित करने देना चाहिए।रिजर्व बैंक ने बैंक लाइसेंसिंग को लेकर कहीं अधिक उदार व्याख्या अपनाई है।ऐसे परिदृश्य में सरकार द्वारा निर्देश देना कतई समझदारी नहीं लगता।दरअसल,बैंकों का विलय फंसे हुए कर्ज से निपटने का अल्पकालिक उपाय है,लेकिन असली समस्या इनके प्रबंधन और कामकाज के तरीके को लेकर है।सरकारी बैंकों के कामकाज और नियुक्तियों में सरकार का दखल स्थिति को खराब कर रही है।यही वजह है कि आज प्राइवेट बैंक कुल नए डिपॉजिट का करीब 70 प्रतिशत और इन्क्रीमेंटल लोन का 80% हिस्सा झटकने में कामयाब हैं।

सरकार का दावा है कि विलय से तीनों बैंकों के परिचालन में सुधार होगा और यह देश में छोटे-छोटे बैंकों के स्थान पर बड़े बैंक स्थापित करने की योजना का हिस्सा है।सरकार चाहती है कि देश में 6 बड़े बैंक होने चाहिए, ताकि उनके असफल होने की संभावना नहीं रहे।लेकिन एकीकरण के बाद भी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का फलक विदेशी बैंकों से छोटा होगा,जैसे अमेरिका के 8 बैंकों की समग्र पूँजी वहाँ के जीडीपी का 60% है,वहीं इंग्लैंड और फ्रांस के चार बैंकों की समग्र पूँजी उनके देश के जीडीपी का तीन सौ प्रतिशत है,जबकि भारत में भविष्य के 6 बड़े बैंकोन की समग्र पूँजी देश के जीडीपी की महज एक तिहाई होगी।अमेरिका के सबसे बड़े बैंक जेपी मार्गन की पूँजी भारत के सबसे बड़े बैंक भारतीय स्टेट बैंक से 8 गुना ज्यादा है।साफ है,एकीकरण के बाद भी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बड़े बैंक नहीं बन पाएंगें।

इसके अलावा सरकार का यह भी कहना कहना है कि विलय के बाद बने बैंक के ग्राहक आधार में तेजी से इजाफा होगा।साथ ही उसकी बाजार पहुंच,परिचालन,किफायत और उपभोक्ताओं के लिए उसके उत्पाद और सेवाओं में भी सुधार होने की बात कही जा रही है।परंतु जरूरी नहीं है कि हकीकत भी ऐसा ही हो।देना बैंक का ग्रोस एनपीए 22 फीसदी के उच्चतम दायरे में है।विजया बैंक का ग्रोस एनपीए 6.9% है और बैंक ऑफ बड़ौदा का 12. 4%। विलय के बाद बनने वाले बैंक का एनपीए करीब 13 फीसदी होगा।यह बैंक ऑफ बड़ौदा के मौजूदा 12.4% के स्तर से भी कमजोर होगा।आखिर सरकार बैंक ऑफ बड़ौदा के अंशधारकों को क्या संदेश देना चाहती है?

देना बैंक देश के सबसे कमजोर बैंकों में शामिल है,जबकि बैंक ऑफ बड़ौदा सबसे मजबूत बैंकों में।विजया बैंक छोटा लेकिन औसत वित्तीय स्थिति वाला है।ऐसे में स्पष्ट है कि दोनों बैंकों के वित्तीय बोझ को बैंक ऑफ बड़ौदा को ही उठाना पड़ेगा।एचडीएफसी रिपोर्ट के मुताबिक फंड की लागत और नेट ब्याज मार्जिन अर्थात एनआईएम पैमाने पर देना बैंक की स्थिति दूसरे दोनों बैंकों के मुकाबले खराब है।इसके आधार पर बैंक के वित्तीय स्वास्थ्य का पता लगता है।देना बैंक का एनआईएम 2.61 फीसदी है,जबकि बैंक ऑफ बड़ौदा का 2.92 फीसदी और विजया बैंक का 3.12 फीसदी है।एनआईएम बैंक की तरफ से दिए गए ब्याज और वसूले गए ब्याज का अंतर होता है।3 फीसदी से ज्यादा एनआईएम को बेहद अच्छा माना जाता है।इसी तरह देना बैंक की कॉस्ट ऑफ फंड 5.59 फीसदी है,जबकि विजया बैंक का 5.09 फीसदी और बैंक ऑफ बड़ौदा का 5.25 फीसदी।स्पष्ट है कि ऐसा विलय देश के मौजूदा वित्तीय संकट की वास्तविक वजह का भी निराकरण नहीं करता।

सर्वोत्तम तो यह होगा कि मजबूत बैंकों का विलय कर दिया जाए,क्योंकि उनके पास संसाधन हैं,उनकी सेहत और कार्य संस्कृति अच्छी है एवं उनके सामने विलय प्रक्रिया की जरुरतों को पूरा करने के सिवा कोई बाधा नहीं है।अगर हमने किसी बीमार बैंक का विलय किसी बड़े स्वस्थ बैंक के साथ कर दिया तो इसके विलय के वक्त स्वस्थ बैंक के लिए समस्याएँ उत्पन्न हो सकती है।देना बैंक की मौजूदा स्थिति विलय के बाद बने नए बैंक की क्षमता को भी प्रभावित करेगी।कमजोर या बीमार बैंकों के विलय पूर्व उनके सेहत में सुधार आवश्यक है।

तीन वर्ष पूर्व सरकार ने बैंक ऑफ बड़ौदा में निजी क्षेत्र के हाईप्रोफाइल प्रौफेनल्स की नियुक्ति कर उन्हें बैंक में की कायापलट करने का जिम्मा सौंपा था।पिछले तीन वर्ष में इन प्रोफेशनल्स और बैंक कर्मचारियों की मेहनत से तमाम तरह की अड़चनें दूर कर ली गई।बैंक ऑफ बड़ौदा अब एक नई उड़ान भरने की तैयारी कर रहा था,तभी बैंक को विलय का सामना करना पड़ रहा है।

विलय के बाद बने बैंक में टेक्नोलॉजी का एकीकरण एक बड़ा मसला है।बैंक ऑफ बड़ौदा ने हाल ही में अपनी कोर टेक्नोलॉजी को "फिनाकल 7" से "फिनाकल 10"में अपग्रेड किया है।अब तीनों बैंकों को उसी प्लेटफार्म में लाना एक बड़ी चुनौती है।तथ्य की बात करें तो 2014 की पी जे नायक समिति भी इस बात को स्पष्ट करती है कि सरकारी बैंकों के बोर्ड संचालन मानकों पर बहुत बुरी स्थिति से गुजर रहे हैं।केवल कमजोर बैंकों का अपेक्षाकृत मजबूत बैंकों के साथ विलय कर देना सरकार के लिए बेहतर कदम हो सकता है,लेकिन जमीनी स्तर पर कुछ भी नहीं बदलता।

इस आलोक में बेहतर पूँजी प्रबंधन,ऋण प्रस्तावों के मूल्यांकन में गुणवत्ता का समावेश,फंसे कर्ज की वसूली के लिए ईमानदारी पूर्वक प्रयास, वसूली के मामले में बैंक अधिकारियों को प्रभावी अधिकार,भ्रष्टाचार पर नियंत्रण,कुशल मानव संसाधन की ज्यादा से ज्यादा भर्ती, राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्ति ही बैंकिंग सेक्टर को बेहतर प्रदर्शन की ओर अग्रसर कर सकता है।

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