1986 से अब तक ए.के.- 47 की गोलियों से दहलता रहा है मुजफ्फरपुर

1986 से अब तक ए.के.- 47 की गोलियों से दहलता रहा है मुजफ्फरपुर

प्रतीकात्मक
पटना।।उत्तर बिहार की राजधानी कहे जाने वाले मुजफ्फरपुर में कत्ल की वारदातों की एक लंबी फेहरिश्त कायम है।यह शहर कई हाई प्रोफाइल मर्डर का गवाह रहा है।अब पूर्व मेयर समीर कुमार की हत्या के बाद एक बार फिर यह शहर दहशत के साये में घिर गया है।

मुजफ्फरपुर इलाके में ए.के.-47 का पहला प्रयोग

1980 के दशक के शुरू की बात है।उस समय मुजफ्फरपुर में अशोक सम्राट और चंदेश्वर सिंह का गिरोह ठेके पर कब्जा जमाने के लिए एक दूसरे के खिलाफ खूनी के छीटें उड़ा रहा था। कहा जाता है कि अशोक सम्राट को हेमंत शाही का समर्थन हासिल था तो चंदेश्वर सिंह को रघुनाथ पांडेय का। 1986 में चंदेश्वर सिंह को उस दिन गोलियों से भून दिया गया जिस दिन उसके बेटे का तिलक समारोह था। तिरहुत इलाके में पहली बार हत्या के लिए ए.के.- 47 का इस्तेमाल किया गया था। इस हत्या का आरोप अशोक सम्राट पर लगा था।

छोटन शुक्ला का उभार

इसी दौर में वैशाली जिले के खंजाहाचक गांव के रहने वाले छोटन शुक्ला कॉलेज की पढ़ाई के लिए मुजफ्फरपुर आये थे। एलएस कॉलेज में नाम भी लिखाया था। लेकिन इसी बीच उनके पिता रामदास शुक्ला की हत्या हो गयी। इसके बाद छोटन शुक्ला की जिंदगी ही बदल गयी। हाथ में बंदूक आयी तो रास्ता बदल गया। पढ़ाई छूट गयी। चंदेश्वर सिंह की हत्या के बाद छोटन शुक्ला दबंग के रूप में उभरने लगे।अशोक सम्राट को यह बात पसंद नहीं आयी। गैंगवार शुरू हो गया। 1989 में अशोक सम्राट के खासमखास मिनी नरेश की एलएस कॉलेज कैंपस में ही बम मार कर हत्या कर दी गयी।आरोप छोटन शुक्ला पर लगा। फिर दोनों तरफ से लाशें गिरने लगीं।

बृजबिहारी प्रसाद की इंट्री

इसी दौर में मुजफ्फरपुर इंजीनियरिंग के छात्र बृज बिहारी प्रसाद का भी दबदबा बढ़ने लगा। माहौल बदल गया था। अपराधी गुटों की जातीय आधार पर गुटबंदी होने लगी थी। इसके पहले मुजफ्फरपुर में भूमिहार आपराधिक गुटों के बीच खूनी जंग चल रही थी। बृजबिहारी प्रसाद ने भूमिहारों के वर्चस्व को तोड़ने के लिए अपनी अलग ताकत बनायी।

हेमंत शाही हत्याकांड: तारीख़ 28 मार्च 1992

मुजफ्फरपुर के सांसद रहे कांग्रेस के पूर्व केंद्रीय मंत्री एलपी शाही के इकलौते बेटे और वैशाली के तत्कालीन विधायक हेमंत शाही की हत्या आज भी लोगों के जेहन में है। मुजफ्फरपुर से सटे वैशाली जिला के गोरौल अंचल कार्यालय में एक मेले के टेंडर विवाद में उनकी हत्या हो गई थी।

दिसम्बर 1994 में छोटन शुक्ला की हत्या

बाद में छोटन शुक्ला ने राजनीति में आने का फैसला किया। छोटन शुक्ला ने 1995 के विधानसभा चुनाव में आनंद मोहन की पार्टी- बीपीपा से टिकट हासिल किया। वे केसरिया से चुनाव मैदान में उतरे थे। दिसम्बर 1994 छोटन शुक्ला अपने साथियों के साथ चुनाव प्रचार कर लौट रहे थे। लगभग नौ बजे रात में संजय सिनेमा के पास ओवरब्रिज पर जैसे ही उनकी गाड़ी पहुंची अपराधियों ने अंधाधुंध फायरिंग कर दी। मौके पर ही छोटन शुक्ला की मौत हो गयी। इस हत्या का आरोप बृजबिहारी प्रसाद पर लगा। छोटन शुक्ला की हत्या के बाद उनके भाई भुटकुन शुक्ला ने गैंग की कमान संभाली। भुटकुन शुक्ला ने अपने भाई की हत्या का बदला लेने के लिए कई लाशें गिरायीं। इसी क्रम में भुटकुन ने बृजबिहारी के खास आदमी ओंकार सिंह को दिनदहाड़े गोलियों से भून डाला था। 

भुटकुन शुक्ला की हत्या

इसके बाद बृजबिहारी प्रसाद ने भी पलटवार किया। कहा जाता है कि बृज बिहारी ने भुटकुन शुक्ला के शागिर्द दीपक सिंह को मिला लिया। दीपक सिंह ने भुटकुन शुक्ला को घर में मार डाला। इस हत्याकांड ने बृजबिहारी प्रसाद हत्याकांड की नींव डाल दी। कहा जाता है कि इसके बाद बिहार और पूर्वांचल के तमाम बाहुबलियों की मीटिंग हुई जिसमें बृजबिहारी प्रसाद को मारने की योजना बनायी गयी थी।

13 जून 1998 को बृजबिहारी प्रसाद की हत्या

शुक्ला बंधुओं की हत्या के बाद बृज बिहारी प्रसाद पर खतरा मंडराने लगा था। 1998 में बृज बिहारी प्रसाद राबड़ी सरकार में मंत्री थे। लेकिन मेधा घोटला में आरोपी बनाये जाने के बाद उन्हें जेल भेज दिया गया था। इलाज के नाम बृजबिहारी प्रसाद IGIMS भर्ती हो गये थे। बिहार सरकार ने बृज प्रसाद की सुरक्षा के लिए दो दर्जन कार्बाइनधारी सुरक्षाबल मुहैया कराये थे। इसके बावजूद 13 जून 1998 को अस्पताल परिसर में बृजबिहारी प्रसाद को ए.के.-47 से भून दिया गया था। इस हत्या का आरोप मुन्ना शुक्ला, श्रीप्रकाश शुक्ल, राजन तिवारी, मंटू तिवारी, सूरजभान, कैप्टन सुनील समेत अन्य लगा था। बाद में पटना हाईकोर्ट से सभी आरोपी बरी हो गये थे।

पूर्व मेयर समीर कुमार हत्या- तारीख़ 23 सितंबर 2018

बृजबिहारी प्रसाद की हत्या के बाद बहुत समय तक मुजफ्फरपुर में खामोशी रही। बदले की आग में सुलग रहा यह शहर कुछ समय तक शांत रहा। लेकिन समीर कुमार की हत्या ने राख में दबी चिनगारी को एक बार फिर हवा दे दी है। मुजफ्फरपुर के लकडीढ़ाही इलाके के अग्निशमन कार्यालय के पास अपराधियों ने पूर्व मेयर समीर कुमार और उनके चालक पर ए.के.- 47 से अंधाधुंध फायरिंग की। पचास से अधिक राउंड गोलियां चलाई गई। दोनों की मौके पर ही मौत हो गई। समीर कुमार राजनेता के साथ ही बड़े जमीन कारोबारी भी थे।
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