विश्व की बीमार नदियों का संरक्षण आवश्यक है।

देखा जाए तो भारत में भी नदियों को माँ का दर्जा प्राप्त है, खासकर गंगा नदी को बावजूद नमामि गंगे परियोजना में करोड़ों रुपये बहाने के पश्चात भी गंगा का जल दूषित ही है।जबकि गंगा नदी भी उत्तर भारत में आस्था का प्रतीक है।


देखा जाए तो भारत में भी नदियों को माँ का दर्जा प्राप्त है, खासकर गंगा नदी को बावजूद नमामि गंगे परियोजना में करोड़ों रुपये बहाने के पश्चात भी गंगा का जल दूषित ही है।जबकि गंगा नदी भी उत्तर भारत में आस्था का प्रतीक है।
अनीता वर्मा
विश्व में औद्योगिकीकरण और नगरीकरण के फलस्वरूप नदियों में प्रदूषण का स्तर बढ़ा है।चूंकि नगरों से निकलने वाले सीवर और उद्योगों के खतरनाक अवशिष्टों हेतु कोई अलग से व्यवस्था न करके इन्हें नदियों में ही मिलाया जाता है परिणामस्वरूप वर्तमान में लगभग सभी नदियाँँ प्रदूषित है।जिसके फलस्व रूप नदियों का जल तो प्रदूषित हुआ ही है साथ साथ नदियों के प्रभाव क्षेत्र वाले भूमिगत जल भी प्रदूषित हो चुका है।जिसके कारण यह जल न पीने योग्य है और न ही सिंचाई योग्य। इसमें रहने वाले जीवों के अस्तित्व के साथ साथ नदियों के अस्तित्व पर भी संकट मंडरा रहा है।इसलिए विश्व के कई देशों में नदियों के व्यक्तिगत अधिकार की मांग कर रहे है।कोलंबिया के अंचिकाया नदी को कानूनी रूप से व्यक्तिगत अधिकार प्रदान करने हेतु अमाइकस ब्रीफ अंतरराष्ट्रीय कार्यकर्ताओं के एक समूह ने दायर किया है।दरअसल अंचिकाया नदी प्रशांत महासागर के जैव विविधता वाले क्षेत्र में विस्तृत भूभाग पर प्रवाहित होती है।ब्रीफ के अंर्तगत यह मांग सम्मिलित है कि कोलंबिया की प्रत्येक नदी के व्यक्तिगत अधिकार को मान्यता मिलनी चाहिए और जो लोग भी इससे प्रभावित हो रहे है उन्हें उचित मुवावजा भी।दरअसल यह मामला सत्ररह वर्ष तक चले कानूनी लड़ाई के दौरान आया जब बांध प्रबंधकों ने 2001 में लगभग 5000000 क्यूबिक मीटर गाद को अंचिकाया नदी में बहा दिया था।इसके परिणामस्वरूप तटवर्तीय इलाकों में रहने वाले अफ्रो कोलंबियन समुदाय और नदी का पारिस्थितिकी तंत्र बुरी तरह प्रभावित हुआ।कोलंबिया इससे पूर्व अत्रातो नदी और पूर्ण कोलंबियन अमेजन के व्यक्तिगत अधिकारों की मान्यता प्रदान कर चुका है।

भारत के संदर्भ में देखे तो यहाँ सैकड़ों नदियाँँ प्रवाहित होती है और नदियाँ अर्थव्यवस्था का आधार भी है।नदियों के जल का उपयोग बहुउद्देश्यीय कार्यों में किया जाता है।जैसे पेय जल,सिंचाई ,विद्युत बनाने आदि में।नदियाँ कई जीव जंतुओं और वनस्पतियों का निवास स्थान होता है जो पर्यावरणीय दृष्टि या पारिस्थितिकी तंत्र के लिए अनिवार्य होते है।ऐसे में नदियों का प्रदूषित होना न ही मनुष्यों के हित में है और न ही नदियों के सेहत के लिए।भारत में शायद ही कोई ऐसी नदी बची है जिसको कहा जा सकता है कि यह प्रदूषण से मुक्त है। उत्तर भारत की जीवनदायिनी गंगा नदी के प्रदूषित होने पर तो अस्सी के दशक में ही भारत सरकार का ध्यान आकृष्ट हो गया था।तभी तो 1985 में गंगा एक्शन प्लान की शुरुआत की गई।लेकिन गंगा नदी के सेहत पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।

2008 में गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित किया गया और वर्तमान में गंगा जल को निर्मल बनाने हेतु नमामि गंगे परियोजना चल रही है जिसपर करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद नदी की स्थिति ज्यों की त्यों बनी हुई है।इसलिए 20 मार्च 2017 को उत्तराखंड हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में" गंगा और यमुना नदी तथा उसकी सहायक नदियों को जीवित इकाई का दर्जा "पैरेंट पीट्रीआई लीगल एक्ट "को आधार बना कर दिया। हांलाकि 7 जुलाई 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड सरकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए इस फैसले पर रोक लगा दी।प्रश्न उठता है कि गंगा और यमुना नदी को जीवित इकाई का दर्जा मिलने से क्या लाभ होता? दरअसल न्यायालय द्वारा नदियों को जीवित ईकाई का दर्जा देने का स्पष्ट अर्थ था कि नदियों को जीवित व्यक्ति के समान माना जाए और लोग इन नदियों के प्रति मनुष्यों के ही समान व्यवहार करे।जैसे यदि मनुष्यों के अधिकारों का हनन होता है तो वह न्यायालय के शरण में जाते है।

ठीक उसी प्रकार उत्तराखंड हाईकोर्ट के फैसले के पश्चात नदियों को प्रदूषित करने और उनका अतिक्रमण करने पर गंगा ,यमुना और सहायक नदियाँ अपने अभिभावकों नमामि गंगे परियोजना के निदेशक, उत्तराखंड सरकार के मुख्य सचिव और महाधिवक्ता के माध्यम से कोर्ट जा सकती थी क्योंकि पैरेंंट लीगल एक्ट के अंतर्गत गंगा और यमुना नदियों की देखरेख से संबंधित अधिकारियों और विभागों को इन नदियों का अभिभावक घोषित किया गया है।साथ ही यदि गंगा ,यमुना नदी द्वारा किसी प्रकार का लोगों का नुकसान होने पर गंगा, यमुना और सहायक नदियों के अभिभावकों के खिलाफ़ मुकदमा दर्ज किया जा सकता था।हाईकोर्ट के फैसले के अनुसार इन नदियों को नुकसान पहुंचाने वाले को कोर्ट वही सजा दे सकता था जो किसी इंसान को चोट पहुंचाने पर मिलती है।

उत्तराखंड हाईकोर्ट का यह फैसला भारत के संदर्भ में भले ही नवीन रहा है ,लेकिन विश्व के कई देशों में नदी को जीवित व्यक्ति का दर्जा प्राप्त हो चुका है। न्यूजीलैंड में वांगाई नदी को वहाँ की संसद ने " जीवित व्यक्ति" का दर्जा दिया है।चूंकि वहाँँ की माओरी जनजातियों का वांगाई नदी के प्रति अटूट श्रद्धा है।ये लोग नदियों और पर्वतों को देवता मानकर पूजा करते है।वांगाई नदी को जीवित व्यक्ति का दर्जा दिलाने में इन्होंने काफी लंबा और कठोर संघर्ष किया है।

देखा जाए तो भारत में भी नदियों को माँ का दर्जा प्राप्त है, खासकर गंगा नदी को बावजूद नमामि गंगे परियोजना में करोड़ों रुपये बहाने के पश्चात भी गंगा का जल दूषित ही है।जबकि गंगा नदी भी उत्तर भारत में आस्था का प्रतीक है।

भारत में गंगा और यमुना के अतिरिक्त कई नदियाँ अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है। जैसे मूसी,वर्धा, हिंडन,दामोदर,ओशिवारा, साबरमती,गोमती माही को लेकर 27 राज्यों की 150 नदियाँ प्रदूषित हो चुकी है जिसमें महाराष्ट्र सबसे ऊपर है।दूसरे नंबर पर गुजरात की नदियाँ है।तीसरे नंबर पर उत्तर प्रदेश है।नदियों के प्रदूषित होने का मतलब है पीने योग्य जल की उपलब्धता न होना , भूजलस्तर ,भूमि, कृषि का प्रदूषित होना आदि।इसके फलस्वरूप मनुष्यों ,पशुओं,मछलियों, अन्य जलीय जीवों और पक्षियों को प्रभावित करने वाली अत्यधिक गंभीर जलजनित बीमारियां और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं उत्पन्न हो रही है। दूषित जल के कारण मछलियों के वृद्धि और विकास पर तो काफी नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है ।साथ ही व्यापक पैमाने पर इनकी मृत्यु भी हो रही है।ज्ञात हो कि मछलियों का भोजन के रुप में भी इस्तेमाल किया जाता है।ऐसे में देखा जाए तो पेय जल से लेकर खाद्य पदार्थों तक नदियों का प्रदूषित जल मनुष्यों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डाल रहा है।लंबे समय तक चलने वाले जल प्रदूषण से जैवविविधता को नुकसान पहुंचता है।जिसके फलस्वरूप कुछ प्रजातियां विलुप्त हो जाती है या विलुप्ति के कगार पर पहुंच जाती है।जिससे नदियों का पारिस्थितिक तंत्र बुरी तरह प्रभावित होता है।

अतः कहा जा सकता है कि नदियाँँ हमारे लिए महत्वपूर्ण है।इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता और यूं ही समाप्त होने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता है।नदियों के समाप्त होने का अर्थ है मनुष्यों सहित पशु,पक्षी,जलीय जीव और वनस्पतियों के अस्तित्व को संकट में डालना।मनुष्य का विकास बगैर जैवविविधता के मुश्किल है क्योंकि जैवविविधता जीवन का आधार होता है।

चूंकि भारत में नदियों को प्रदूषण से बचाने हेतु करोड़ो रुपये खर्च हो चुके है खासकर गंगा नदी के ऊपर।बावजूद नदी के पानी को स्वच्छ नहीं बनाया जा सका है।ऐसे में आवश्यकता है कि यहाँ भी अत्रातो नदी की भाँति ,नदियों को कानूनी रूप से "एक जीवित व्यक्ति "का दर्जा प्रदान किया जाए ताकि नदियों को प्रदूषण मुक्त बनाया जा सके।ध्यातव्य है कि भारतीय संविधान में पर्यावरण सुरक्षा के संबंध में स्टाकहोम सम्मेलन 1972 में चर्चा के पश्चात ,नीति निदेशक तत्व में अनुच्छेद 48(क) को 1976 में 42 वें संविधान संशोधन द्वारा पर्यावरण सुरक्षा व संवर्धन को जोड़ा गया है।इसका अर्थ यह है कि भारतीय संविधान भी सत्तर के दशक से पर्यावरण सुरक्षा को लेकर गंभीर है।ऐसे में भारतीय नागरिकों का भी दायित्व है कि प्रकृति की सुरक्षा में सहयोग दे जिसमें नदियाँ भी सम्मिलित है।
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