एडल्ट्री कानून पर सुप्रीम कोर्ट को पुनर्विचार करना चाहिए !

एडल्ट्री कानून पर सुप्रीम कोर्ट को पुनर्विचार करना चाहिए !


सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले को लोग भारतीय,संस्कृति,परम्पराओ, मान्यताओं के विपरीत देख व मान रहे है। इस फैसले ने भारतीय नारी को देवी स्वरूपा से बदल कर उसे एक व्यभिचारी औरत बनने की छूट दे दी है। जो भारतीय सभ्यता ,मान्यता ,परम्परा के विपरीत है।

के सी शर्मा @उर्जांचल टाइगर 
आप सभी को मालूम ही हैं कि हर देश की अपनी एक विचार धारा और संस्कृति होती है। उस देश की चाहे कार्यपालिका हो,विधायिका हो या न्यायपालिका हो सभी उसी संस्कृति व विचारधारा के लिए संवैधानिक दायरे में रहते हुए राष्ट्र के संचालन में अपनी भूमिकाओ का निर्वहन करते है।

हमारे देश मे धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के कारण विभिन्न विचार धाराओं और संस्कृति को माननेवाले देश में महत्वपूर्ण स्थान व पदों पर विराजमान हैं। इनमें वामपंथी और कट्टरपंथी आदि विचारधारा के लोग भी हैं। हमारी न्यायपालिका तो अब तक जो भी फैसले सुनाती थी वह देश के संस्कृति,मान्यताओं,आस्थाओं,परम्पराओ को ध्यान में ही रख कर ही सुनाती थी। लेकिन इधर कुछ फैसले ऐसे भी आये है जिस पर देश की जनता टिका टिपणी करने लगी है और उन फैसलों को लोग भारतीय संस्कृति के विपरीत मानते है।

हाल में ही अभी चार दिन पहले आये एक अभूतपूर्व ऐतिहासिक फैसले ने पूरे देश मे ही इस फैसले को लेकर गर्मागर्म चर्चा सोसल मीडिया पर छाई हुई है।सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले को लोग भारतीय,संस्कृति,परम्पराओ, मान्यताओं के विपरीत देख व मान रहे है। इस फैसले ने भारतीय नारी को देवी स्वरूपा से बदल कर उसे एक व्यभिचारी औरत बनने की छूट दे दी है। जो भारतीय सभ्यता ,मान्यता ,परम्परा के विपरीत है।

यह भी देखने को मिल रहा है कि इस फैसले से सबसे ज्यादा आक्रोश उन महिलाओं में है जो भारतीय संस्कृति और मान्यता में विश्वास रखती है जो अपने पति को परमेश्वर मान पतिवर्ता धर्म का निर्वहन करते हुए अपना जीवन जी रही है।कारण इस देश की संस्कृति ,परम्परा,मान्यताएं पत्नी को पराए पुरुष अथवा दोस्त से शारीरिक सम्बन्ध बनाने की छूट नही देता है।हमारे देश मे सदियों से महिलाएं इस पति धर्म का पालन करती चली आ रही हैऔर आज भी अधिकांश कर रही है।

ये महिलाएं पहले पति को खाना खिलाने के बाद ही खुद खाती हैं। इतना ही नही ये हमेशा सुहागिन रहने के लिए तरह तरह का पूजा पाठ,वर्त,अनुष्ठान,मनोउती मांगते हुए पति के गोदी में ही अंतिम सांस लेने की कामना करती रहती हैं।

497 पर आए इस ऐतिहासिक,अभूतपूर्व फैसले में सुप्रीम कोर्ट की खण्ड पीठ ने पति के होते हुए पराए पुरुष से पत्नी का सहवास करना वैध मान लिया है और इसका विरोध करने वाले को दंड का भागीदार बना दिया है।चाहे यह पति के सामने ही क्यों न हो? 

इस देश की संस्कृति के विपरीत निर्णय देने वाले न्यायधीशों को अपने देश की मान्यताओं,परम्पराओ,आस्थाओं को ध्यान में रख निर्णय देना चाहिए था जो उचित रहता।हमारा संविधान भी सामाजिक कुकृत्यों को बढ़ावा देने की इजाजत नही देता है।

न्यायाधीश हो चाहे न्यायपालिका हो उन्हें ऐसे संवेदनशील मसले पर फैसला देते समय सतर्क रहना चाहिए। हमारे विचार से यह फैसला पुनर्विचार करने योग्य है और इस पर पुनर्विचार करना अदालत का धर्म भी बनता हैं।

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