NTPC- तीसरी पीढ़ी को नही मानती हैं विस्थापित !

विस्थापित


अपने ही जन्मभूमि पर बेगाने हुए विस्थापित....!
बढ रहा विस्थापितों में आक्रोश....!
कभी भी लामबंद हो कर कर सकते हैं आन्दोलन...!

By-के सी शर्मा,वरिष्ठ पत्रकार

उत्तर प्रदेश -मध्य प्रदेश की सीमा क्षेत्र में स्थित सिंगरौली परिक्षेत्र पिछले पांच दशकों में आज गांव से शहर बनने तक का सफर तय कर चुका है। इस काल खंड के दौरान सिंगरौली परिक्षेत्र में हुए वृहद ओद्योगिकरण के कारण आज यह क्षेत्र देश की उर्जाधानी होने का गौरव अर्जित कर चुका है।अब सिंगरौली परिक्षेत्र गांव से शहर और शहर से उर्जाधानी का सफर तय करते हुए मिनी भारत कहा जाने लगा है।यहां तक पहुचने में सिंगरौली को पांच दशक से अधिक का समय लगा है। इस सफर का आरंभ रिहन्द वाध के शिलान्यास के साथ शुरू होकर अब तक जारी है।जो अब सिंगरौली से सिंगापुर बनने की ओर धीरे धीरे अग्रसर है। जिसका सपना सिंगरौली वासियो को देश के प्रथम प्रधान मंत्री प0 जवाहर लाल नेहरू सहित म प्र के वर्तमान मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपने जन सभा के सम्बोधन के दौरान दशकों पहले ही दिखा दिया था।वह अब प्रलच्छीत भी होता दिख रहा है ।

सिंगापुर बनने की ओर अग्रसर सिंगरौली परिक्षेत्र के मूल वाशिंदे अब अपने ही जन्मभूमि पर बेघर होकर बेगानो की तरह इन पांच दशकों में मालिक से मजदूर बनके जीने को मजबूर  हो चुके है। ये लोग जो अपनी ही जन्मभूमि पर उसी तरह बिलुप्त हो गए है जिस तरह उनके राजस्व गांव के नाम का आता पता नही रह गया हैं।उसकी जगह यहाँ स्थापित परियोजनाओं का नाम आकर ले लिय।

सिंगरौली से मिनी भारत बन चुके इस क्षेत्र में यहा के मूल बाशिन्दे भी इस तरह से अपना अस्तित्व खो रहें हैं, जैसे साप्ताहिक बाजारों की भीड़ में यह पता नही चलता कि कौन कहा पर है। 

एक समय था जब इनकी अपनी खुद की पहचान थी। इनकी अपनी जमीन,गांव,घर,अपना समाज, संस्कृति ,रीति,रिवाज थे ,वह भी इसी के साथ साथ सब कुछ एक एक करके इतिहास बन कर पीछे छूट गया।उसकी जगह ले लिया आधुनिक आयातित पश्चात संस्कृति,जो पश्चिम के देशों से प्रभावित हैं।

इस आधुनिक पश्चात संस्कृति ने जहा सिंगरौली के सामूहिकता,परिवार ,समाज, गांव की एकता को नष्ट कर दिया हैं।गाँव,परिवार,समाज ,की महत्ता और उसके महत्व को तहस नहस ही नही कर दिया। वह इस कदर इन पर हावी हई की यहा का विस्थापित इन सब से धीरे धीरे दुर ही नही हुए बल्कि इसके गिरफ्त में आकर सभी तरह विकृतियों के शिकार हो गए ।

विस्थापित हुए खानाबदोश और अतिक्रणकारी हुए आवासीय

सिंगरौली क्षेत्र के मूल बाशिन्दे जिनकी जमीनें देश के विकास के नाम पर यहा स्थापित होने वाले ओद्योगिक प्रतिष्ठानों ने उद्योग स्थापना के समय तमाम तरह के सुनहरे सब्जबाग दिखा के अधिग्रहण कर ले लिया और उन्हें मूल बाशिन्दे से विस्थापित बना कर, पूर्वास स्थल पर आवंटित छोटे छोटे भू खंडों में ले जाकर बसा दिया। जहां दशकों बाद भी मूल भूत सुविधाओ का आज भी अभाव है।

बदहाली का आलम यह है की,पुनर्वास बस्तियों में बजबजाती दुर्गंध छोड़ती और बीमारी फैलती गन्दी नाली सहित बिजली,पानी,चिकित्सा, शिछा,आदि मूल भूत समस्याओ के अभाव वाली इन बस्तियों की पहचान पुनर्वास बस्ती के रूप में बन गयी हैं।

इन चार -पांच दशकों में विस्थापितों के परिवार की संख्या बढ़ने के कारण जहां एक ओर  इनके समक्ष अपने परिवार को रखने के लिए आवासीय समस्या खड़ी हो गयी है,वही दूसरी ओर परियोजनाएं तीसरी पीढ़ी को विस्थापित मानने से इनकार कर मुंह मोड़ लेने से यहां का विस्थापित अपने को अब ठगा महसूस कर रहा है।विकास के नाम पर विस्थापित किए गए ये लोग अब शरणार्थियों की जिंदगी जीने को  मजबूर हैं।

परियोजनाओं द्वारा आवश्यक्ता से अधिक विस्थापितों की जमीन अधिग्रण तो कर ली गयी हैं।लेकिन न तो परियोजनाएं उस जमीन का अब तक उपयोग कर पाई है,और न ही उनकी सुरक्षा कर पा रही है। हां, परियोजनाओं द्वरा अधिग्रहण किए गए खाली जमीन रसूखदार आयातित समाज के लोग अतिक्रमण कर बड़ी बड़ी बस्तियां और बाजार बसा लिया गया है। यह सब कोई चोरी छुपे नहीं बल्कि परियोजना के अधिकारियों के के सामने खुलेआम हुआ है। ऐसा कहा जाता है कि इन बस्तियों को स्थापित कराने में पर्दे के पीछे से परियोजना प्रवंधन,स्थानीय पुलिस प्रसाशन का खुला संरक्ष्ण हमेसा रहा है। जहां आज बड़ी बड़अट्टालिकाएं खड़ी है ।

ये अतिक्रमणकारी न केवल परियोजनाओं की फ्री जमीन, बिजली ,पानी आदि का पिछले तीन दशकों से लाभ उठाते हुए प्रति वर्ष परियोजनाओं को करोड़ो का नुकसान पहुचा रहे है बल्कि परियोजना की सुरक्षा के लिए भी चुनौती बने हुए हैं। इतना ही नही अब तो ये अपना इस पर अधिकार भी समझने लगे है और अगर कभीं परियोजना प्रबंधन अपनी ज़मीन, खाली करना चाहे ,या बिजली ,पानी चोरी रोकने का प्रयास करती है तो ये उसे संगठित हो आँख दिखाने से भी बाज नही आते। इस दशा को देख विस्थपितो को लगता हैं जैसे कोई उनके सीने पर "मूँग की दाल दल' रहा है। क्यो की अपनी जमीन पर परियोजना स्थापित करा देश के विकास में अहम भूमिका का निर्वहन करते हुए भूस्वामी से भूमिहीन बन बैठे।कल तक जो अपनी जमीनों के मालिक थे आज नौकर लायक भी नही समझे जा रहे हैं ।उसके लिए भी देश के दूसरे कोने से लोगो को बुला के काम दिया जा रहा हैं।

विकास के नाम पर विस्थापित लोगों के पेट मे अन्न नहीं, रहने को घर नहीं,जीविका के लिए रोजगार नहीं और उनकी जमीन पर बने परियाजनाओं की कालोनी और संरक्षण प्राप्त अवैध बस्ती में का चकाचौंध देख कर असन्तोष होना तो स्वभाविक ही है। यह सब भी तो परियोजना प्रबंधन की इस अदूरदर्शिता के कारण ही हुआ हैं। 
दशकों तक उपेक्षा सहन करते करते इनके सीने में बनी यह टीस धीरे धीरे असन्तोष और अब आक्रोश में तब्दील होती नजर आने लगी है। 

विस्थापितों ने किया "विस्थापित अधिकार मंच" का गठन,करेगें आंदोलन,भरेंगे हुंकार

एनटीपीसी परियोजना प्रबंधन ने गत दिनों चिल्काडाड के एक तीसरी पीढ़ी के युवा विस्थापित को यह कह कर कार्यालय से भगा दिया था कि वह तीसरे पीढ़ी का है।तीसरी पीढ़ी को हमारी कम्पनी विस्थापित नही मानती है। यह खबर सोसल मीडिया के इस जमाने मे आग की लपटों जैसी फैल गई।जो आग में घी डालने जैसे साबित हुई हैं।

इसी तरह शक्तिनगर के शापिंग सेंटर में चार महीने से एक विस्थापित की दुकान बंद करा प्रवंधन उसे भूख मरी के कगार पर पहुचा दिया है। अब वह दर दर की ठोकरे खाता फिर रहा है ।वह प्रबन्धन की चौखट का चक्कर काटता दुत्कार और तिरस्कार का शिकार होता डिप्रेशन में जा चुका है।

यह सब घटना क्रम वर्षो से असन्तोष आक्रोश में जी रहे विस्थापितों को जब लगा तो उनको लगा कि उनके अपने अस्तित्व पर अब संकट मंडराने लगा है तो वे संगठित होकर अपने मान,सम्मान,हक,हकूक की रक्षा करने का संकल्प ले लिए,औरअब वे नए सिरे से हुंकार भरने का निर्णय ले लिये है। जिसके क्रम में गत दिनों "विस्थापित अधिकार मंच"का गठन कर विस्थापितों के बैठकों का सिलसिला लगातार पिछले 15 दिनों से जारी है। विस्थापितों के गांव गांव में वैठके हो रही है।

मंच के जिम्मेदार लोगों ने बताया कि,इस समय गांव की कमेटियों के गठन का काम चल रहा है।आगामी 24 सितंबर को अगली बैठक ज्वाला मुखी मन्दिर के सामुदायिक हाल में होने वाली हैं जहाँ से आगे की रणनीति तय होगी ।

अब विस्थापितो ने मन बना लिया है कि जब तक उनके ज़मीन पर परियोजना चलेगी तब तक उनको परियोजना प्रबंधन को विस्थापित माने,चाहे वह कोई पीढ़ी का हो कि नीति बनानी पड़ेगी। विस्थापित यह नीति बनाने की अब मांग करेगा,और विस्थापित अब अपमान व उपेक्षा की जिंदगी नही जियेगा।चाहे उसे इसकी कोई भी कीमत चुकानी पड़े।

विस्थापितों का मानना है की एक तरफ उनकी जमीन पर अतिक्रमण कर आयातित समाज बस गया हैं और यहा का अपने को स्थानीय कहने लगे हैं। जिसके लिए परियोजना प्रबंधन जिम्मेदार है जो जरूरत से अधिक जमीन अधिग्रहित कर इस पर इतना बड़ा अतिक्रमण करने की खुली छुट दे रखी  हैं जो अब चलने वाला नही है ।

अतिक्रमणकारी यहा के मतदाता सूची में नाम जोड़वा लिये है,राशन कार्ड बनवा चुके है।फ्री की जमीन,बिजली,पानी शिक्षा,चिकित्सा ,रोजगार का लाभ उठा रहे है। 

विस्थापित अपने अस्तित्व व स्मिता की रक्षा के लिए वह परियोजना लगाने के लिए कौड़ी के भाव दी अपनी जमीन,मकान आदि के बदले अपने को हिस्सेदार घोषित कर अपानी भागीदारी सुनिस्चित करने की मांग करेगा।
बदह्हाली के स्थिति तक पहुंचा विस्थापित "मरता न क्या करता" कि तर्ज पर अब आर पार के "आंदोलन' करने की ओर बढ़ रहा है।

जानकारों का मानना है की,समय रहते परियोजना प्रबंधन और जिला प्रसाशन ने उपयुक्त कदम नही उठाया तो वह दिन दूर नही जब यह असन्तोष की चिंगारी इस क्षेत्र के ओद्योगिक शांति के लिए चुनौती न जाए।हतासा ,निराशा और आक्रोश तेजी से वढ रहा है। इसी परिस्थिति में ही क्रांति का जन्म होता रहा है,जिसका इतिहास खुद ही साक्षि हैं। इस लिए यह कहना अतिश्योक्ति नही होगा कि समय रहते परियोजन प्रबन्धन व जिला प्रशासन ने उपयुक्त कदम नही उठाया और भुखमरी के कगार पर आ के खड़े विस्थापितों का सही आंकलन कर कोई ठोस नीति नही बनाई तो अब वह दिन दूर नही है जब सिंगरौली क्षेत्र का विस्थापित अपने अस्तित्व पर आए संकट के खिलाफ हुंकार भरते हुए आन्दोलन का एलान न कर दे ?इस सम्भावना से इनकार भी नही किया जा सकता है।
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