जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही तय होनी ही चाहिए

संपादकीय



लोकतंत्र में चुना हुआ नुमाइंदा जनता का सेवक होता है,और सेवक के कार्यों की समीक्षा होना स्वाभाविक है।नेताओं को जवाबदेह बनाने के लिए उनके कार्यों की समीक्षा होनी ही चाहिए।

अब्दुल रशीद 
नोटबंदी के एक साल नौ महीने के बाद जब भारतीय रिजर्व बैंक की वार्षिक रिपोर्ट सामने आई है,जिस रिपोर्ट में साफ़ तौर से कहा गया है कि नोटबंदी के दौरान बंद हुए लगभग सभी पुराने नोट वापस आ चुके हैं 99.3 फीसदी से भी ज्यादा पुराने नोट रिजर्व बैंक के पास लौट आए हैं,ऐसे में यह सवाल उठ रहा है की आखिर नोटबंदी के समय हवाहावाई वायदा जनता से क्यों किया गया? 

दावों को औंधे मुंह गिरने के बाद जिम्मेदारी लेने के बजाय बहाने और चुप्पी से दो बातें स्पष्ट होती है,पहली अपरिपक्वता,दूसरा विपक्ष की बात नोटबंदी एक संगठित लूट,चाहे जो हो लेकिन नोटबंदी का कहर तो जनता पर ही पड़ा, एटीएम दर एटीएम भटकती रही,दिहाड़ी नौकरी दम तोड़ती रही,लघु और कुटीर उद्योग की लौ बुझती रही,खुशियां कागजों पर सिसकती रहीं,और गरीब जनता की जीवन दीप सरकारी फरमान को मानते मानते बुझ गई और कैशलेस के ढोंग के नाम पर विदेशी कम्पनियां कमीशन रूपी मलाई खा गई। 

तेल की बढती और रुपए की गिरती कीमत,जिसका सीधा असर आम जनता के जीवन पर पड़ रहा है,जैसे गंभीर विषय को मौजूदा राजनीती हास्यास्पद बनाने में लगी है,लेकिन स्थिति दिन प्रतिदिन गंभीर होती जा रही है। सरकार की उदासीनता और विपक्ष की सत्ता पाने की राजनीती, ग़रीब जनता के आर्थिक चोट पर मरहम लगाने के बजाय नमक छिड़कने का काम कर रही है। 

दरअसल यही वो भयावह कॉर्पोरेट समर्थित राजनीति है जिसके विषय में भूतपूर्व प्रधनमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने चिंता जताते हुए कहा था,सत्ता का खेल तो चलेगा,सरकारे आएंगी जाएंगी,पार्टियां बनेंगी बिगड़ेंगी, लेकिन यह देश रहना चाहिए,इस देश का लोकतंत्र अमर रहना चाहिए। 

बहरहाल मौजूदा वक्त में तेल कि बढ़ती क़ीमत से आम जनता परेशान है,और इस परेशानी पर पक्ष का तर्क कुतर्क ही लगता है,विपक्ष वही कर रही है जो पक्ष, विपक्ष में रह कर किया करती थी। 

यदि जुमले हो चुके पुराने नारों को भूल कर नया नारा “साफ़ नीयत सही विकास” पर यकीन कर भी ले तो यह बात समझ के परे है की केन्द्र सीधे-सीधे राज्यों से क्यों नहीं कह रही कि वो टैक्स कम करें, ठीक है, विपक्ष शासित राज्य इनकार करेगा लेकिन,ज्यादातर सरकारें या तो भाजपा की हैं या भाजपा के गठबंधन कि, वो कैसे इंकार करेगा। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की बात भला कौन टाल सकता है? दूसरी तरफ़ विपक्ष वैट घटा कर मिसाल पेश करने के बजाय भारत बंद कर अपने लिए संजीवनी इकठ्ठा करके सत्ता पर काबिज़ होना चाहती है।यही असल राजनीति है, बयानबाज़ी करते रहिए,आम जनता के भावनाओं से खेलते रहिए यानी हर कीमत पर बस छवि बची रहे।क्योंकि साफ़ छवि के सहारे सत्ता क़ायम रहे या सत्ता मिले का खेल ही तो राजनीती है। 

बयानों और सोशल मीडिया के जांबाज़ अफवाहबाज़ों के ज़रिए बहाने और झूठ गढ़ने के बजाय आम जनता के हित को प्रमुखता दे दें तो तेल क्या बहुत कुछ के दाम घट जाएंगे, लेकिन क्या कीजिएगा,हम आप अपने नेता को चाचा,मामा कहकर रिश्तेदार बना लेते हैं,या अवतार बनाकर आम से ख़ास बना देते हैं,परिणाम यह होता है की न तो हम आप अपने नेताओं से सवाल कर पाते हैं,और न ही आलोचना सुन सकते हैं। लोकतंत्र में चुना हुआ नुमाइंदा जनता का सेवक होता है,और सेवक के कार्यों की समीक्षा होना स्वाभाविक है।नेताओं को जवाबदेह बनाने के लिए उनके कार्यों की समीक्षा होनी ही चाहिए।
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