मुज़फ्फरनगर दंगा -नाउमींदी में न्याय का इंतज़ार, पुनर्वास के लिए यूपी सरकार के प्रयास अपर्याप्त - एमनेस्टी

मुज़फ्फरनगर दंगा

मुज़फ़्फ़रनगर दंगा पीड़ितों के राहत शिविर

न्यूज डेस्क।। 2013 में मुज़फ्फरनगर और शामली में हुए दंगे दंगों की पांचवीं वर्षगांठ के अवसर पर एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने कहा,की दंगो के पीड़ित आज भी नाउमींदी में न्याय का इंतज़ार कर रहे हैं। दंगोंसे आहत हुए लोग जो अपने घरों से बेघर हुए थे आज भी पुनर्वास बस्तियों की मलीनता के बीच अपना जीवन काटरहे हैं। सामूहिक बलात्कार की शिकार वह सात महिलायें जिन्होंने थानों में मामले दर्ज करने की हिम्मत दिखाई थी, वे आज भी न्याय से वंचित हैं।

एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के अस्मिताबासु, कार्यक्रम निर्देशक ने कहा “उत्तरप्रदेश शासन ने मुज़फ्फरनगर और शामली में हुए दंगों के पीड़ितों को पूरी तरह से भुला दिया है । हाल के वर्षों में देश में हुए सांप्रदायिक हिंसा की सबसे घातक घटना के पीड़ितों के प्रति यह उदासीनता किसी भी शर्त परस्वीकार्य नहीं है । जिस अन्याय का सामना इन पीड़ितों को करना पड़ा है उसके निवारण के लिए शासन ने कोई कदम नहीं उठाये हैं । पुनर्वासन और मुआवज़े के प्रति शासन के उठाये गए कदम बिकुल अपर्याप्त हैं,”।

अस्मिता बासु ने कहा “मुज़फ्फरनगर और शामली की सात साहसी महिलाओं ने, डराने और धमकाने की लगातार कोशिशों के बावजूद, सामूहिक बलात्कार के मामले दर्ज कराये थे। लेकिन, पांच सालों के बाद भी उन्हें न्याय मिलाने के आसार नज़र नहीं आते। अपनी ज़िन्दगियों और रोज़ी रोटी को फिर से जुटा पाने में उन्हें सरकार की तरफ से कोई मदद नहीं मिली है,”।

सामूहिक बलात्कार के सभी सात मामलों में पुलिस ने आरोपपत्र दाखिल करने में कई महीने लगा दिए – ज़्यादातर मामलों में 6 से 14 महीने। उसके बाद मामलों की सुनवाई बहुत धीमी गति से आगे बढ़ रही है। तीन मामलों में, प्रथम सूचना रिपोर्ट में पीड़िताओं ने जिन लोगों की पहचान की थी, उन्हें अदालत में पहचानने से इनकार कर दिया।इनमें से कुछ ने बाद में यह बताया कि दबाव और धमकियों के चलते अपने खुदकी और अपने परिवार की हिफाज़त को ध्यान में रखते हुए उन्हें ऐसा करने को मज़बूर होना पड़ा।

इन सात मामलों में से किसी में भी अभी तक आरोपियों को सज़ा नहीं हुई है। 2016 में, मामला दर्ज कराने वाली एक पीड़िता की अपने बच्चे को जन्म देते समय मृत्यु हो गयी ।

2013 की सांप्रदायिक हिंसा में 60 लोग मारे गए थे और 50,000 से ज़्यादा बेघर हुए थे। अपने गावों से बेघर हुई सैंकड़ों परिवारों को उस 50,000 रुपये के मुआवज़े से वंचित रखा गया जिसको `सबसे बुरी तरह प्रभावित‘ गाँवों के सभी परिवारों को देने का वादा उत्तर प्रदेश सरकार ने किया था। कुछ मामलों में अफसरी गलतियों की वजह से, कुछ में भ्रस्टाचार की वजह से तो कहीं `परिवार‘ की असंगत परिभाषा के इस्तेमाल की वजह से ।

पीडिता ने अगस्त 2018 में एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया को बताया “मैं अब पूरी तरह से विश्वास खो चुकी हूँ । शिकायत दर्ज़ करके अब पूरे पांच साल बीत चुके हैं। इतने सालों में मेरी या मेरे परिवार की मदद करने कोई भी नहीं आया। अब मुझे अपने पति की हिफाज़त और अपने परिवार को पालनेकी चिंता है”। 

वहीं मुज़फ़्फ़नगर में काम कर रहीं सामाजिक कार्यकर्ता रेहाना अदीब ने कहा, ‘पीड़ितों को सामाजिक और राजनीतिक दबाव का सामना करना पड़ा है। जैसा न्याय होना चाहिए था, वैसा नहीं हुआ। बलात्कारी पिछले कई सालों से खुले में घूम रहे हैं। महिलाएं अपने मामलों को आगे बढ़ाने से डर रहीं हैं और इसके लिए उन्हें दोषी नहीं ठहराया जा सकता है।’

एमनेस्टी ने कहा, ‘कई सारी मीडिया रिपोर्टें बताती हैं कि इन मामलों में समझौता किया गया है और सात परिवारों में से कई लोगों को पैसे की पेशकश की जा रही है। हमें उन परिस्थितियों को समझने की जरूरत है जिनमें ये महिलाएं पिछले कई सालों से रह रहीं हैं। ये लोग डरे हुए हैं और इनका प्रशासन से विश्वास उठ चुका है। ’

ए एफकेआर इंडिया फाउंडेशन (शामली स्थित एक गैर–सरकारी संस्था) के निर्देशक अकरम अख्तर चौधरी ने एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया से बात करते हुए कहा, “ज़मीनी स्तर पर हालत पहले जैसे ही हैं । 2013 में, दंगे केपीड़ित राहत शिविरों में रह रहे थे, तो आज वे पुनर्वास बस्तियों में रह रहे हैं जहाँ पीने का साफ़ पानी, स्वछता औरबिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है । दंगा पीड़ितों में से ज़्यादातर को अपना घर और उसमें मौजूद हरचीज़ को छोड़कर भागने के लिए मजबूर होना पड़ा था। शासन ने उन्हें दूसरी जगह पर बसने में मदद करने के लिएमुआवज़ा देने का वादा किया था पर ऐसे 200 से भी ज़्यादा परिवार हैं जिन्हें पिछले पांच सालों में एक पैसा नहींमिला है ।

पुनर्वास बस्तियों में रह रहे परिवारों में ज़्यादातर को बुनियादी सेवाएं उपलब्ध नहीं हैं। एक आंकलन के अनुसारमुज़फ्फरनगर की 82% बस्तियों में और शामली की 97% बस्तियों में पीने के लिए साफ़ और सुरक्षित पानी उपलब्धनहीं है जबकि मुज़फ्फरनगर की 61% में और शामली की 70% बस्तियों में जलनिकास (नाली) की व्ययस्था नहीं है। एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के शोधकर्ताओं ने 2017 में यह पाया कि जहाँ जहाँ वे गए वहां लोग मैली औरखतरनाक परिस्थितिओं में जीवनयापन कर रहे थे। शौचालय, जिनमें जल निकासी की अक्सर व्यवस्था नहीं थी, तीनया चार परिवार इस्तेमाल कर रहे थे ।

अस्मिता बासु ने कहा “मुज़फ्फरनगर और शामली दंगा पीडितों की ओर उत्तर प्रदेश सरकार का यह बेदर्द रुख संवैधानिक मूल्यों केपालन के प्रति उसकी प्रतिबद्धता का उलंघन है । दंगा पीड़ितों को गरीबी और भेदभाव के दुष्चक्र के भीतर जीने केलिए बाध्य किया गया है। उत्तरप्रदेश के मुख्यमत्री यह सुनिश्चित करें कि पीड़ितों की पुकार तुरंत सुनी जाए और न्याय देने में अब और देर न हो,”।
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