जब भारत अपने दर्शन व परंपराओं के तहत विकास कर रहा था तब जीडीपी में हिस्सा 23.9% था -प्रो.श्याम कार्तिक मिश्र

वाराणसी समाचार


अजीत नारायण सिंह 
ब्यूरो वाराणसी,उर्जांचल टाइगर 

सामाजिक विज्ञान संकाय, बीएचयू के प्रोफेसर एच.एन.त्रिपाठी स्मृति सभागार में पंडित दीनदयाल पीठ द्वारा दीनदयाल जयंती समारोह के अवसर पर “एकात्म मानववाद एवं अर्थ नीति” विषय पर व्याख्यान का आयोजन किया गया। समारोह का उद्घाटन मुख्य वक्ता प्रो. ए.डी.एन.वाजपेयी, पूर्व कुलपति हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, विशिष्ट अतिथि प्रो. गुलाब चन्द्र जायसवाल, कुलपति, पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय, प्रो. अचल कुमार गौर, विभागाध्यक्ष अर्थशास्त्र, रामसेवक पाठक, सामाजिक विज्ञान संकाय प्रमुख तथा प्रो. श्याम कार्तिक मिश्रा, पंडित दीनदयाल उपाध्याय चेयर द्वारा संयुक्त रूप से महामना मालवीय एवं पंडित दीनदयाल की मूर्तियों पर माल्यार्पण के साथ किया गया। 

इस अवसर पर पीठ चेयर प्रो. श्याम कार्तिक मिश्र ने आए अतिथिजनों का स्वागत करते हुए व्याख्यान विषय पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जब भारत अपने दर्शन अपनी परंपराओं के तहत विकास कर रहा था तब भारत का विश्व जीडीपी में हिस्सा 23.9% था लेकिन समय के साथ हमारे दर्शन बदल गए, यहाँ विदेशियों का शासन हुआ और भारतीय परम्परा, भारतीय दर्शन हमारी नीतियों से विलुप्त हो गयी। यही कारण है कि आज विश्व जीडीपी में भारत का हिस्सा 6% हो गया। अगर हम भारतीय दर्शन की ओर लौटने की वकालत करें तो हम अपनी उस ऊंचाई को एक बार फिर छू सकते हैं और पंडित जी का दर्शन वही दर्शन है, जिसपर हमे काम करना चाहिए। 

व्याख्यान समारोह में मुख्य वक्ता प्रो. ए.डी.एन.वाजपेयी ने अपने विचार प्रस्तुत करते हुए कहा कि जब हम अर्थ नीति और एकात्म मानववाद की बात करते हैं तो इसमें धर्म,अर्थ, काम,मोक्ष सबका समन्वय होता, इसमें किसी एक को भी छोड़कर हम नीति की कल्पना ही नहीं कर सकते। 

पंडित जी के एकात्म मानववाद में हमारी आर्थिक नीतियों की इन्ही कमियों को रेखांकित किया गया है और जब हम यह प्रश्न सुलझा ले कि हमारी आर्थिक नीति का निर्धारण वितरण के आधार पर होना चाहिए या क्रयशक्ति के आधार पर तब हम पूर्ण रूपेण उसे अपनाकर उनको सच्ची श्रद्धांजलि दे सकते हैं। 

समारोह के विशिष्ट अतिथि गुलाब चंद्र जयसवाल ने व्याख्यान विषय पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज के परिप्रेक्ष्य में पंडित जी के इस विचार की नितांत आवश्यकता है क्योंकि आज हमारे भारत के लोगों में नैतिक मूल्यों की भी गिरावट हो रही, जिसका असर हमारे मूल्यों पर हो रहा, हमारे परिवार टूट रहे, लोग एक-दूसरे से दूर हो रहे और इसका कारण ही यही है की हमने अपनी संस्कृति को भुलाकर पश्चिमी दर्शन को अपनाया है। 

एकात्म मानववाद व अर्थ नीति पर अजय कुमार गौर ने कहा कि आज की आर्थिक नीतियां एकात्म मानववाद की अवधारणा के बिल्कुल उलट है और इस असमानताओं की खाई को पाटने के लिए ही हमें एकात्म मानववाद की ओर जाना होगा। 

अध्यक्षीय भाषण में प्रो. रामसेवक पाठक ने कहा कि भारतीय चिंतन जीवन में भोग और त्याग के बीच का समन्वय है, यही समन्वय पंडित जी के दर्शन का मूल है जो कहता है कि आवश्यकता के अनुसार ही उत्पादन का बंटवारा होना चाहिए, जिसे अपनाकर ही समाज में व्याप्त असमानताओं को दूर किया जा सकता है। 

समारोह में मुख्य रूप से प्रो. आर.आर.झा, प्रो. जयकांत तिवारी, प्रो.अजय प्रकाश सिंह,डॉ.दीनानाथ सिंह, डॉ.प्रवीण, डॉ. कमल शर्मा, डॉ. रामसागर मिश्र, डॉ. राकेश पांडेय, डॉ.वसुंधरा, डॉ. शिखा मिश्रा, डॉ.ओमप्रकाश तथा सैंकड़ों छात्र-छात्राएं उपस्थित थे। कार्यक्रम में मंच संचालक की भूमिका डॉ.सीमा मिश्रा ने निभाई तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ.स्वर्ण सुमन ने दिया।
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