आरक्षण-राजनैतिक होता सामाजिक मुद्दा

आरक्षण


सरकारी नौकरी की कमी और बेरोजगार युवाओं में सरकारी नौकरी के प्रति आकर्षण को भांप कर अब नौकरी में भी आरक्षण की मांग का मुद्दा उठा कर राजनीतिक दलें वोट बैंक को मजबूत करने में लगी है। 


अब्दुल रशीद 
पाटीदारों के लिए सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षण संस्थानों में आरक्षण और किसानों की कर्जमाफी की मांग करते हुए हार्दिक पटेल 25अगस्त 2018 महाक्रांति रैली की तीसरी सालगिरह पर अनशन पर बैठे थे। इस अनशन के टूटने के साथ उनका तिलिस्म भी ढह गया, मांगो को मानना तो दूर सरकार का कोई नुमाइंदा उनसे मिलने तक नहीं पहुंचा,और न ही उनके अनशन को उनके अपनों का पूरा समर्थन मिला। 
18 दिन के बाद उन्होंने यह कहते हुए अनशन खत्म किया- 'मैं समुदाय के बड़ों के सम्मान में अनशन खत्म कर रहा हूं। अब वे मेरे साथ हैं तो मुझे किसी बात की चिंता नहीं है। मैं 19 दिन के उपवास के बाद रीचार्ज हो गया हूं और अगर जरूरत पड़ी तो, अगले 19 साल तक लड़ना जारी रखूंगा।' 
आरक्षण के नाम पर देश भर में आंदोलन होता रहा है और अब भी जारी है। अब आर्थिक आधार पर पिछड़े सभी समुदाय के लोग किसी न किसी रूप में आरक्षण की मांग कर रहे हैं। सरकार से अपने हक़ मांगने के लिए लोकतान्त्रिक तरीके से आंदोलन करना तो ठीक है,लेकिन आन्दोलन का उग्र और हिंसात्मक हो जाने को सही कैसे कहा जा सकता है। 

कॉर्पोरेट जगत भले ही कामयाबी के नए आयाम छूने में कामयाब हो रहा हो लेकिन आज भी सबसे ज्यादा रोजगार देने वाला क्षेत्र सरकारी क्षेत्र ही है। प्राइवेट जॉब के चकाचौंध को दरकिनार कर सरकारी नौकरी का आकर्षण कायम है। भारत में सरकारी नौकरी का महत्व और आकर्षण की मुख्य वजह है, भौतिक और मानसिक रूप से मिलने वाली गारंटी की अब वह अपने पूरे कार्यकाल के लिए सुरक्षित है। 

सरकारी नौकरी का आकर्षण और जनसंख्या के अनुपात में कम अवसर से रोजगार पाने की बढ़ी प्रतिस्पर्धा के बीच रोजगार पाने के लिए बेरोजगार युवाओं को आरक्षण सरल और सफल रास्ता दिखाई पड़ता है। क्योंकि आरक्षण में भी प्रतिस्पर्धा रहता है लेकिन कम। 

वर्त्तमान में भारत की केंद्र सरकार उच्च शिक्षा में 49.5% आरक्षण देती है।आरक्षण देने के लिए ज्यादातर राज्य सरकारें सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को आधार बनाती है जिसमें कहा गया था के कोई भी राज्य 50% से ज्यादा आरक्षण नहीं दे सकता है। क्योंकि एक तरफ हमें मेरिट का ध्यान रखना है तो दूसरी तरफ सामाजिक न्याय का भी ध्यान रखना होगा। लेकिन राजस्थान और तमिलनाडु जैसे कुछ राज्यों ने क्रमशः 68% और 87% तक आरक्षण का प्रस्ताव रखा है, जिसमें अगड़ी जातियों के लिए 14% आरक्षण भी शामिल है। 

आज़ादी के बाद से जनसंख्या जिस रफ़्तार से बढ़ी उस की तुलना में सरकारी नौकरी में उतना बढ़ोतरी नहीं हुआ। मौजूदा समय में हालत और भी ख़राब है। सरकारी नौकरी की कमी और बेरोजगार युवाओं में सरकारी नौकरी के प्रति आकर्षण को भांप कर अब नौकरी में भी आरक्षण की मांग का मुद्दा उठा कर राजनीतिक दलें वोट बैंक को मजबूत करने में लगी है। 

वोट बैंक को साधने के लिए राजनीतिक दलें आरक्षण का वायदा समय समय पर करती रहती हैं,वोट बैंक की यही राजनीती लोगों को आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलित करता है। 

दरअसल आरक्षण से ज्यादा घातक आरक्षण के बहाने वोट बैंक साधने की राजनीती है। यह वोट बैंक की राजनीति का ही परिणाम है, कि आरक्षण व्यवस्था के खिलाफ खड़े सवर्ण उसी व्यवस्था में अब जगह पाने के लिए आर पार की लड़ाई की बात कह रहे हैं। 

1947 में आज़ादी के वक्त डॉ. अंबेडकर ने 10 साल के लिए पिछड़ी जातियों को आगे लाने के मकसद से आरक्षण का प्रस्ताव रखा,जो सात दशक के बाद भी कायम है। 

निष्पक्षता से कहा जाय तो जो मुद्दा वोटबैंक की राजनीती साधने में कारगर होता है उन मुद्दों का निराकरण होता ही नहीं या यूं कहे सत्ता की चाह में राजनीतिक दल होने ही नहीं देते, उल्टा उसका विस्तार होता रहता है। 

आरक्षण एक ऐसा मुद्दा है जिसका सीधा फायदा यदि समाज के कुछ वर्ग को है तो कुछ को इसमें अपना नुकसान साफ़ दिखता है। जब हम अनेकता में एकता की बात करते हैं तो ऐसे में सब की बात होनी ही चाहिए। अब समय आ गया है कि सरकारी और सामाजिक,प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष हर तरह के आरक्षण पर खुल कर चर्चा हो और इसकी व्यापक समीक्षा की जाए।

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