क्यों मालदीव में राष्ट्रपति चुनाव का नतीजा भारत के लिए अच्छी खबर है

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है।ऐसे में लोकतांत्रिक मूल्यों का बनाए रखने के लिए मालदीव में भारतीय सक्रियता आवश्यक है।


मालदीव में हुए चुनाव में भारत समर्थक विपक्षी नेता इब्राहिम मोहम्मद सालेह ने भारी मतों से जीत दर्ज की है।वहीं चीन समर्थक अब्दुल्ला यामीन को हार का सामना करना पड़ा है।अब्दुल्ला यामीन ने फरवरी 2018 में अपनी सत्ता बचाने के लिए मालदीव को राजनीतिक एवं संवैधानिक संकट में डाल दिया था।

 राहुल लाल
मालदीव के इस संपूर्ण संकट के पीछे चीन महत्वपूर्ण घटक है।चीन भारत के घेराबंदी के लिए लगातार सक्रिय है।इस संदर्भ में चीन के पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट,श्री लंका के हंबनटोटा बंदरगाह इत्यादि को देखा जा सकता है।बांग्लादेश और म्यांमार में भी चीनी आक्रमता किसी से छिपी नहीं है।अब चीन मालदीव के महत्वपूर्ण रणनीतिक भूमि से भारत की घेराबंदी के लिए प्रयत्नशील है।मालदीव में जिस प्रकार पहले राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश मानने से इंकार किया तथा बाद में सुप्रीम कोर्ट के दरवाजों को तोड़कर चीफ जस्टिस को गिरफ्तार किया,वह अत्यंत शर्मनाक है।लेकिन अब मालदीव में लोकतंत्र की जीत से भारत पुनः मजबूत स्थिति में आ गया है।लेकिन भारत के लिए यह आवश्यक है कि वह मालदीव में लोकतांत्रिक मूल्यों के पोषण हेतु मालदीव में कूटनीतिक दृष्टि से सक्रिय भूमिका का निर्वहन करें।

हिंद महासागर का छोटा सा द्वीपीय देश मालदीव इस वर्ष गहरे सियासी और संवैधानिक संकट से जूझते रहा था।लेकिन अब मालदीव की जनता ने अपने लोकतांत्रिक शक्तियों का प्रयोग करते हुए चीन समर्थक अब्दुल्ला यामीन को हराकर संयुक्त विपक्षी गठबंधन के नेता इब्राहिम मोहम्मद सालेह को विजयी बनाया है।मालदीव चुनाव आयोग के अनुसार सालेह को 58.3% मत मिले हैं।मालदिवियन डेमोक्रेटिक फ्रंट के नेता इब्राहिम मोहम्मद सालेह अगले राष्ट्रपति बनेंगे।इब्राहिम भारत के साथ मजबूत संबंधों के हिमायती रहे हैं।वहीं निवर्तमान राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन चीन के कट्टर समर्थक रहे हैं।यामीन के खिलाफ पूरा विपक्ष एक मंच पर आ गया था। इब्राहिम मोहम्मद सालेह मालदीव डेमोक्रेटिक पार्टी के नेतृत्व वाले संयुक्त विपक्ष के राष्ट्रपति उम्मीदवार हैं।इस गठबंधन में जम्हूरी पार्टी ,अदालत पार्टी और प्रोग्रेसिव पार्टी ऑफ मालदीव्स(पीपीएम) का एक धड़ा भी शामिल है।सत्तामें आने के बाद से ही यामीन ने कई ऐसे कानून बनाए,जिनसे विपक्षी नेता या तो जेल में डार दिए गए या उन्हें देश छोड़ना पड़ा।

मालदीव चुनाव आयोग के अनुसार करीब 4 लाख नागरिकों में से 2 लाख 60 लोगों ने वोट किया।इब्राहिम मोहम्मद सालेह को 1,33,808 वोट मिले।भारत और अमेरिका ने इब्राहिम मोहम्मद सालेह की जीत का समर्थन किया है।

इस वर्ष फरवरी में मालदीव के सर्वोच्च अदालत ने पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद पर चल रहे मुकदमे को असंवैधानिक करार दिया था और कैद किए गए विपक्ष के नौ सांसदों को रिहा करने के भी आदेश दिए थे और कैद किए गए विपक्ष के नौ सांसदों को रिहा करने का आदेश भी जारी किया था।यह सियासी तूफान इतना प्रबल था कि इसकी हलचलें भारत और चीन तक सुनाई दे रही थी।सुप्रीम कोर्ट द्वारा विपक्षी नेताओं को राजनीतिक मामलों में बरी करने और राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन के इस आदेश को मानने से इंकार करने की पृष्ठभूमि में यह संकट उत्पन्न हुआ है।नई परिस्थिति में राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन ने पहले15 दिनों के आपातकाल की घोषणा की और संसद भंग की कर दी थी। आपातकाल की घोषणा के कुछ देर बाद ही सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे तोड़कर चीफ जस्टिस अब्दुल्ला सईद और दूसरे जजों के साथ पूर्व राष्ट्रपति मौमून.अब्दुल गयूम को गिरफ्तार कर लिया गया था।गिरफ्तारी पूर्व मालदीव के सुप्रीम कोर्ट ने भारत से विधि का शासन एवं संवैधानिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए मदद मांगी थी।भारत समर्थक मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद ने राजनीतिक संकट के समाधान के लिए भारत से मदद मांगी ।मोहम्मद नसीद ने भी भारत से त्वरित सैन्य कार्यवाई की माँग की थी।

आखिर मामला क्या था?

मालदीव के फरवरी 2018 के ताजा राजनीतिक संकट की जड़ें 2012 में तत्कालीन और पहले निर्वाचित राष्ट्रपति मुहम्मद नशीद के तख्तापलट से जुड़ी है।नशीद के तख्तापलट के बाद अब्दुल्ला यामीन राष्ट्रपति बने।उन्होंने चुन-चुनकर अपने विरोधियों को निशाना बनाया।नशीद को 2015 में आतंकवाद के आरोपों में 13 साल जेल की सजा हुई,लेकिन वह इलाज के लिए ब्रिटेन चले गए और वहीं राजनीतिक शरण भी ले ली।अभी वे श्रीलंका में हैं।फरवरी 2018 मेें जब मालदीप के सुप्रीम कोर्ट ने नशीद समेत 9 राजनीतिक बंदियों को को रिहा करने का आदेश दिया।सुप्रीम कोर्ट ने अब्दुल्ला यामीन की पार्टी से बगावत करने वाले 12 सांसदों को भी बहाल करने का आदेश दिया।इन 12 सांसदों की बहाली होने से राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन सरकार अल्पमत में आ जाती और भारत समर्थक मुहम्मद नशीद की पार्टी नई अगुवाई वाला संयुक्त विपक्ष बहुमत में आ जाता।लेकिन अब्दुल्ला यामीन ने कोर्ट के आदेश को मानने से इंकार कर दिया और सेना को आदेश दिया कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश को नहीं माने।इस बीच गिरफ्तारी से बचे हुए शेष जजों ने दबाव में आकर 9 राजनीतिक कैदियों के रिहाई का फैसला वापस ले लिया है।

फरवरी 2018 के मालदीव के इस संवैधानिक संकट के साथ ही भारत-मालदीव संबंधों में और ज्यादा तनाव आ गया था।मालदीव की कंपनियों ने अपने विज्ञापन में कह दिया कि भारतीय नौकरी के लिए आवेदन नहीं करें,क्योंकि उन्हें वर्क वीजा नहीं मिलेगा।इस दौरान मालदीव पर जबरदस्त चीन के प्रभाव का अंंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि भारत के तरफ से मालदीप को उपहारस्वरूप स्वरूप दिए गए दो हेलीकॉप्टरों को भी भारत को लौटा दिया गया।यह भारतीय मालदीव में भारत की सैन्य और कूटनीतिक नीतियों को तगड़ा झटका था।लेकिन अब मालदीव की जनता ने भारत को पुनः मालदीव में अपनी सक्रिय भूमिका के लिए भी मतदान किया है।

अगर भारत हिंद प्रशांत क्षेत्र में खुद को एक महाशक्ति तथा सुरक्षा गारंटर के रुप में स्थापित करने का सपना देखता है,तो इसे हर हाल में अपने पड़ोस के मुल्क के लिए ज्यादा सक्रिय नीति अपनानी होगी।इस संपूर्ण संकट के पृष्ठभूमि में ड्रेगन की परछाई स्पष्टतः देखी जा सकती है।चीन जिसका वर्ष 2011 तक माले में दूतावास तक नहीं था,भारत के ठीक पड़ोस में स्थित इस छोटे से देश की घरेलू राजनीति में प्रमुख खिलाड़ी बन चुका है।

चीन द्वारा भारत की घेराबंदी लगातार रणनीतिक स्तर पर जारी है।इस संदर्भ में पाकिस्तान का ग्वादर पोर्ट और श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह में चीनी सक्रियता को हम लोग देख सकते हैं।हंबनटोटा को चीन ने श्रीलंका से 99 वर्ष के लीज पर लिया है।ऐसे में मालदीव में चीनी प्रभाव कम करना भारत के लिए आवश्यक है।

भारतीय मुख्य भूभाग से मालदीप की दूरी करीब 1200 किमी है।लक्षद्वीप से तो इसकी दूरी केवल 700 किमी की है।जिस तरह हालत अभी मालदीप में हैं,उसके चलते वहाँ उग्रवाद, धार्मिक कट्टरपंथ,समुद्री डकैती जैसी समस्याएँ उभर सकती हैं,जो भारत के लिए चिंता की बात है।ऐसे में भारतीय सक्रियता की वहाँ कितनी आवश्यक है,उसे बखूबी समझा जा सकता है।मालदीव में करीब 22 हजार भारतीय रहते हैं।वहाँ करीब 400 डॉक्टर हैं,जिसमें से 125 डॉक्टर भारतीय हैं।इसी तरह 25% अध्यापक भी भारतीय है।

भारत बीते एक दशक से मालदीव के अंदरूनी मामले में हस्तक्षेप करने से बच रहा है।इसका सीधा फायदा चीन को मिलता दिख रहा है।राष्ट्रपति शी जिनपिंग की खास तैयारियाँ यहाँ साफ देखी जा सकती है।राष्ट्रपति शी जिनपिंग जब भारत आए थे,तब वे मालदीप और श्रीलंका होते हुए आए थे।दोनों देशों में मैरी टाइम सिल्क रुट से जुड़े एमओयू पर हस्ताक्षर किए गए लेकिन जब जिनपिंग भारत आए तो इस मुद्दे पर पूरी तरह से चुप्पी रही।

पिछले वर्ष दिसंबर में मालदीव ने चीन के साथ मुक्त व्यापार पर समझौता किया,परंतु यह समझौता इतना तीव्र गति से संसद से पारित हुआ कि सत्तारूढ़ सांसदों को बमुश्किल पढ़ने का समय दिया और विपक्ष को अंधेरे में रखा।स्थिति यह है कि समझौते का विवरण अभी तक न तो सार्वजनिक हुआ है,और न ही विपक्ष के साथ इसे साझा किया गया है।सरकार ने 1000 पेज के दस्तावेज की मंजूरी के लिए पूरी संसद को एक घंटे से भी कम का समय दिया है।दिसंबर में चीन और मालदीव के बीच 12 समझौतें हुए थे,इसमें चीन की महत्वाकांक्षी योजना "वन बेल्ट वन रोड" भी शामिल है।

चीन के लिए 4,0000 की आबादी वाले देश में आर्थिक संभावनाएँ बहुत सीमित है।समझा जा सकता है कि बीजिंग की मालदीव में रुचि पूर्णत:रणनीतिक है।चीन पर्दे के पीछे से ऐसे जाल बुन रहा,जिससे मालदीप और नई दिल्ली में दूरी बढ़ जाए।ऐसे में भारत के लिए अब सक्रिय होना अपरिहार्य हो गया है।

हिंद महासागर आस्ट्रेलिया, दक्षिणपूर्वी एशिया,दक्षिण एशिया,पश्चिम एशिया और अफ्रीका के पूर्वी इलाके को छूता है।इस इलाके में 40 से ज्यादा देश आते हैं,जिसमें दुनिया की 40% आबादी रहती है।मालदीव भी इस क्षेत्र का महत्वपूर्ण देश है।भारत का अधिकतर अंतरराष्ट्रीय व्यापार हिंद महासागर से होता है।इसलिए यहाँ से गुजरने वाले समुद्री मार्गों का सुरक्षित होना भारत के लिए काफी महत्वपूर्ण है।

हिंद महासागर में भारत को घेरने की कवायद कर रहा चीन भी मालदीव पर अपनी पकड़ मजबूत करने में लगा हुआ है।मालदीप अपने कुछ द्वीप चीन को पट्टे पर भी दे चुका है।आशंका जताई जा रही है कि चीन इसका इस्तेमाल भारत पर निगरानी संबंधी गतिविधियों में करने के लिए वहाँ सैन्य बेस बनाने के लिए इच्छुक है।

पिछले चार वर्षों में चीन लगभग दो तिहाई दक्षिण चीन महासागर में केवल मनौवैज्ञानिक दबाव बनाकर कब्जा कर चुका है।भारत को ऐसे में हिंद महासागर में स्वतंत्र नौवहन की व्यवस्था करने के लिए विश्व समुदाय के साथ मालदीव में सक्रिय होना आवश्यक है।

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है।ऐसे में लोकतांत्रिक मूल्यों का बनाए रखने के लिए मालदीव में भारतीय सक्रियता आवश्यक है।।स्वतंत्र न्यायपालिका लोकतंत्र में अपरिहार्य है,ऐसे में मालदीप में जिस तरह पहले तो सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन हुआ,वही दुर्भाग्यपूर्ण रहा।उसके बाद सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे को तोड़कर जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस की गिरफ्तारी हुई,वह शर्मसार करने वाला था।

भारत के लिए हिंद महासागर में अपने वर्चस्व को प्रदर्शित करने का यह सबसे महत्वपूर्ण अवसर है,जहाँ भारत मालदीप में सक्रिय भूमिका का निर्वहन कर लोकतंत्र की जड़ों को और भी मजबूत कर सकता है।भारत के ऐसे किसी भी कार्यवाई को वहाँ के जनता का पूर्ण समर्थन प्राप्त होगा।भारत
सदैव मालदीव के निकटस्थ मित्र की भूमिका में रहा है।दिसंबर 2014 में जब माले में पानी आपू्र्ति कंपनी के जेनरेटर पैनल में आग लग गई थी,तो भारत ने तत्काल मदद करते हुए आईएनएस सुकन्या एवं आईएनएस दीपक को पेयजल के साथ रवाना किया था।इसके अतिरिक्त भारतीय वायुसेना ने भी एयरक्राफ्ट के माध्यम से मालदीव में पानी पहुँचाया था।इस संपूर्ण ऑपरेशन को ऑपरेशन नीर के नाम से जाना जाता है।

भारत इसके पूर्व भी 1988 में तत्कालीन मालदीप के राष्ट्रपति के अनुरोध पर "ऑपरेशन कैक्टस" को संचालित किया था। इसमें इमरजेंसी मैसेज के केवल 9 घंटे बाद ही भारतीय कमांडो मालदीव पहुँचे।भारतीय सेना ने कुछ ही घंटों में सब कुछ अपने नियंत्रण में ले लिया और मालदीव के तख्तापलट को नाकाम कर दिया।मालदीव के लोकतांत्रिक मूल्यों के भारत को सदैव इसी प्रकार सक्रिय रहने की आवश्यकता है। मालदीव के जनता के आकांक्षाओं पर उतरना भारत के लिए महत्वपूर्ण है।भारत के आक्रामक और सक्रिय कूटनीति से हिंद महासागर को स्वतंत्र नौपरिवहन क्षेत्र बनाने में काफी सहायक होगी।

भारत ने पिछले ही वर्ष डोकलाम में अपने हितों की रक्षा के लिए भूटान के जमीन से चीन को चुनौती देने के लिए आक्रामक और सक्रिय कूटनीति को प्रतिबंबित किया था।इससे भारत की न केवल वैश्विक प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई थी अपितु आसियान देशों में भी चीनी वर्चस्व के विरुद्ध संघर्ष में भारत को प्रभावी राष्ट्र के रुप में स्वीकार किया गया।अगर भारत मालदीव मेें भी लोकतान्त्रिक मूल्यों के कार्य सक्रिय रहता है,तो ,तो इससे सार्क देशों में भारत को लेकर एक सशक्त संदेश जाएगा,जो वर्तमान परिप्रेक्ष्य में काफी महत्वपूर्ण है।नि:संदेह मालदीव के जनता के इस लोकतांत्रिक जीत से हिंद महासागर में न केवल लोकतांत्रिक मूल्य मजबूत होंगे,अपितु हिंद महासागर में भारतीय सामरिक स्थिति भी मजबूत होगी।

Post a Comment

MKRdezign

Contact Form

Name

Email *

Message *

Powered by Blogger.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget