टेढ़े-मेढ़े दाँतों से बिगड़ सकता है आपका जायका और स्वास्थ्य

टेढ़े-मेढ़े दाँतो से बिगड़ सकता है आपका जायका और स्वास्थ्य


दंत चिकित्सा संस्थान बीएचयू के आर्थोडोन्टिक स्टडी ग्रुप ने शोध में पाया कि पूर्वी उत्तर प्रदेश, दिल्ली सहित देश के अधिकांश हिस्सों में है 40-50 फीसदी तक टेढ़े-मेढ़े दांतों की समस्या। 
न्यूज डेस्क,उर्जांचल टाइगर 

वाराणसी।। व्यक्तित्व के प्रस्तुतिकरण में चेहरे के अलावा एक और महत्वपूर्ण हिस्सा हमारी मुस्कान है। अपने चेहरे की देखभाल चाहे कितनी भी अच्छी तरह से क्यों न की हो, अगर आपने अपने दांतों के सौंदर्य पर ध्यान नहीं दिया तो चेहरे का सौंदर्य कई बार बेमानी होता है। इसीलिए अपने दांतों को साफ, सफेद और चमकदार बनाए रखने के लिए भी प्रयत्न बेहद आवश्यक हैं। अक्सर देखा गया है कि बहुत लोगों के दांत टेढ़े-मेढ़े होते हैं, जिस वजह से उनकी मुस्कान कभी-कभी फीकी पड़ जाती है लेकिन अगर आपके दांत टेढ़े-मेढ़े हैं तो फीकी मुस्कान के साथ आपको शारीरिक और मानसिक समस्या का भी सामना करना पड़ सकता है! इसका पता लगाया है वाराणसी स्थित बीएचयू के दंत चिकित्सा संस्थान के आर्थोडोन्टिक स्टडी ग्रुप ने। शोध से पता चला है कि टेढ़े-मेढ़े दांत की वजह से व्यक्ति को दांत एवं मसूड़ों की बीमारी के अलावा खाने में दिक्कत, दांतों का घिसना, बोलने में दिक्कत, दांतों का टूटना या गिरना, जबडे़ के जोड़ में दर्द और बच्चों के मानसिक विकास में बाधा होने जैसी समस्या होती है। अगर आपके दांत टेढ़े-मेढ़े है तो परेशान होने की बहुत जरूरत नहीं है इसका इलाज बीएचयू के दंत चिकित्सा संस्थान में है। 

एक सर्वे के मुताबिक पूर्वी उत्तर प्रदेश, दिल्ली समेत देश के अधिकांश हिस्सों में 40-50 फीसदी तक टेढ़े-मेढ़े दांतों की समस्या का पता चला है। शहरी और ग्रामीण इलाकों के 12 से 16 वर्ष के बच्चों पर किए गए शोध में 49 प्रतिशत बच्चे टेढे़-मेढे़ दांत एवं जबडा़े की समस्या से ग्रसित है। हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों में निम्नतम 12 प्रतिशत एवं दक्षिण भारत में अधिकतम 70 से 80 प्रतिशत तक यह समस्या मिलती है। दुनिया के बाकी मुल्कों जैसे अमेरिका में भी यह समस्या अधिकतम 80 प्रतिशत तक पायी गयी है। इस अध्ययन के मुताबिक पूर्वी उत्तर प्रदेश में हर दूसरे बच्चे को आर्थोडोन्टिक इलाज की जरुरत है। यह सर्वे बीएचयू के दंत चिकित्सा संस्थान के वाराणसी आर्थोडोन्टिक स्टडी ग्रुप द्वारा किया गया जिसमें प्रो. टी.पी. चतुर्वेदी के निर्देशन में डाॅ. नीतीश शुक्ला, डाॅ. आदित एवं डाॅ. टी.बी. सिंह द्वारा किया गया है। शोध में मालूम हुआ है कि आर्थोडोन्टिक (विकृृत दन्त) की परेशानी मुख्यतः अनुवंशिक (हेरिडिटरी) एवं वातावरणीय कारणों से होती है। इससे दाँत एवं मसूड़ों की बीमारी, खाने में दिक्कत, दांतों का घिसना, बोलने में दिक्कत, दाँतो का टूटना या गिरना, जबडे़ के जोड़ में दर्द और बच्चों के मानसिक विकास में बाधा होने जैसी समस्या होती है। इसका उपचार सात साल के ऊपर कभी भी किया जा सकता है। लेकिन उचित समय सात से सोलह साल है।

विदित हो कि आर्थोडोन्टिक (विकृृत दन्त) दन्त विज्ञान की वह शाखा है जो टेढ़े-मेढ़े दाॅतों एवं जबडे़ को ठीक करने हेतु प्रयुक्त होती है। इसके लिए बीएचयू का दन्त विभाग इस दिशा में बेहतरीन कार्य कर रहा है। यहाँ के कुशल दन्त चिकित्सक दाँतों की हर बीमारी का बेहतर तरीके से निदान करने में कार्यकुशल हैं। अगर आपके परिवार, पड़ोस या आस पास में यह समस्या हो तो फौरी तौर पर वाराणसी स्थित बीएचयू के दंत चिकित्सा संस्थान में पहुंचे।
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