भारतीय रेल में यात्री सुरक्षा पर उठते सवाल

भारतीय रेलवे द्वारा यात्री सुरक्षा को को न्यूनतम रखना आश्चयर्जनक है।


भारतीय रेलवे परिवहन का प्रमुख साधन है,फिर भी यात्री सुरक्षा रेलवे का उच्चतर वरीयता क्यों नहीं बन पाया है।देश की जीवनरेखा भारतीय रेल अपने 8 हजार से अधिक रेलवे स्टेशनों के जरिए रोज 2.30 करोड़ से अधिक मुसाफिरों को गंतव्य तक पहुँचाती है।यही कारण है कि रेल दुर्घटनाओं का असर किसी भी अन्य दुर्घटना से ज्यादा होता है।ऐसे में भारतीय रेलवे द्वारा यात्री सुरक्षा को को न्यूनतम रखना आश्चयर्जनक है।

राहुल लाल
भारतीय परिवहन का प्रमुख तंत्र रेलवे पुन:एक बड़े दुर्घटना के चपेट में आया।रायबरेली के हरचंदपुर में न्यू फरक्का एक्सप्रेस के 10 डिब्बे इंजन समेत पटरी से उतरे,जिसमें कम से कम 9 लोग मर गए तथा 50से ज्यादा घायल हुए।घायलों में कईयों की हालत गंभीर बनी हुई है।दुर्घटना के तस्वीरों से ही स्थिति के भयावहता को समझा जा सकता है। यह हादसा उस समय हुई,जब ट्रेन की गति धीमी थी।यही कारण है कि मृतकों की संख्या कम रही।हरचंदपुर रेलवे स्टेशन से 50 मीटर दूर पटरी से प्रातः 6 बजे यह दुर्घटना घटी।हरचंदपुर रायबरेली से 20 किमी तथा लखनऊ से 80 किमी की दूरी पर है।यह ट्रेन मालदा से दिल्ली जा रही थी।देश की जीवनरेखा भारतीय रेल अपने 8 हजार से अधिक रेलवे स्टेशनों के जरिए रोज 2.30 करोड़ से अधिक मुसाफिरों को गंतव्य तक पहुँचाती है।यही कारण है कि रेल दुर्घटनाओं का असर किसी भी अन्य दुर्घटना से ज्यादा होता है।ऐसे में भारतीय रेलवे द्वारा यात्री सुरक्षा को को न्यूनतम रखना आश्चयर्जनक है।ऐसे में भारतीय रेल को दुर्घटनाओं को रोकने के लिए तीव्रतम प्रयास करने होंगे तथा तब तक प्रयत्नशील होना होगा,जब तक रेलवे दुर्घटनाओं को शून्य तक नहीं पहुँचा दे।

बताया जा रहा है कि जहाँ हादसा हुआ,वहाँ पटरी मरम्मत का कार्य चल रहा था।ट्रेन को आगे जाने का सिग्नल तो दे दिया गया,लेकिन पटरियों को जोड़ने का काम नहीं किया गया था।ड्राइवर द्वारा अचानक ब्रेक लगाने से यह दुर्घटना घटी है। दुर्घटना में रेल मंत्रालय की लापरवाही स्पष्टत:देखी जा सकती है।सबसे महत्वपूर्ण यह दुर्घटना तब घटी है,जब भारत में बुलेट ट्रेन चलाने की तैयारी की जा रही है।

आखिर मरम्मत वाली टूटी पटरियों पर रेलगाड़ी क्यों दौड़ी?

यह ट्रेक काफी दिनों से खराब थी,जिसमें लगातार मरम्मत कार्य जारी था।यह यक्ष प्रश्न बना हुआ है कि मरम्मत के दौरान टूटे पटरी पर आखिर ट्रेन को चलने की अनुमति कैसे मिली। लग रहा है,इसके प्रक्रियात्मक पहलुओं का पालन नहीं किया गया।ऐसे में तो स्पष्ट है कि रेलवे की जानलेवा लापरवाही दुर्घटना का प्रमुख कारण बनी।

देश में रेल दुर्घटनाएँ क्यों होती है?कैसे होती है?इसके कारण और निदान नीति निर्माता से लेकर आम आदमी सभी को पता है।फिर भी हर वर्ष ये दुर्घटनाएँ होती हैं,उसके जाँच होते हैं,बैठकें होती हैं,मुआवजे की घोषणाएँ होती हैं लेकिन स्थायी समाधान नहीं होता।इस बार भी मृतकों के परिजनों को 5लाख ,गंभीर रुप से घायलों को 1लाख तथा सामान्य घायलों को 50 हजार रुपये मुआवजे की घोषणा रेल मंत्रालय द्वारा की गई है।

यूँ तो भारतीय रेलवे को विश्वस्तरीय बनाने बनाने का खूब दंभ भरा जाता है,पर असलियत यह है कि न पटरियाँ दुरुस्त हैं,न परिचालन समय से हो रहा है,न ही मुसाफिरों की सुरक्षा की पर्याप्त फिक्र की जा रही है।हाल ही में रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष अश्विनी लोहानी ने रेलवे संरक्षा पर कई बड़े-बड़े दावे किए थे।उनका कहना था कि संरचनात्मक अपग्रडेशन तथा संरक्षा पर ध्यान केंद्रित करने से पिछले 12 माह में दुर्घटना 80 की तुलना में 75 रही।रेल मंत्रालय को झूठे दंभ भरने के स्थान पर यात्री सुरक्षा के गंभीर पहल करने की आवश्यकता है।1950-51 से अब तक यात्री यातायात में 1344% माल यातायात में 1642% की वृद्धि हुई है,लेकिन रेल मार्ग महज 23% बढ़ा है।आज भारतीय रेल के 66,787 किमी रेल मार्ग के 1291 खंडों में से 492 खंड पर क्षमता से अधिक यातायात चल रहा है।इसमें सबसे व्यस्त 161 खंड इतने तृप्त हो गए हैं कि पटरियों की मरम्मत के लिए समय निकालना कठिन है।अधिकांश दुर्घटनाओं में रेल कर्मचारियों की गलती उजागर हुई है।फिर भी भारतीय रेल की रीढ़ ग्रुप सी और ग्रुप डी के कर्मचारियों के 2.25 लाख पद खाली पड़े हैं,जिसमें से 1.22 लाख से अधिक पद संरक्षा कोटि के ह़ै,जिनको तत्कालीन भरना चाहिए।

रेलवे का कहना है कि जाँच रिपोर्ट के बाद ही सच्चाई का पता चलेगा।एक तरह से कमिटी बनाकर जांच के नाम पर मामले को टालने का प्रयत्न है।सबसे दुखद बात यह है कि रेलवे पूर्व में हुए दुर्घटनाओं से कोई सीख नहीं ले रहा है।जाँच समितियों के रिपोर्ट पर बाद में रेलवे द्वारा प्रभावी क्रियान्वयन के कमी से स्थिति में बदलाव नहीं आता है।ये रिपोर्ट बस धूल खाते रहते हैं।कार्यवाई के नाम पर रेलवे के कुछ छोटे कर्मियों की छुट्टी कर मामले को ठंडा करने से कार्य नहीं होगा।आवश्यकता है कि बड़े स्तर पर रेलवे की इस लापरवाही पर कार्यवाई कर जिम्मेवारी निर्धारित की जाए।

आज वैश्विक स्तर पर तकनीक के द्वारा दुर्घटनाओं को न्यूनतम करने के प्रयास हो रहे हैं,परंतु भारतीय रेलवे में ऐसे समुचित प्रयास कम ही हुए हैं।अगर सूक्ष्मता पूर्वक भारतीय रेल के दुर्घटनाओं का विश्लेषण किया जाए तो करीब 80 प्रतिशत भारतीय रेल दुर्घटनाओं का कारण मानवीय भूल या चूक होती है।इस दुर्घटना के बाद पुन:यह प्रश्न उठता है कि आखिर रेलवे लोगों सुरक्षित रेल यात्रा कब उपलब्ध कराएगी?कब तक हमलोग अपने प्रियजनों को यूँ ही खोते रहेंगे?इन हादसों का जिम्मेदार कौन है?

रेल में इस तरह के मानवीय त्रुटि को कैसे रोकें?

मानवीय चूक को रोकने के वैश्विक स्तर पर दो उपाय स्वीकार किए गए हैं-प्रथम आधुनिकतम तकनीक का प्रयोग कर मानवीय चूक को कम करना,द्वितीय-रेल कार्मिकों का उच्चस्तरीय प्रशिक्षण।

अगर आधुनिकतम तकनीक की बात करें तो इसमें 'यूबीआरडी'प्रमुख है।रेलवे ने रेल पटरियों की सुरक्षा निगरानी हेतु दक्षिण अफ्रीका से एक खास तकनीक यूबीआरडी आयात की है,जिसमें ट्रांसमीटर एक तरंग छोड़ता है और अगर रिसीवर को वह तरंग नहीं मिलती है तो पता चल जाता है कि कहीं बीच में कोई समस्या है।इस प्रणाली से पटरी के बारीक चटक का भी पता लग जाता है।इसके अतिरिक्त आधुनिक "लिंक हाफमैन बुश"डिब्बे की अनुपस्थिति से भी हताहतों की संख्या में वृद्धि होती है।लिंक हॉफमैन बुश से युक्त डिब्बे पटरी से उतरने के बाद भी ज्यादा असरदार तरीके से झटकों और इसके प्रभाव को झेल सकते हैं और ये पलटते नहीं।इससे जानमाल के नुकसान में अप्रत्याशित कमी आती है।

मानवीय चूक रोकने का दूसरा प्रमुख उपाय रेलकर्मियों का उच्चस्तरीय प्रशिक्षण है।इस मामले में जिस तरह जानलेवा लापरवाही दिखी,उससे रेल कर्मियों में प्रशिक्षण की भारी कमी स्पष्टत: देखी जा सकती है।जब तेज रफ्तार वाली ट्रेन चल रही हो तो ट्रैन के दोनों ओर तैनात कुशल तकनीशयन द्वारा दूर से आ रही रेलगाड़ी की चाल उसकी लहर व उसके नीचे से निकलने वाली अवांछित आवाजों तथा ईंजन व गार्ड के मध्य सभी डिब्बों के बीच झटकों व उनके परस्पर खिंचाव आदि पर पैनी नजर रखनी चाहिए।साथ ही जिस ट्रैक से वह तीव्र गति ट्रेन गुजर रही हो उस पर भी पूरी चौकस नजर रखी जानी चाहिए।

रायबरेली रेल दुर्घटना में तो पटरी मरम्मत तक की जानकारी ड्राइवर को नहीं मिली।

कायदे से हर साल करीब 5 हजार किमी पथ रेल पथ का नवीकरण होना चाहिए, लेकिन यह तीन हजार किमी के औसत से अधिक नहीं जा रहा है।यही कारण है कि रेल मंत्रालय का नेतृत्व बदल गया है,परंतु रेलवे संरक्षा की स्थिति पूर्ववत है।असल जरूरत चेहरा बदलने की नहीं, प्राथमिकताएँ और कार्यप्रणाली बदलने की है।रेल हादसों की वजह जानी -पहचानी है-पटरियों की खराबी,सिग्नल की खराबी, फिश प्लेट की अपनी जगह न होना,कुछ तकनीकी गड़बड़ियाँ और कर्मचारियों की लापरवाही, आदि।ये ऐसे कारण नहीं हैं,जिन्हें दूर नहीं किया जा सकता।सवाल है कि इसके लिए नीति निर्धारकों में इच्छा शक्ति कितनी है?

एक अनुमान के मुताबिक भारत में हर साल औसतन 300 छोटी-बड़ी रेल दुर्घटनाएँ होती है।जब भी कोई रेल दुर्घटना होती है,मुआवजे की घोषणा कर उसे भूला दिया जाता है।हमें इस प्रवृत्ति से बाहर आना होगा।रेलवे सुरक्षा के कई पहलू होते हैं,लेकिन प्रबंधन के स्तर पर सभी पहलू जुड़े रहते हैं।होता यह है कि रेलवे विभाग रेल सेवाओं में तो वृद्धि कर देता है,परंतु सुरक्षा का मामला उपेक्षित रह जाता है।राजनीतिज्ञों और प्रबंधकों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि रेलवे सिस्टम को को एक तय सीमा से ज्यादा न खींचा जाए।

रेलवे सुरक्षा और सेवाओं के मध्य समुचित संतुलन बनाए जाने की जरुरत है।उम्मीद है कि इस वर्ष से अलग रेलवे बजट न होने के कारण रेल मंत्रालय के ऊपर लोकप्रिय निर्णय लेने का दबाव नहीं रहेगा और वह सुरक्षा पर समुचित खर्च कर सकेगी।अब समय आ गया है ,जब भारतीय रेलवे सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता प्रदान करें,नहीं तो फिर हमलोग शायद किसी नए दुर्घटना के बाद भी इन्हीं मुद्दों पर चर्चा करते दिखें।
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