भारत के एकीकरण के सूत्रधार थे सरदार पटेल

और कश्मीर भारत का अंग बन गया।

भोपाल भी पाकिस्तान में विलय चाहता था 

अनीता वर्मा  
20वीं सदी में भारत के एकीकरण में लौह पुरुष सरदार पटेल की अहम भूमिका है।सरदार पटेल को भारत का बिस्मार्क कहा जाता है क्योंकि जिस प्रकार यूरोपीय देश जर्मनी के एकीकरण में प्रशा चांसलर बिस्मार्क ने अहम भूमिका अदा किया, उसी प्रकार स्वतंत्र भारत के एकीकरण में सरदार पटेल ने ताकि अंतर्राष्ट्रीय पटल पर भारत का अभ्युदय एक सशक्त लोकतंत्रात्मक गणराज्य के रूप में हो सके।

आजादी के दौरान भारत 565 देशी रियासतो में बंटा था।ये देशी रियासते स्वतंत्र शासन में यकीन रखती थी जो सशक्त भारत के निर्माण में सबसे बडी़ बाधा थी।इसलिए सशक्त और अखंड भारत के निर्माण हेतु आवश्यक था कि इन देशी रियासतो को भारत का अभिन्न अंग बनाया जाए।अतः सरदार पटेल ने अपनी दूरदर्शी दृष्टि के कारण ही देशी रियासतों को भारत में सफलता पूर्वक सम्मिलित कराया और भारतीय संविधान में उल्लिखित एक मजबूत केंद्र के निर्माण की ओर अग्रसर हुए।भारत में संघ का निर्माण केन्द्राभिमुख पद्धति द्वारा हुआ है।जिसमें संघ निर्माण की इच्छा ऊपर से नीचे चलती है।एकात्मक सरकार को संघात्मक सरकार में परिवर्तित करने हेतु ऐसा किया जाता है। उदाहरण के तौर पर भारत के एकात्मक राज्य को 1935 में संघात्मक राज्य में परिवर्तित किया गया।इसलिए भारत में केंद्र द्वारा राज्यों का निर्माण किया जाता है।

तत्कालीन परिस्थितियों में केंद्र को मजबूत बनाना आवश्यक था क्योंकि कुछ देशी रियासतें अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखने के प्रयास में संलग्न थी तो कुछ रियासतें पाकिस्तान में विलय चाहती थी और जिन्ना रियासतों को भारत के विरुद्ध भय दिखाकर भड़काने में लगे थे।ताकि भारत का राजनीतिक एकीकरण न हो सके और भारत हमेशा कमजोर बना रहे।ठीक उसी प्रकार जैसे जर्मनी के एकीकरण में फ्रांस, स्पेन, इंग्लैंड रूस, आस्ट्रियां पक्ष में नहीं थे।क्योंकि शक्तिशाली एकीकृत जर्मनी यूरोप में शक्ति संतुलन में बाधा उत्पन्न कर सकता था।

स्वतंत्र भारत के समक्ष काफी विकट परिस्थितियां विद्यमान थी।भारत के स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ साथ बंटवारे का दंश झेलना पड़ा और देश साम्प्रदायिक आग में झुलसा।दूसरा स्वतंत्र भारत के अंतर्गत तीन प्रकार क्षेत्र थे।1.ब्रिटिश भारत के क्षेत्र 2.देसी रियासतें(भोपाल, मैसूर, काठियाबाड़ जोधपुर, जैसलमेर,सिरोही,त्रावनकोण, हैदराबाद, जूनागढ़, कश्मीर, इत्यादि) 3.फ्रांस और पुर्तगाल के औपनिवेशिक क्षेत्र।इन देशी रियासतों को राजनीतिक इकाई के रूप में एकीकृत कर भारत को मौजूद स्वरूप प्रदान करने में सरदार पटेल ने सफलतापूर्वक कार्य किया।

आजादी प्राप्ति के दौरान भारत में 565 छोटी, बड़ी रियासते थी।सरदार पटेल अंतरिम सरकार में देश के गृहमंत्री थे।चार देशी रियासतो को छोड़कर (जूनागढ़, कश्मीर,भोपाल हैदराबाद) 15 अगस्त 1947 तक अधिकांश देशी रियासते भारतीय परिसंघ में शामिल हो चुकी थी। वस्तुतः आजाद भारत का खाका ,3 जून 1947 को माउंट बेटन द्वारा खींच दिया गया।इस दिन ऑल इंडिया रेडियो स्टेशन में माउंटबेटन के साथ साथ जिन्ना, नेहरू, और बलदेव सिंह थे।माउंटबेटन ने कहा कि भारत की एकता बनाए रखने का कोई भी समझौता मुश्किल हो गया है क्योंकि ये सम्भव नहीं की एक इलाके की बहुसंख्यक आबादी को ऐसी सरकार के हवाले छोड़ दिया जाए जिसमें सरकार का दखल अंदाजी न हो।इसलिए बंटवारा ही एकमात्र विकल्प है।4जून 1947 को माउंट बेटन ने वर्तमान संसद में भारत के भविष्य को लेकर प्रेस कान्फ्रेस बुलाए जिसमें देश विदेश के लगभग 300 पत्रकार थे।उन्होंने कहा कि ट्रांसफर अॉफ पावर अगस्त 1947 में ठीक वैसे ही होगा जैसा जून 1948 में होता।ब्रिटेन अगस्त 1947 तक भारत को सत्ता हस्तांतरण करेगा और साथ ही भारत का विभाजन होगा।

भारत की आजादी के दौरान दो प्रकार की समस्याएं थी।एक देश को साम्प्रदायिक हिंसा में झुलसने से कैसे रोका जाए।दूसरा भारत की देशी रियासतों ने ब्रिटेन की राजगद्दी के गुलामी को स्वीकार किया था जिसे लैप्स ऑफ पैरामाउंसी कहा जाता था । लेकिन अंग्रेज भारत छोड़कर जा रहे थे और उन्होंने घोषणा की कि पैरामाउंसी समाप्त हो जाएगी और रजवाडे़ अपना भविष्य स्वयं तय करने के लिए स्वतंत्र है।अर्थात जो रियासते भारत या पाकिस्तान में विलय चाहती है वो उनके साथ जा सकते है।और जो स्वतंत्र रहना चाहती है रह सकती है।

जोधपुर महाराज ने11अगस्त 1947 को विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए।

लैप्स ऑफ पैरामाउंसी की घोषणा ने आग में घी डालने का कार्य कियाऔर देशी रियासतों को बगावत व भारत और पाकिस्तान के साथ अधिक सहूलियत प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त कर दिया।इसी के फलस्वरूप देशी रियासतों को पाकिस्तान में मिलाने हेतु जिन्ना भी प्रलोभन लेकर देशी रियासतो के शासकों से मिलने में दिलचस्पी दिखाई।उदाहरण के तौर पर6अगस्त1947 जोधपुर के शासक हनुमंत राव और जैसलमेर के युवराज गिरधर सिंह से मिले।जोधपुर के महाराजा को पाकिस्तान में मिलाने हेतु हिन्दुस्तान से अधिक सहूलियत देने की बात कहने पर महाराजा ने तीन शर्त रखी-कराची बंदरगाह का इस्तेमाल की छूट, हथियारों का निशुल्क आयात और जोधपुर से सिंध के हैदराबाद जाने वाली रेलवे लाइन पर अधिकार। लेकिन महाराजा के असमंजस के कारण ये डील खटाई में पड़ गया।सरदार पटेल के दूरदर्शिता के कारण बगावती जोधपुर महाराज ने भारतीय संघ में शामिल होने हेतु 11अगस्त 1947 को विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए।

इसी प्रकार त्रावणकोर ने 11जून 1947 को बगावती तेवर अपनाते हुए अपने को भारतीय संघ से स्वतंत्र घोषित कर लिया।लेकिन 12अगस्त 1947 को सरदार पटेल के प्रयास व जनता के विरोध के कारण त्रावणकोर महाराज ने भारत में विलय हेतु विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए।

भोपाल भी पाकिस्तान में विलय चाहता था 

इस प्रकार भारतीय संघ के हिस्से में आए प्रिंसली स्टेट जो ब्रिटिश भारतीय साम्राज्य का हिस्सा था एक एक करके विलय पत्र पर सरदार पटेल और वी.पी.मेनन द्वारा हस्ताक्षर करवा लिए गए।सिवाय हैदराबाद, जूनागढ़,कश्मीर और भोपाल के।कश्मीर और हैदराबाद स्वतंत्र मुल्क बने रहना चाहते थे।जूनागढ़ पाकिस्तान में विलय चाहता था और भोपाल या तो पाकिस्तान में विलय चाहत था या स्वतंत्र रहना चाहता था।

ऐसे बना था जूनागढ़ भारत का हिस्सा।

भारत के राजनीतिक एकीकरण के हितों के लिए अनिवार्य था कि इन रियासतो का विलय भारत में किया जाए।इसी संदर्भ में सरदार पटेल के प्रयासों से इन शेष रियासतो का विलय भारत में 15 अगस्त 1947 के बाद भी जारी रखा गया। उसी संदर्भ में जूनागढ़ का विलय देखा जा सकता है।भारत सरकार को 17 अगस्त 1947 को अख़बार के माध्यम से सूचना मिली कि जूनागढ़ ने पाकिस्तान के साथ मिलने का फैसला किया है।इस पर नेहरू और पटेल ने कैबिनेट मीटिंग बुलाया और 24 सितंबर 1947 को भारतीय फौज़ द्वारा जूनागढ़ की घेराबंदी की गयीं तो दूसरी ओर जूनागढ़ जनता के बगावत के कारण नवाब पाकिस्तान भाग गया।और उनका दीवान शाह नवाज भुट्टौ द्वारा पाकिस्तान से मदद प्राप्त करने में असफल रहने पर 7 नवंबर 1947 को भारत से जुड़ने की पेशकश की।फरवरी 1948 में जूनागढ़ में रायसुमारी से भारत को एक लाख उन्नीस हजार वोट व पाक को सिर्फ 51वोट प्राप्त हुए।ऐसे में जूनागढ़ भारत का हिस्सा बन गया।

और कश्मीर भारत का अंग बन गया।

कश्मीर के संदर्भ में देखे तो यह एक आजाद मुल्क बने रहना चाहता था।लेकिन हरि सिंह का ये निर्णय कश्मीर के लिए घातक सिद्ध हुआ।22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान की तरफ से हथियारों से लैस कबाइलियों ने कश्मीर पर धावा बोल दिया।यह आश्चर्य था कि रियासत के मुस्लिम सैनिकों ने बगावत कर विद्रोहियों का साथ दिया । पाकिस्तान ने स्टैंडस्टील समझौते को तोड़कर कश्मीर में पेट्रोल ,अनाज व जरुरी सामानों की आपूर्ति बाधित की।हरि सिंह ने 24अक्टूबर 1947 को पत्र के माध्यम से भारत सरकार से फौजी मदद मांगी।लेकिन सैनिक सहायता तभी दिया जा सकता था जब महाराजा भारतीय संघ में शामिल होने हेतु विलय पत्र पर हस्ताक्षर करते, इसलिए महाराजा ने 26अक्टूबर 1947 को कश्मीर के भारत में विलय हेतु विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए और कश्मीर भारत का अंग बन गया ।बावजूद आज तक कश्मीर भारत पाक के मध्य विवादित मुद्दा बना हुआ है।

जब भारतीय सेना द्वारा हैदराबाद को घेर लिया तब विलय हेतु विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए।

हैदराबाद के संदर्भ में देखे तो 12जून 1947 को आजाद मुल्क की घोषणा कर 16 सितंबर 1947 तक अपनी आजादी को बनाए रखने में सफल रहा।लेकिन भारत सरकार द्वारा दिए गए रियायत ( हैदराबाद अपना कानून बना सकता है, बीस हजार फौज और आंतरिक इमरजेंसी की हालात में ये फौज हैदराबाद में दाखिल हो सकती है ) के बावजूद हैदराबाद के निजाम ने स्वतंत्र मुल्क रहने की बात कही ।इसी के फलस्वरूप सरदार पटेल ने फौजी कार्यवाही करवाई का आदेश दिया और 13सितंबर 1948 को भारतीय सेना द्वारा हैदराबाद को घेर लिया गया।पांच दिन के संघर्ष के पश्चात 17 सितंबर 1948 को निजाम उस्मान अली ने भारत में विलय हेतु विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए।

भोपाल रियासत भी भारतीय संघ में शामिल नहीं होना चाहती थी।लेकिन सरदार पटेल के प्रयासों के कारण नवाब ने 30 अप्रैल 1949 को विलीनीकरण के पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए।

इस प्रकार भारत के एकीकरण में सरदार पटेल की महत्वपूर्ण भूमिका है।भारत की एकता और अखंडता को अक्षुण्ण रखने हेतु यह आवश्यक था कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक राजनीतिक एकीकरण के सूत्र में बाधा जाए और सरदार पटेल इसमें सफल रहे।

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