अमृतसर रेल हादसा - ट्रेन ऑपरेशन मैन्युअल का पालन होता तो बच सकती थी 61 जिंदगी?

अमृतसर रेल हादसा


आखिर रेलवे ट्रेक के किनारे रावण दहन क्यों?

राहुल लाल
भीषणअमृतसर हादसा के बाद सभी संबद्ध पक्ष आपस में आरोप प्रत्यारोप कर रहे हैंं।लेकिन इस हादसे के पीछे आयोजक,स्थानीय प्रशासन तथा भारतीय रेल सभी जिम्मेवार हैं।आवश्यक है कि इतने बड़े रेल हादसे के बाद व्यवस्था में जिम्मेदारी निर्धारण अवश्य हो तथा उन पर कठोर कार्यवाई हो।

स्वतंत्र भारत में रेल से कुचल कर मरने वालों का सबसे बड़ा रेल हादसा पंजाब के अमृतसर में हुआ,जिसमें 66 लोगों की मौत तेज रफ्तार रेल से कुचल कर हो गई।जालंधर से अमृतसर जा रही रेल काफी तेज रफ्तार से आई और बड़ी तादाद में लोगों को अपनी चपेट में लेते हुए गुजर गई।ट्रेन को वहाँ से गुजरने में 4-5 सेकेण्ड लगे,ट्रेन के गुजरते ही पटरी के दोनों तरफ क्षत-विक्षत शव दूर-दूर तक बिखर गए और घायलों की भयावह चीख पुकार मच गई।

दरअसल,अमृतसर के जोड़ा फाटक के पास दशहरा के मौके पर रावण दहन देखने के लिए बड़ी संख्या में भीड़ उमड़ी थी।लोग स्पष्ट रुप से देख सकें,इसके लिए रेल पटरियों पर हजारों की संख्या में खड़े होकर रावण दहन देख रहे थे।मेले में आतिशबाजी के बीच रावण का पुतला जलने के नजारे को लोग अपने-अपने फोन में कैद कर रहे थे,तभी रावण के अधजला पुतला गिरने से लोग और भी ज्यादा रेल ट्रेक पर आ गए।अफरातफरी में भागे लोग अभी कुछ समझ पाते कि उन पर दो ट्रेनों के रूप में मौत की गाड़ी चढ़ गई।इसी दौरान अप ट्रैक पर जालंधर से अमृतसर आ रही डीएमयू ट्रेन की चपेट में आ गए।लोग बचने के लिए डाउन ट्रेक पर भागे,वहाँ अमृतसर से हावड़ा जा रही ट्रेन आ गई और लोगों को संभलने का मौका नहीं मिला।इस घटना में 66 से ज्यादा लोग मारे गए हैं,जबकि 150 से ज्यादा घायल है।हादसे की भयावहता का अंदाजा से लगाया जा सकता है कि रेल ट्रैक पर 200 मीटर तक शव व घायल बिखरे हुए थे।कई शव इतने टुकड़ों में कट गए कि उन्हें समेटना नामुकिन था।

इस हादसे के बाद आयोजक,स्थानीय प्रशासन और रेल मंत्रालय सभी अपनी जिम्मेदारियों से भागने का प्रयास कर रहे हैं।बड़ा सवाल है,आयोजन कराने की इजाजत स्थानीय प्रशासन देता है,लेकिन लोगों की मौत रेल से कटने की वजह से हुई है।तो ऐसे में भला जिम्मेदारी किसकी होगी? आखिर रेलवे ट्रेक के किनारे रावण दहन क्यों?

बताया जा रहा है कि रेलवे ट्रेक पर यह आयोजन पिछले 30 वर्षों से भी ज्यादा समय से रहा है।स्थानीय पुलिस प्रशासन का कहना है कि उसने इजाजत नहीं दी थी।लेकिन यह जानकारी झूठी निकली।पुलिस ने स्वीकृति दी,तो फिर घटनास्थल पर क्राउड मैनेजमेंट का कार्य क्यों नहीं किया?अगर स्थानीय पुलिस प्रशासन बिल्कुल सक्रिय होकर भीड़ प्रबंधन का भी कार्य करता तो हादसे को टाला जा सकता था।प्रथमतः स्थानीय प्रशासन को ऐसे आयोजन की स्वीकृति नहीं देनी चाहिए थी,लेकिन किन्हीं कारणों से ऐसा करना आवश्यक था,तो फिर सुरक्षा के न्यूनतम प्रबंधन क्यों नहीं किए गए?

प्रश्न यह भी उठता है कि भीड़ को अलर्ट क्यों नहीं किया गया?आयोजकों की तरफ से बकायदा रेलवे लाइन की तरफ टीवी स्क्रीन लगाए गए थे,ताकि रेलवे लाइन पर खड़े होकर भी रावण दहन देख सकें।यही नहीं बार-बार माइक में यह बात बताई जा रही थी कि देखिए हजारों लोग रेलवे ट्रेक पर खड़े होकर रामलीला देख रहे हैं,लेकिन उन्हें पटरी से हटने की अपील नहीं की गई।

इस संपू्र्ण मामले में आयोजन कर्ताओं और स्थानीय प्रशासन के तरफ से जहाँ भारी लापरवाही बरती गई,वहीं रेलवे भी कम दोषी नहीं है।रेल राज्य मंत्री मनोज सिंहा तथा रेलवे बोर्ड के चेयरमैन लौहानी किसी भी तरह से रेलवे की जिम्मेदारी मानने से इंकार कर रहे हैं,जो पूर्णतः गलत है।ट्रेन ऑपरेशन मैन्युअल का पालन किया जाता तो अमृतसर हादसा टल सकता था।ट्रेन के ड्राइवर की लापरवाही को नकारा नहीं जा सकता।वहीं लोगों की जान बचाने में गेटमैन की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी।अगर ये सभी चौकन्ने रहते,तो बहुत लोगों की जान बचाई जा सकती थी।

इस स्थान पर दशहरे का मेला पिछले 30 वर्षों से ज्यादा समय से हो रहा था।इसकी जानकारी रेलवे के स्थानीय प्रशासन, स्टेशन मास्टर, गेटमैन और वहाँँ से गुजरने वाली ट्रेन ड्राइवरों को अवश्य होगी।गेटमैन को इसकी जानकारी थी कि मेले में लोग रेल ट्रेक पर खड़े होकर वीडियो बना रहे हैं।इसके बाद भी उसने मैग्नेटो फोन से स्टेशन मास्टर को इसकी जानकारी नहीं दी।इस मामले में जालंधर -अमृतसर लोकल ट्रेन के ड्राइवर की भी पूरी गलती है।किसी भी ड्राइवर को यात्री ट्रेनें 8-10 साल के अनुभव के बाद ही दिया जाता है।यानी इन ड्राइवरों को पता था कि इस स्थान पर हर साल दशहरे के मेले में भारी भीड़ जुटती है।इसके बावजूद दोनों ट्रेने अपनी फुल रफ्तार से वहाँ से गुजरी।

इस संबंध में ट्रेन ऑपरेशन मैन्युअल क्या कहता है?

भले ही रेल राज्य मंत्री मनोज सिंहा इसे ट्रेक पर अवैध अतिक्रमण मानते हैं,परंतु स्वयं ट्रेन ऑपरेशन मैन्युअल,जनरल रुल और एक्सीडेंट मैन्युअल यह साफ कहता है कि रेलवे ट्रेक पर किसी तरह की बाधा,इंसान, जानवर आदि नजर आते हैं,तो ड्राइवर को न सिर्फ गाड़ी धीरे करनी चाहिए, बल्कि रोक देनी चाहिए।इसकी सूचना तुरंत पास के स्टेशन मैनेजर को देनी चाहिए।लेकिन ड्राइवर ने इन नियमों का पालन नहीं किया तथा रेलवे उनका गलत ढंग से बचाव करने में लगा है।

प्रश्न उठता है कि रेल ड्राइवर ने गति धीमी क्यों नहीं की? रेलवे का कहना है कि वहाँ ट्रेक पर कर्व है,जिस कारण ड्राइवर को भीड़ का पता नहीं चला।लेकिन रेलवे को ज्ञात होन चाहिए कि जब यह दुर्घटना हुई,उसके पूर्व भी तीन-तीन ट्रेनें गुजरी,लेकिन वे धीरे-धीरे आई तथा बाधारहित ढंग से दुर्घटना स्थल को पार कर गई।ऐसे में रेलवे के उस गलत बचाव को समझा जा सकता है कि ड्राइवर कर्व पटरी के कारण भीड़ नहीं देखा पाया था।साथ ही अगर रेलवे ट्रेक पर हजारों लोगों की भीड़ थी,तब रेलवे ट्रेक की सुरक्षा की सुरक्षा जिम्मेदारी का जिम्मा लिए आरपीएफ कहाँ थी और उनकी इंटेलिजेंस यूनिट क्या कर रही थी?

ऐसे किसी भी समारोह के मामले में स्थानीय प्रशासन और रेलवे को वहाँ पर प्रथमतः नियमित बैरिकेड लगाना चाहिए। द्वितीय, वहाँ आरपीएफ के जवान तैनात किए जाने चाहिए। इसके अतिरिक्त रेल आने के समय की उदघोषणा की जानी चाहिए।बिहार में तमाम मंदिर रेलवे ट्रेक के किनारे हैं।वहाँ पर उपरोक्त इंतजाम हर वर्ष किए जाते हैं और ट्रेनों को कम रफ्तार पर चलाया जाता है।अमृतसर के स्थानीय प्रशासन और रेल प्रशासन के समन्वय में चूक रही।

रेलवे के चूक को समझने के लिए हम लोग रावण दहन के ही एक रायपुर,छत्तीसगढ़ के घटनाक्रम को भी देख सकते हैं।रायपुर में भी जब रावण दहन का आयोजन किया गया था,उस वक्त भी रेलवे ट्रेक पर हजारों की भीड़ मौजूद थी।अमृतसर की तरह यहाँ भी पुतला दहन के दौरान ही ट्रेन आ गई।अमृतसर और रायपुर में सबसे बड़ा फर्क सुरक्षा व्यवस्था का था।अमृतसर में कार्यक्रम स्थल पर भीड़ प्रबंधन हेतु सुरक्षा के कोई विशेष प्रबंध नहीं थे,वहीं रायपुर में रावण दहन करीब 6:40 मिनट पर हुआ।जबकि इसके दो घंटे पूर्व ही रेलवे और जीआरपी के जवान कार्यक्रम स्थल के पास पहुँच गए थे।रेलवे ट्रेक पर लंबी दूरी तक जवान खड़े थे।रेलवे क्रॉसिंग को बंद कर दिया गया था।

इतना ही नहीं रेल को करीब एक किमी पहले ही धीमा करने के आदेश थे।जिस समय रायपुर में रावण दहन का आयोजन किया गया,उससे पहले ही ट्रेन हल्की स्पीड में चलना शुरु हो गई थी और ट्रेन के साथ-साथ जवान भी आगे बढ़ रहे थे।यही वजह रही कि रायपुर में दशहरा के मौके पर रेलवे ट्रेक पर भारी भीड़ होने के बावजूद भी सकुशल आयोजन को संपन्न कराया गया और ट्रेन भी वहीं से निकाली गई।जबकि अमृतसर की बात की जाए तो वहाँ न रेलवे की तरफ से कोई चुस्ती दिखाई दी और न ही स्थानीय प्रशासन ने सुरक्षा का कोई इंतजार किया।ऐसे में अब भारतीय रेल इस संपूर्ण मामले में पल्ला झाड़ नहीं सकती।

ऐसे संपूर्ण मामले में लापरवाही और असंवेदनशील रवैया यहीं पर नहीं रूका।दुर्घटना के बाद पुलिस द्वारा राहत कार्य चलाने में भी काफी विलंब हुआ।अगर यह विलंब नहीं हुआ होता,तो और भी जिंदगियाँ बचाई जा सकती थी।पंजाब के मुख्यमंत्री दिल्ली से घटनास्थल पर 17 घंटे बाद पहुँच पाएँ।डीजीपी ने घटनास्थल का केवल 1-1.5 मिनट का दौरा किया,जैसे केवल रस्म अदायगी कर रहे हों।

जब रावण दहन हुआ,तो पटाखों का शोर काफी ज्यादा था।इससे भी लोगों रेल की आवाज सुनाई नहीं दी।आयोजकों ने भव्य आयोजन हेतु रावण के पुतले में करीब पाँच हजार पटाखे डाले थे।रावण जलाने में इतनी ज्यादा आतिशबाजी को कहीं से भी न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता,जबकि संपूर्ण दिल्ली एनसीआर, पंजाब एवं हरियाणा पराली के प्रदूषण से पीड़ित हैं।

अमृतसर के निकट हुआ हादसा एक बार फिर यह रेखांकित कर गया कि रेल तथा स्थानीय प्रशासन के साथ धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजक अपने गलतियों से सबक सीखने से इंकार कर रहे हैं।इसका कारण यह भी हो सकता है कि प्रायः ऐसी घटनाओं के बाद कुछ मुआवजें की घोषणा कर तथा जाँच समिति का गठन कर जिम्मेदार लोगों को कठघरे में खड़े होने से बचाया जाता है।आवश्यकता है कि जिम्मेदार लोगों पर जिम्मेदारी तय करके कठोर कार्यवाई की जाए,अन्यथा हम लोग पुन: व्यवस्था की नई लापरवाहियों के शिकार होते रहेंगे।

Post a Comment

MKRdezign

Contact Form

Name

Email *

Message *

Powered by Blogger.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget