भारतीय विदेश नीति स्वतंत्र और दबावरहित।

भारतीय विदेश नीति


भारत एक संप्रभु राष्ट्र है और भारत की स्वतंत्र विदेश नीति है।जिसके माध्यम से अपने राष्ट्रीय हितों की पूर्ति करता है।हाल के दिनों में अमेरिका अपने सहयोगियों पर अपनी नीति को,अपने हितों की पूर्ति हेतु थोपने का प्रयास कर रहा है।जो किसी भी संप्रभु और स्वतंत्र विदेश नीति वाले देश को नागवार होगा।
अनीता वर्मा
ईरान के संदर्भ में देखें तो ईरान और भारत के घनिष्ठ संबंध है।भारत के लिए ईरान का महत्व कच्चे तेल के आयातक देश के रूप में तो है ही ,साथ ही राजनीतिक, आर्थिक, सामरिक महत्व भी है।ईरान की भौगोलिक स्थिति भारत को मध्य एशिया के बाजार तक बिना पाकिस्तान के पहुँच बनाने में समर्थ है।दरअसल ईरान में चारबहार बंदरगाह है जिसमें भारत निवेश कर रहा है ताकि सहयोगी अफगानिस्तान तक पहुँच बनाने के साथ साथ मध्य एशिया और यूरोप तक स्थल मार्ग से पहुँच बना सके।दूसरा ईरान के चारबहार बंदरगाह से चीन निर्मित पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह की दूरी महज 76 नॉटिकल मील है।ऐसे में भारत जहाजों की आवाजाही पर निगरानी रख सकेगा।ऐसे में अमेरिका द्वारा ईरान से तेल खरीदने पर प्रतिबंध लगाने की धमकी देना कहाँ तक उचित है। 
हर देश का अपना राष्ट्रीय हित होता है।राष्ट्रीय हित के माध्यम से ही कोई राष्ट्र अपनी आर्थिक,सामरिक, राजनीतिक,और सांस्कृतिक लक्ष्य को प्राप्त करता है। भारत के भी अपने राष्ट्रीय भी हित है।इसमें अमेरिका सरीखे देशों की दखलंदाजी से भारतीय अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। इन दिनों अमेरिका ने अपने देशों की कंपनियों को संरक्षण प्रदान करने हेतु वैश्विक व्यापारिक युद्ध छेड़ रखा है। जिससे भारत भी अछूता नहीं है।ट्रेड वार के कारण भारत से निर्यात होने वाले वस्तुओं पर अमेरिका द्वारा अत्यधिक टैैैरिफ लगाने के कारण वस्तुएँ महंगी होती जा रही है।जिसके कारण निर्यात में कमी आ रही है।निर्यात में कमी आने के फलस्वरूप विदेशी मुद्रा भंडार डॉलर में कमी आ रही है और रुपया लगातार कमजोर हो रहा है।ऐसे में किसी वस्तु का आयात करना महंगा पड़ रहा है । इससे भारतीय अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। समस्या यह है कि सामान्यतः विश्व व्यापार में लेन और देन का भुगतान डॉलर में ही किया जाता है और विदेशी मुद्रा भंडार में लगातार कमी हो रही है।

ऐसे में ईरान भारत के लिए एक अच्छे मित्र और सहयोगी साबित हो रहा है।दरअसल ईरान भारत को कच्चे तेल का निर्यात रुपये में कर रहा है।ध्यातव्य है कि भारत कच्चे तेल खरीदने में काफी धनराशि खर्च करता है।यहाँ देखा जाए तो ईरान के इस कदम से भारत विदेशी मुद्रा भंडार को बचा रहा है।अमेरिकी नीतियाँ केवल अमेरिका के हित में है।जिस पर ईरान से व्यापार करने वाले देशों पर प्रतिबंध लगाने की बात कह रहा है।वह अमेरिका के सहयोगी भारत के पक्ष में नहीं है क्योंकि इससे भारतीय अर्थव्यवस्था पर केवल नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।ईरान भारत का पड़ोसी देश है।वहाँ से कम समय और कम खर्च वहन कर भारत को तेल उपलब्ध हो जाता है । प्रश्न उठता है कि ईरान के साथ अमेरिका की समस्या क्या है?

अमेरिका का मानना है कि ईरान सीरिया ,इराक, यमन में शिया लड़ाकों को हथियार की आपूर्ति कर रहा है और हिज्बुल्ला नामक आतंकवादी संगठन को भी हथियार की आपूर्ति कर रहा है इसलिए 2015 में ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते को अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने मई 2018 में तोड़ दिया है।दरअसल सीरिया के युद्ध से अमेरिका और रूस दोनों आमने सामने रहे हैअमेरिका सीरियाई राष्ट्रपति बसर अल असद को हटाने हेतु प्रयासरत रहा है और रूस बनाए रखने हेतु।जिसमें ईरान ,रूस के पक्ष के तरफ खड़ा है और सऊदी अरब अमेरिकी पक्ष की ओर से।यहाँ पर रूस और अमेरिका की वर्चस्व की लड़ाई देखी जा सकती है।यहाँ अमेरिका सीरिया के राष्ट्रपति को हटाने में अभी तक सफल नहीं हुआ है और इसका कारण वह रूस,ईरान और हिजबुल्लाह के गठजोड़ को मानता है।अमेरिका ने रूस पर भी कई कारणों से प्रतिबंध लगा रखे है ।जैसे अमेरिकी चुनाव में हस्तक्षेप, यूक्रेन का मसला,साइबर अटैक,मानवाधिकार उल्लंघन आदि जिसको रूस बेबुनियाद आरोप बताता है।

अभी हाल में ईरान के अहवाज़ में मिलिट्री परेड के दौरान आतंकवादी हमला हुआ।जिसकी जिम्मेदारी आईएस और अरब लीग ने ली।इस्लामिक स्टेट को सऊदी समर्थक आतंकवादी संगठन माना जाता है।बदले में ईरान के रिवॉल्यूशनरी गार्ड ने पूर्वी सीरिया में सीमा के निकट अल्बु कमाल शहर पर मिसाइल से हमला किया है जो कथित आईएस का प्रभाव क्षेत्र है।ईरान सरकार का आरोप है कि वास्तव में हमलावर जिहादी अलगाववादी थे।जिन्हें अमेरिका के संगठन वाले खाड़ी देशों ने समर्थन दिया था।

अमेरिका स्वयं महंगे कच्चे तेल को नहीं खरीदना चाहता।जैसे अभी हाल में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने सऊदी अरब को तेल महंगा करने के कारण धमकी दी कि " अमेरिकी सेना के मदद के बगैर किंग सलमान दो हफ्ते भी गद्दी पर नहीं बैठ पाएगे।" यहाँ देखा जाए तो सऊदी अरब के साथ अमेरिका का रिश्ता "तेल केंद्रित" नीति पर आधारित है।अमेरिका सऊदी अरब से सस्ते मूल्य पर तेल आयात करता है और सऊदी अरब उसके हथियारों हेतु बाजार भी है।ऐसे में अमेरिका अरब देशों में अपनी पकड़ को भी मजबूत बनाए हुए है।यही कारण है कि 2011 में अरब स्प्रिंग का प्रभाव ट्यूनीशिया, मिस्र ,सीरिया आदि देशों में हुआ, लेकिन सऊदी अरब अछूता रहा।अरब स्प्रिंग के कारण कई देशों में आज तक उथल पुथल मचा है।उसमें से सीरिया भी एक है।

रूस के संदर्भ में देखे में देखे तो रूस और भारत की दोस्ती सत्तर वर्ष पुरानी है और रक्षा उपकरण के मसले पर भारत की रूस पर निर्भरता रही है। आज के वैश्विक परिदृश्य में भारत के पास अपनी रक्षा जरूरतों को पूरा करने के लिए और भी विकल्प है जैसे इज़रायल, अमेरिका, फ्रांस। अमेरिका भारत के लिए दूसरा सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता देश है।अभी हाल में फ्रांस के साथ 36 राफेल लडा़कू विमानों हेतु समझौता हुआ है लेकिन रूस भारत में आज भी पहले नंबर पर हथियार आपूर्तिकर्ता देश है।

ज्ञात हो कि भारत को कौन सा रक्षा उपकरण चाहिए ।यह तो भारत तय करेगा।रूस की एस 400 एयर डिफेंस सिस्टम अमेरिकी थाड से एक बेहतरीन रक्षा उपकरण है।जिसकी कई विशेषताएं है।जैसे इसे केवल पाँच मिनट में तैयार किया जा सकता है।इसमें कई तरह के ऑटोनोमस डिटेक्शन, और टारगेंटिग सिस्टम और एंटी एयरक्राफ्ट मिसाइल सिस्टम लगा है।यह सिस्टम 400 किलोमीटर की दूरी से सभी प्रकार के विमानों और बैलेस्टिक क्रूज मिसाइलों का पता लगाने में सक्षम है और एक साथ साथ 100 हवाई टारगेट्स को भांप सकता है। जिससे भारत के रक्षा क्षेत्र को मजबूत बनाएगी और भारत के लिए गेमचेंजर साबित होगा। चीन पहले ही एस 400 को खरीदने हेतु समझौता कर चुका है।ऐसे में भारत के लिए यह उपकरण आवश्यक है जहाँ पाकिस्तान जैसा पड़ोसी है जो आतंकवाद को प्रोत्साहित करता हो और चीन सरीखे देश से हजारों किलोमीटर लंबी सीमा विवाद हो। 

ऐसे में अमेरिका द्वारा भारत को धमकी देना कि यदि रूस के साथ समझौते होगेंं तो काटसा कानून लगाएगा।इस कानून के माध्यम से अमेरिका अपने विरोधी देशों को प्रतिबंधों के जरिए दंडित करना चाहता है। पीटीआई ने अमेरिकी विदेश विभाग के एक प्रवक्ता के हवाले से लिखा है कि एस 400 एयर डिफेंस सिस्टम और मिसाइल डिफेंस सिस्टम सहित हथियार प्रणाली को अपग्रेड करना भी काटसा के दायरे में आता है।हालांकि एस 400 एयर डिफेंस सिस्टम को लेकर भारत सरकार और रूस के मध्य पाँच अरब डॉलर का समझौता 5 अक्टूबर 2018 को हो चुका है।जो 2020 तक भारत आने की संभावना है। 

ज्ञातव्य है कि यह प्रतिबंध संयुक्त राष्ट्र संघ का नहीं है बल्कि अमेरिका का है।इसलिए भारतीय विदेश मंत्री ने कहा था कि वे संयुक्त राष्ट्र संघ का सम्मान करती.है लेकिन किसी विशेष देश की बातों को नहीं मानती।जब ईरान पर प्रतिबंध लगा था तब भी तेल आयात होता रहा।यहाँ देखा जाए तो स्पष्ट संदेश है कि भारत अपनी रक्षा नीति के साथ समझौता नहीं करेगा।

अमेरिका को महसूस हो चुका है कि इस मामलेंं में भारत पर दबाव की नीति काम नहीं आएगी।इसलिए एस 400 के समझौते के बाद तेवर ढीले पड़ गए है और यहाँ तक कि ईरान से कच्चे तेल के खरीदने पर काटसा कानून के तहत छूट देने की बात कह रहा है।दरअसल अमेरिका को एशिया में भारत की आवश्यकता कई कारणों से है।जैसे चीन को संतुलित करने हेतु,अफगानिस्तान में शांति स्थापित करने हेतु,वैश्विक आतंकवाद को समाप्त करने में सहयोग हेतु आदि।इसके साथ साथ भारत अमेरिका के लिए एक वृहत बाजार भी है।ऐसे में यदि भारत के आर्थिक और रक्षा नीति को अमेरिका कमजोर करेगा तो यह उसके हित में भी नहीं है।संभवतः इसलिए भारत के प्रति अमेरिका ने तेवर नरम कर लिए है।
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