भारत अमेरिका संबंधों में तनाव की रेखाएँ

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत के गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल होने का निमंत्रण ठुकरा दिया है।


राहुल लाल

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत के गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल होने का निमंत्रण ठुकरा दिया है।ट्रंप के इंकार पर सफाई देते हुए व्हाइट हाउस ने कहा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति काफी व्यस्त हैं और जनवरी में भारत दौरे के लिए वक्त नहीं निकाल पा रहे हैं।प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले साल वाशिंगटन में वार्ता के दौरान ट्रंप को भारत आने का आमंत्रण दिया था।

व्हाट हाउस की प्रेस सचिव सारा सैंडर्स ने जुलाई 2018 में कहा था कि ट्रंप को भारत आने का निमंत्रण मिला है,लेकिन अभी कोई निर्णय नहीं लिया गया है।मोदी के निमंत्रण पर ट्रंप के फैसले के बारे में पूछे जाने पर व्हाइट हाउस के प्रवक्ता ने कहा -"राष्ट्रपति ट्रंप 26 जनवरी 2019 को भारत की गणतंत्र दिवस परेड के मुख्य अतिथि के तौर पर बुलाए जाने के प्रधानमंत्री मोदी के निमंत्रण को पाकर सम्मानित महसूस करते हैं,लेकिन पूर्व निर्धारित कार्यक्रमों के कारण इसमें भाग लेने में असमर्थ हैं।ऐसा बताया जा रहा है कि जब भारत गणतंत्र दिवस मनाएगा,उसी समय ट्रंप अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों की वार्षिक स्टेट ऑफ यूनियन(एसओटीयू)संबोधन के तहत संबोधित कर सकते हैं।आम तौर पर जनवरी के अंतिम सप्ताह या फरवरी के पहले सप्ताह में यह संबोधन होता है।
लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति जिस वार्षिक स्टेट ऑफ यूनियन की बात कर रहे हैं,वह हर वर्ष जनवरी में होता है।इस संबोधन में व्यस्तता के बावजूद पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा 26 जनवरी के गणतंत्र दिवस समारोह के मुख्य अतिथि रह चुके हैं।इससे स्पष्ट है कि अगर ट्रंप इस समारोह में भाग लेना चाहते तो वे वार्षिक स्टेट ऑफ यूनियन के संबोधन के बावजूद भारत आ सकते थे।अब प्रश्न उठता है कि आखिर ट्रंप ने इस निमंत्रण को अस्वीकार क्यों कर दिया?
उपरोक्त प्रश्न के उत्तर में भारत और अमेरिका के हाल के दिनों के थोड़े तनावपूर्ण संबंधों को माना जा सकता है।भारत और अमेरिका के संबंधों में खटास का कारण हाल ही में भारत और रूस के बीच हुआ समझौता है,जिसमें भारत ने अमेरिकी आपत्ति के बावजूद रूस के साथ-साथ एस-400 वायु सुरक्षा प्रणाली खरीदने का करार किया है।दरअसल,अमेरिका की इच्छा थी कि भारत,रुसी एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम के स्थान पर अमेरिकी 'थाड' को खरीदे।अमेरिका लंबे समय से कोरियाई प्रायद्वीप में थाड की तैनाती करता रहा है।अगर अमेरिकी थाड और रुसी-400 की तुलना करें,तो एस-400 अमेरिकी थाड से तकनीकी रुप से ज्यादा दक्ष और सस्ता भी है।

ऐसे में भारत द्वारा एस-400 को अमेरिकी "थाड" की तुलना में वरीयता देने से अमेरिका बौखला गया है।यूक्रेन में रुसी हस्तक्षेप और अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव में दखल के आरोप में राष्ट्रपति ट्रंप ने रूस पर प्रतिबंध लगा दिया है।रूस के साथ डिफेंस डील के चलते अमेरिका भारत पर कुछ प्रतिबंध लगाने का भी फैसला ले सकता है।अमेरिकी काटसा कानून कहता है कि अगर कोई देश रूस,ईरान और उत्तर कोरिया के साथ बड़ा लेन-देन करता है,तो वह अमेरिकी प्रतिबंध के दायरे में आएगा।अमेरिकी विदेश मंत्रालय एस-400 के डील से पूर्व भी कई बार भारत को धमकी भी दी थी कि भारत के ऊपर काटसा कानून के धारा- 231 के तहत कार्यवाई हो सकती है।सितंबर 2018 में अमेरिका ने चीन पर भी यही प्रतिबंध लगाया था।

तब चीन ने रुस से लड़ाकू विमान और मिसाइल डिफेंस सिस्टम खरीदा था।खबर के अनुसार भारत ने विगत 13 जुलूस को अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को गणतंत्र दिवस परेड में शामिल होने का आधिकारिक न्यौता भिजवाया था।हालांकि इस पर तब अमेरिका ने अपने जवाब में कहा था कि वह भारत और अमेरिका के बीच सितंबर में होने वाली 2+2 बैठक के बाद कोई फैसला करेगा।अब जिस तरह से अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत का न्यौता ठुकराया है,उससे दोनों देशों के संबंधों में आए तनाव का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।

इस संपूर्ण घटनाक्रम को समझने हेतु हम लोगों को भारतीय अर्थव्यवस्था के हालत भी समझने होंगे।भारतीय रुपया लगातार अभी दबाव में है।हम लोगों का विदेशी मुद्रा भंडार 400 अरब डॉलर पर पहुँच गया है।भारतीय अर्थव्यवस्था हेतु 400 अरब डॉलर का आँकड़ा एक मनौवैज्ञानिक आँकड़ा है और अगर विदेशी मुद्रा भंडार इससे नीचे आ गया तो यह चिंता की बात होगी।इसी साल अप्रैल में विदेश मुद्रा भंडार 426 अरब डॉलर तक पहुँच गया था,लेकिन उसके बाद से गिरावट लगातार जारी है।यही कारण है कि भारत रूस को एस-400 का भुगतान रूपये और रूबल में करेगा।इसके अतिरिक्त रूस ने रुपये और रुबल में भी व्यापार की स्वीकृति दी है।भारतीय रुपये के कमजोर होने के कारण हमारे आयात बिल में भी लगातार वृद्धि हो रही है।भारत अपने आवश्यकता का 80% पेट्रोलियम उत्पाद आयात करता है।अमेरिका ने मई में ईरान के साथ 2015 में हुए न्यूक्लियर समझौते से हाथ पीछे खींच लिए थे।इसके बाद ट्रंप ने ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए हैं।ईरान पर कुछ प्रतिबंध 6 अगस्त को लागू हो गए थे।तेल और बैंकिंग सेक्टर्स को प्रभावित करने वाले प्रतिबंध 4 नवंबर से लागू होंगे।इन प्रतिबंधों के लागू होने से ईरान से तेल खरीदने के लिए डॉलर में भुगतान करना मुश्किल हो जाएगा।भारत,ईरान से 27% तेल खरीदता है।भारत,ईरान के साथ व्यापार खत्म करने के पक्ष में नहीं है।वैश्विक जांच एजेंसियों के अनुसार ईरान ने परमाणु समझौते का पालन किया है।ट्रंप पूर्व के समझौते को निरस्त करके और कठिन समझौता लागू करना चाहते हैं।लेकिन चीन,यूरोप,भारत और रूस को ईरान का तेल चाहिए।

भारत का स्पष्ट कहना है कि भारत केवल संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों को स्वीकार करता है।भारत ईरान का दूसरा सबसे बड़ा तेल खरीददार है।ईरान ने भारत को भुगतान संबंधी जो रियायतें दे रखी हैं,भारत के लिए वे काफी मुफीद हैं।ऐसे में भारत के लिए चिंता का विषय है कि अगर भारत धीरे-धीरे ईरान से कच्चे तेल का आयात घटाता है,तो ऐसी सहूलियतें दूसरे विक्रेता नहीं देंगे।वे भारत की मजबूरी का फायदा भी उठा सकते हैं।ईरान भारतीय मुद्र और वस्तु विनिमय प्रणाली के द्वारा भी भारत को तेल आपूर्ति करता रहता है।अभी जब भारतीय विदेशी मुद्रा भंडार पर तेल आयात के कारण लगातार दबाव बना हुआ है,वैसे में ईरान से भारतीय रूपये और वस्तुओं में तेल खरीदने के महत्व को समझा जा सकता है।2012 में जब ईरान पर संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंध लगे थे,तब भी भारत,ईरानी तेल को बासमती चावल जैसे सामग्री से खरीद रहा था।इसी तरह भारत पूर्व में भी ईरान से भारतीय रूपयों में तेल खरीद रहा है।इस द्विपक्षीय व्यापार में डॉलर की कोई भूमिका नहीं है।ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद भारत द्वारा तेल आयात करने से भी भारत-अमेरिकी संबंधों में तनाव है।अभी अंतर्राष्ट्रीय बाजार में डॉलर की भागीदारी 39% है,जबकि यूरो की 35%।अगर भारत जैसे देश अंतरराष्ट्रीय मुद्रा के विकल्प के तौर पर यूरो का प्रयोग करते हैं,तो इससे डॉलर की वैश्विक भागीदारी एवं दबदबा काफी कम हो सकता है।ऐसे में अमेरिका का भारत के प्रति नाराजगी समझी जा सकती है।

ट्रंप के अमेरिका फर्स्ट की नीति के कारण चीन-अमेरिका ट्रेड वार के चपेट में संपूर्ण दुनिया है।इसका प्रभाव भारत पर भी हो रहा है।ट्रंप के संपूर्ण निर्णयों में काफी अनिश्चितता है।वह यूएसए के परंपरागत मित्रों के साथ भी दोस्ताना व्यवहार नहीं कर रहे हैं।उदाहरण के लिए इस वर्ष के जी-7 बैठक में जर्मनी, फ्रांस जैसे भी ट्रंप के व्यवहार से आहत थे।वहीं अमेरिका के सदाबहार मित्र कनाडा के प्रति भी ट्रंप का व्यवहार काफी कठोर हो गया है।ऐसे में ट्रंप को गणतंत्र दिवस का निमंत्रण देने से पहले भारत को सावधानी बरतनी चाहिए।यह वैसा आमंत्रण नहीं है कि दोनों सरकारों के लिए जब अनुकूल होगा तो यात्रा हो जाएगी।यह मामला देश के गणतंत्र दिवस समारोह का है।हाल में ऐसा कोई मामला ध्यान नहीं आ रहा कि जब भारत सरकार के ऐसे आमंत्रण को किसी राष्ट्राध्यक्ष ने ठुकराया हो।अच्छा होता कि गणतंत्र दिवस परेड हेतु निमंत्रण से पूर्व कूटनीतिक प्रयासों द्वारा पहले ट्रंप के आमंत्रण स्वीकार करने के संभावनाओं को देखा जाता।

ईरान अमेरिका परमाणु संधि ,ट्रांस पैसिफिक पार्टनरशीप और पेरिस जलवायु समझौते डील तोड़ चुके ट्रंप ने एक और कदम उठाते हुए रूस के साथ शीत युद्ध समय हुई शस्त्र नियंत्रण संबंधी 1987 के आईआरएनएफ संधि से भी कदम पीछे खींच लिए हैं।

जब अमेरिका पेरिस संधि से बाहर निकला था,तब भी ट्रंप ने भारत की कठोर आलोचना की थी,जबकि भारतीय संस्कृति स्वतः प्रकृति के संरक्षण का प्रेरणा देती है।अमेरिका के विपरीत भारत अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं का पालन करने वाला देश है।विदेश नीति में किसी भी देश के लिए राष्ट्रीय हित एवं अंर्तराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं का विशेष महत्व है।अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद रूस और ईरान के साथ भारतीय व्यापार देश के राष्ट्रीय हित की माँग है।ऐसे में भारत को भविष्य में भी अमेरिकी दबाव में न आकर स्वतंत्र विदेश नीति के मार्ग का ही पालन करना चाहिए।
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