विश्व हिंदू परिषद् ने राममन्दिर निर्माण के नाम पर रामभक्तों से जो अरबों रुपये-सोनेचांदी लिए वह कहाँ गये ?

अध्यादेश के नाम पर भ्रम फैला कर माहौल बनाया जा रहा है! काशी में मंदिरों का थोड़ा जाना धार्मिक, शास्त्रीय और संवैधानिक और अनैतिक है।


परमधर्मसंसद् 1008 के प्रथम सम्मिलन दिनांक 25,26,27 नवम्बर 2018 ईसवी, वाराणसी के अवरसदन के पारित प्रस्तावों, प्रवर सदन के अभिमतों और परमसदन के लिखित परामर्शों के आलोक में परमाराध्य परमधर्माधीश द्वारा पारित।

जीत नारायण सिंह 
परम-धर्मादेश: श्री रामजन्मभूमि विवाद यूँ तो न्यायालय के समक्ष 1885 से लम्बित है।माननीय उच्चन्यायालय के समक्ष सभी वाद एक साथ समग्र होकर 1989 में प्रस्तुत हुए।जिसमे गोपाल सिंह विशारद, निर्मोही अखाड़ा एवम सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड वादी के रूप में थे। हिंदुओं की ओर से रामजन्मभूमि पुनरुद्धार समिति जिसके संरक्षक हम (पूज्यपाद जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज) हैं, हमने 1989 में मुख्यवाद 4/1989 सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने प्रभावी रूप से अपना पक्ष प्रस्तुत किया।

इसी बीच मे जहाँ प्राचीन मंदिर जीर्ण होकर विद्यमान था-जिसके गर्भ गृह में रामलला विराजमान थे उससे 192 फुट दूर स्थित सिंह द्वार पर कतिपय संस्थाओं द्वारा शिलान्यास करवाया गया। जिसमें भारत ही नही अपितु देश विदेश से शिलाएं और प्रभुत्व द्रव्य एकत्र किया गया।विश्व हिंदू परिषद् ने राममन्दिर निर्माण के नाम पर रामभक्तों से अरबों रुपये-सोनेचांदी(जिसमे सोने चांदी की ईंटें भी शामिल थी) एकत्र किया। ये रुपये और सोना-चांदी कहाँ गये इसका अभी तक कोई पता नही चला है।इसे देने वाले रामभक्तों को न तो इसके बारे में आजतक कोई सही सूचना दी गयी है और न ही इसकी कोई आडिट रिपोर्ट ही देखने को मिली है।

अब जबकि माननीय उच्च न्यायालय ने 30 सितम्बर 2010 को साक्ष्यों, सबूतों एवं वैज्ञानिक रिपोर्ट के आधार पर सर्वसम्मति से यह निर्णय दे दिया कि जहाँ रामलला विराजमान हैं वही भगवान् श्रीराम की जन्म भूमि है।उल्लेखनीय है कि उक्त तथ्य श्रीराम जन्मभूमि पुनरुद्धार समिति द्वारा सिद्ध किये गये कि वहाँ कभी बाबर गया ही नही और न कभी किसी मस्जिद का निर्माण हो सका।श्रीराम जन्मभूमि पनरुद्धार समिति के द्वारा दिये गये तर्कों प्रमाणों एवम साक्ष्यों, ऐतिहासिक पुस्तकों एवम अन्य विधिक निर्णयों के आधार पर माननीय उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में संज्ञान लिया एवम सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड और निर्मोही अखड़ा के वाद को पूरी तरह से खारिज किया।परन्तु उनको 1/3 भाग देने का आदेश भी कर दिया।इस 1/3 भाग के विभाजन के विरुद्ध श्रीराम जन्मभूमि पुनरुद्धार समिति ने माननीय उच्चतम न्यायालय के समक्ष अपील के माध्यम से चुनौती दी जिसे स्वीकार करते हुए उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय के आदेश को अपील के निस्तारण तक के लिये स्टे कर दिया जो कि आज भी लागू है।

भूमि का विभाजन रोका गया है न कि 67 एकड़ भूमि के अर्जन को।

यहाँ यह कहना उचित होगा कि भूमि का विभाजन रोका गया है न कि 67 एकड़ भूमि के अर्जन को। जिसका पूर्व प्रधान मंत्री स्वर्गीय नरसिम्हा राव के समय मे अधिग्रहण हुआ था। उनके अनुरोध पर श्रृंगेरी में शंकराचार्यों सहित अन्य धर्माचार्यों का सम्मेलन हुआ और यह प्रस्ताव आया कि यदि धर्माचार्य आगे आते हैं तो भूमि श्रीराम मंदिर के लिये दी जा सकती है। इस पर सभी धर्माचार्यों ने उक्त सम्मेलन में राममन्दिर (रामालय) के लिये मांग की तदनुसार एक ट्रस्ट का गठन हुआ जिसका नाम श्रीराम जन्मभूमि रामालय न्यास है। भूमि के अधिग्रहण में प्रधानमंत्री के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया था कि अधिगृहित भूमि अधिग्रहण के पहले की किसी संस्था को नही दी जायेगी।अपितु इसके पश्चात इस उद्देश्य के लिये जो नया ट्रस्ट बनेगा मंदिर निर्माण हेतु उसे सौंपी जाएगी। यहाँ यह भी स्पष्ट करना उचित होगा कि अधिग्रहण के पूर्व बने ट्रस्टों की इस संबंध में कोई मान्यता न होगी। इस लिए रामालय ट्रस्ट ही इसका विधिक अधिकारी है जो अधिकरण के पश्चात इसी उद्देश्य से गठित हुवा है।

 पैसा मन्दिर के लिए लिया गया है तो उससे मंदिर ही बनना चाहिए। 

अब वर्तमान परिप्रेक्ष्य में उत्तर प्रदेश की सरकार इस निर्णय में विलम्ब विलम्ब का लाभ उठाकर दूसरी योजना बना रही है जिसके अनुसार अयोध्या में सरयू के किनारे स्वर्गद्वार के निकट एक कांसे का 221 मीटर ऊँचा पुतला बनाया जाएगा, जिसमें खर्चा लगभग 800 करोड़ का है। यह पैसा यदि वह है जो विश्व हिन्दू परिषद द्वारा जनता से एकत्र किया गया है या फिर सरकार का- दोनो ही स्थितियों में यह पैसा जनता का है। यदि श्री राम जन्म भूमि का निर्माण कार्य समय पर नहीं होगा तो जनता का सारा पैसा श्रीराम के पुतले में खर्च हो जाएगा। ऐसी स्तिति में जनता की श्रीराम मंदिर निर्माण की चिरकाल की आकांक्षा एवं भावना सदा के लिए धूमिल हो जाएगी। यह आर्थिक अपराध भी है कि जिस मद के लिए पैसा लिया गया उस मद में खर्च न कर उसे किसी और मद में खर्च किया जाए। यदि पैसा मन्दिर के लिए लिया गया है तो उससे मंदिर ही बनना चाहिए। इसलिए हम लोकहित और राष्ट्र हित को ध्यान में रखते हुवे सनातन धर्मियों की आकांक्षाओं के अनुरूप न्यायालय में 1989 से ही पैरवी कर रही संस्था श्रीराम जन्मभूमि पुनरुद्धार समिति से यह अनुरोध करते हैं कि वह माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष यह अनुरोध करें कि वह उच्च न्यायालय के निर्णय को समर्थन देते हुवे जिनकी अर्जी खारिज हो गई है उनकी अपील को खारिज करें एवं भारत के मूर्धन्य धर्माचार्यों द्वारा गठित श्री राम जन्मभूमि रामालय न्यास श्री राम जन्मभूमि पर निर्विवाद रूप से ब्रह्म राम के मंदिर का निर्माण कार्य कर सकें।

अध्यादेश के नाम पर भ्रम फैला कर माहौल बनाया जा रहा है! 

आजकल देशभर में यह भ्रम फैलाया जा रहा है और माहौल बनाया जा रहा है कि अयोध्या मामले के निस्तारण के लिए सरकार संसद के शीट कालीन सत्र में अध्यादेश ले आये। यहाँ प्रश्न यह है कि जब पहले से ही भूमि सरकार के पास है तो फिर अपने पास की भूमि को प्राप्त करने की बात हास्यास्पद नहीं तो क्या है? साथ ही यदि इस तरह का कोई अध्यादेश लाया गया तो मुसलमानों के मन में यह बात सदा रह जाएगी कि हिंदुओं की सरकार ने अपने बल का प्रयोग कर हमारे साथ अन्याय किया।

 श्री राम जन्म भूमि का मामला राष्ट्रीय महत्व का औऱ लोकहित से जुड़ा मामला है। 

अतः हम इस परम् धर्मादेश के माध्यम से भारत की केंद्रीय सरकार से श्री राम जन्म भूमि पर श्री राम भगवान के मंदिर का त्वरित निर्माण सुनिश्चित करने हेतु संप्रभुता सन्निहित भारतीय संसद से अनुरोध करते हैं और प्रस्ताव करते हैं की वे संविधान संशोधन करके भारतीय संविधान के अनुच्छेद 133 व 136 में अनुच्छेद 226 (3) के अनुरूप एक नई कणिका प्रविष्ट कर यह प्रावधान करें कि श्री राम जन्म भूमि का मामला राष्ट्रीय महत्व का औऱ लोकहित से जुड़ा मामला है। यह स्थापित विधि व्यवस्था है। यदि किसी मामले को अधिसूचना द्वारा केंद्र सरकार राष्ट्रीय महत्व का अथवा लोकहित का घोषित करती है तो उच्चतम न्यायालय को 4 सप्ताह के भीतर ही ऐसे महत्वपूर्ण मामले का निपटारा करना होगा। अन्यथा उस मामले में दिया गया उच्चतम न्यायालय का अंतरिम स्थगनादेश / यथास्थिति 4 सप्ताह की अवधि बीतते ही स्वतः ही निष्प्रभावी हो जाएगा। इस प्रावधान में यह निहित है कि ऐसे मामले में सभी पक्षकारों को नोटिस भेज दी गई हो और कागजी प्रक्रिया पूर्ण हो। सौभाग्य से आठ वर्षों से लम्बित यह औपचारिक्ता पूर्ण की जा चुकी है।


हम इस परम धर्मादेश द्वारा श्रीरामजन्मभूमि पुनरुद्धार समिति से भी अनुरोध करते हैं कि वह उच्चतम न्ययालय में एक समुचित आवेदन कर उनका ध्यान इस ओर आकृष्ट करें कि जब तीन न्यायाधीशों ने अपने पूर्व के निर्णय में श्रीरामजन्मभूमि मामले को महत्वपूर्ण मान कर प्राथमिकता के आधार पर दिन-प्रतिदिन सुनुवाई का आदेश दिया था और इसी आधार पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खण्डपीठ में दिन प्रतिदिन की सुनवाई भी हुई थी तब तीन न्यायाधीशों की दूसरी खण्डपीठ द्वारा प्राथमिकता के आधार पर सुनवाई न करने का आदेश क्या ला आफ प्रेसिडेंसी और न्यायिक अनुशासन के प्रतिकूल नहीं है ? और तत्काल सुनवाई की प्रार्थना करें ।

हम यह परम धर्म देश की संसद के सभी सदस्यों सहित लोकसभा अध्यक्ष को प्रेषित कर रहे हैं ताकि वे इसे लोकसभा के पटल पर 11 दिसंबर से आरंभ हो रहे शीतकालीन सत्र मैं रख सके।

काशी में मंदिरों का थोड़ा जाना धार्मिक, शास्त्रीय और संवैधानिक और अनैतिक है। 

काशी में मंदिरों का थोड़ा जाना धार्मिक, शास्त्रीय और संवैधानिक और अनैतिक है । काशी मे विश्वनाथ गलियारे के बहाने अनेक प्राचीन मंदिरों का शासन तंत्र के द्वारा विध्वंस कर देव विग्रहों के अपवित्रीकरण एवं निर्वासीकरण जैसे दुष्कृत्यों की घोर भर्त्सना करते हुए इसे हिंदू धर्म पर आघात और धर्मा विरोध ही नहीं असंवैधानिक भी घोषित करते हैं । यह स्थापित और धर्म शास्त्रीय व वैज्ञानिक विधि है कि प्राण प्रतिष्ठित देव विग्रह जीवंत व्यक्ति की भाती राग भोग वस्त्र आदि की अपेक्षा रखते हैं और उन्हें इन आवश्यकताओं से वंचित करना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 एवं 26 के प्रावधानों का अतिक्रमण करना है काशी में देव मंदिरों को तोड़ने वाले अयोध्या में मंदिर निर्माण के अधिकारी कैसे हो सकते हैं ?

अतः हमारा यह स्पष्ट मत है कि श्रीराम मंदिर का निर्माण चारों शंकराचार्यो, रामानंदाचार्यो, रामानुजाचार्यो, मध्वाचार्यों, निंबार्काचार्यो, तेरह अखाड़ों के प्रमुखों के पर्यवेक्षण में कराया जाना चाहिए ना कि सामाजिक या सांस्कृतिक अथवा राजनीतिक संस्था से संबंधित व्यक्तियों या इकाइयों के द्वारा ऐसी स्थिति में यह परमधर्मसंसद् 1008 यह परम धर्मादेश निर्गत करती है जिससे संविधान संशोधन के माध्यम से न्यायालय में त्वरित सुनवाई करवाकर श्रीराम जन्मभूमि में चिर प्रतीक्षित श्रीराम मंदिर बनने का मार्ग प्रशस्त होना सुनिश्चित हो यह स्वामिश्रीः अविमुक्तेश्वरानन्दः सरस्वती प्रवर धर्माधीश जी का कथन हैं।
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