सत्ता-दौलत-पद का ख़ुमार और अधिकारी के विवेक हीनता

नेता जी को अपमानित करने की एक सोची समझी साजिश अभी इस रहस्य से पर्दा हटना बाकी है।


के सी शर्मा 
देश की उर्जाधानी का गौरव अर्जित करने वाले सिंगरौली परिक्षेत्र में कल सत्ता- दौलत-पद के नशे में मदमस्त को बहकते देखा और टेक्नोक्रेसी की बदमिजाजी देखने को मिली।यह नजारा एक महान पर्व पर आयोजित सांस्कृतिक संध्या कार्यक्रम के मंच पर दिखा ।

छठ व्रत भगवान सूर्यदेव को समर्पित हिंदुओ का एक विशेष पर्व हैं।यह पर्व खासकर उत्तर भारत के बिहार,झारखंड,उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में महापर्व के रूप में मनाया जाता है।हिन्दू शास्त्रों के अनुसार भगवान सूर्य एक मात्र प्रत्यक्ष देवता हैं।छठ देवी भगवान सूर्यदेव की बहन है।छठ पर्व उर्जाधानी में भी बड़े धूम - धाम और हर्सोउल्लास के साथ मनाया जाता है और कल भी मनाया जा रहा था।

इस सिंगरौली क्षेत्र में भी लाखों के तादात में बिहार,झारखंड,उ प्र के पूर्वाचल के लोग निवासरत है।इस अवसर पर इस परिक्षेत्र के एक परियोजना के पार्क,बगीचे,व प्रकृति से अच्च्छादित के बीचो बीच बहने वाली प्रकृतक झील ,कल -कल करती बाताबरण को मनोरम करने वाली के तट पर 25 हजार से ज्यादा श्रद्धालु प्रति वर्ष एकत्रित होते हैं।

इन्ही श्रद्धालुओ,व्रतियों,जो हजारो के तादात में तट पर ही रात गुजारते है और सुबह का उगते सूर्य को अर्घ दे वापस घर जाते हैं।इन्ही व्रतधारियों  व श्रद्धालुओ के लिए परियोजना के सहयोग से एक सामाजिक संस्था हर वर्ष एक सांस्कृतिक संध्या व देवी जागरण का कार्यक्रम आयोजित करती हैं।

पत्रकार भी इस कार्यक्रम को आंखों देखा कवरेज करने के उद्देश्य से कार्यक्रम में शिरकत कर रहा था।जहां  चल रहे कार्यक्रम में उक्त नजारा देखने को मिला ।

इस तरह शुरू हुआ सांस्कृतिक कार्यक्रम

इस अवसर पर होने वाला कार्यक्रम तीन चरणों मे होना था। पहला चरण आधा दर्जन स्थानीय स्कूल के बच्चों के द्वारा मंच पर सांस्कृतिक कार्यक्रमो की प्रस्तुति थी, दूसरे चरण में मुख्य अतिथि,विशिष्ठ का उदबोधन, तथा कार्यक्रम के जज रूपी निर्णायक मंडल द्वरा प्रथम,द्वितीय,तृतीय, विजेताओं की घोषणा करना और उन्हें अतिथियो द्वारा पुरष्कृत किया जाना था।ततपश्चात रात भर चलने वाला भक्ति रस से पूरी रात सराबोर रखने वाला देवी जागरण शुरू होने वाला था।पहला चरण सुचारु रूप से शांति पूर्ण सम्पन्न होगया।दूसरे चरण का आधा भाग भी जिसमे मुख्य अतिथि, विशिष्ठ अतिथि का उदबोधन था वह भी होगया।सब कुछ पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार ही सुचार रूप से क्रमशः आगे बढ़ रहा था।

इस तरह कुछ पल के लिए मंच पर आई अचानक तल्खी

यह वह समय था जब निर्णायक मंडल द्वारा विजेताओं की घोषणा और उन्हें अतिथियो द्वारा पुरष्कृत करना था।कि परियोजना के एक अधिकारी द्वारा एक सामाजिक,राजनैतिक कार्यकर्ता को मंच से उपेछात्मक,ढंग से जलील करने का प्रयास कर अपनी अदूरदर्शिता का परिचय दे दिया गया।फिर क्या था कुछ पल के लिए मंच का माहौल तल्ख हो उठा।परन्तु मंच पर मौजूद स्थानीय थाने के प्रभारी निरीक्षक ने वगैर देर किए स्वयं का हस्तक्षेप करते हुए स्थिति को सम्हाल लिया। यह सब भी कुछ पल ही में घटा। कोई जाना कोई नही जाना।फिर सब सामान्य होगया और फिर कार्यक्रम चलने लगा।

थोड़े देर बाद तब फिर माहौल कुछ छड़ के लिए तल्ख हो उठा ,जब कार्यक्रम के नवधनाढ्य विशिष्ठ अतिथि ने भी उक्त नेता की सरे मंच यह व्यग बोल बेआबरू कर दिया कि मंच की गरिमा आपने ऐसा कर दिया कि अब यह मंच हमारे लायक नही रहा।अपने ही परिवार के एक अनुसांगिक संगठन का पदाधिकारी मंच पर उन्हें बिना गलती के अपमानित कर उन्हें झिड़कते हुए मंच छोड़ नीचे चला जायेगा।यह तो उनके कल्पना में भी नही रहा होगा।पर यह घटित हुआ।जिसे देख नेता जी कुछ छड़ के लिए सन्न रह गए और दांतों तले अंगुली चबाने को विबस हो गए।थोड़े पल के लिए तो नेता जी की स्थिति मानो तो साप के काटे खून न निकलने जैसी हो गयी।लेकिन सार्वजनिक कार्यक्रम को ध्यान में रख अपने को उन्होंने संभाला और अपमान का घूट पी कर भी सीने पे पत्थल रख चुप हो गए।इसके बाद दूसरे चरण का कार्यक्रम सम्पन्न होगया। फिर शुरू हुआ तीसरे चरण का कार्यक्रम जो रात भर शांति पूर्वक श्रोताओं को थिरकाते, झूमाते चला।

इस तरह दिखी टेक्नोक्रेसी की बदमिजाजी

35 वर्षो के पत्रकारिता में पहली बार इस तरह किसी अधिकारी द्वारा सार्वजनिक मंच पर विवेक हीनता देख मै स्वयं थोड़े देर के लिय हतप्रभ रह गया।इस अधिकारी ने उक्त नेता जो इस क्षेत्र में 35 वर्षो से सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में अपने जीवन का महत्वपूर्ण पल समाज को दिया है।

वे वर्तमान सत्ता पार्टी के एक महत्वपूर्ण पद पर भी है।यह जानते हुए उक्त अधिकारी ने उन्हें मंच से उपेक्षित ही नही किया बल्कि अपमानित और बुरीतरह जलील भी कर दिया।

यह सुनियोजित था या नेता जी को अपमानित करने की एक सोची समझी साजिश अभी इस रहस्य से पर्दा हटना बाकी है। जिसकी बारीकी से यह पत्रकार तह में जाकर पड़ताल करने में लगा है ।जो पाठको को अगले किस्त मे सच से रूबरू कराएगा,तब दूध का दूध,पानी का पानी अपने आप हो जाएगा।

अधिकारी के इस व्यहार से वे छुब्ध हो उठे और वे भी प्रतिक्रिया में व मंच पर एकाद अन्य वरिष्ठों ने भी अधिकारी के इस आचरण पर मंच पर ही आपत्ति दर्ज कराते हुए इस अकल्पनीय ,कृत्य पर नाराजगी व्यक्त की।
नेता जी का दोष सिर्फ यह था कि वे मंच पर बगैर आमंत्रित किये चले गए थे और उन्होंने मंच संचालक से इजाजत ले यह सुझाव दे दिया कि जो बच्चे बिजेता नही है उन्हें भी सांत्वना पुरष्कार यदि सम्भव हो तो दिया जाए तो यह एक और बच्चों का मनोबल बढ़ाने में काफी कारगर सिद्ध हो सकता है।

बेचारे नेता जी का मात्र इतना ही अपराध था।

नेता जी के इस दिए गए सुझाव को अधिकारी महोदय इसे उनकी गुस्ताखी मान लिए और परियोजना को अपनी जागीर समझने वाले उक्त अधिकारी तुरन्त मंच पर तमतमाये पहुचे और माइक पकड़ते ही 25 हजार से अधिक जनता की मौजूदगी में नेताजी का बखिया उधेड़ते हुए नेता जी के 35 वर्षो की सामाजिक,राजनैतिक सेवा का जनाजा निकाल दिया।जिसकी जबरदस्त प्रतिक्रिया भी हुई और जारी भी है।

सत्ता-दौलत-पद के नशे में मदमस्त को बहकते देखा

अधिकारी के द्वारा जलालत झेल चुके नेता जी को थोड़े ही देर में अपने ही दल के एक अनुसांगिक संगठन के पदाधिकारी से भी रु बरु होना पड़ गया ,जब उनके सामाजिक राजनैतिक जीवन के सफर से भी कम उम्र का शख्स उन्हें एक बार फिर खरी खरी व जलालत भरा उपदेश देते हुए यह कह मंच छोड़ दिया कि यह मंच उसके गरिमा के अनरूप नही है।इस के बाद उसने मंच का बहिष्कार कर अपने ही अनुसांगिक राजनैतिक दल के बर्तमान जिम्मेदार पदाधिकारी का हजारो के हुजूम में अपमानित कर नेता जी को धो डाला।उसके नजर में नेता जी का दोष यह था कि वह अधिकारी के द्वारा किये गए अपमान को घुट कर पिलेते परन्तु प्रतिक्रिया नही देते,लेकिन नेता जी भी स्वभाव से स्वाभिमानी रहे है इस लिए प्रतिक्रिया दे ही दिया।

लेकिन एक अहम प्रश्न इस घटना यह उठता है कि जब सब मंच का बातावरण सामान्य होगया था तो फिर इसकी विशिष्ठ अतिथि को अचानक क्या आवश्यकता पड़ी गयी?क्या यह विशिष्ठ अतिथि के पद के गरिमा के विपरीत नही है?

यह सर्व विदित है कि जिस गांव और जमात के लोगो द्वारा वह संस्था सन्चालित है।अपमानित होने वाले नेता जी भी उसी गांव व जमात से आते हैं?,तो क्या यह कहना अतिश्योक्ति तो नही होगा कि जिस मंच और जमानत ने उन्हें सर माथे बैठा विशिष्ठ अतिथि का सम्मान दिया वे उसी जमात के एक सदस्य जो सामाजिक राजनैतिक कार्यकर्ता है सत्ता और दौलत के नशे में उसकी सार्बजनिक तौर पर इज्जत तार-तार करने की गुस्ताखी नही कर दिया?यह यक्ष प्रश्न विचारणीय तो अब खड़ा हो ही गया है?

और इस तरह इस नव धनाढ्य, ने सत्ता-दौलत-पद के नशे में मदमस्त होकर अपनी राजनैतिक हनक दिखाने का असफल प्रयास कर ही डाला।इसको लेकर फिर माहौल तल्ख होते होते बचा।

यह शख्स यहाँ अपने ही परिवार के नेता का सार्वजनिक अपमान कर ,परियोजना प्रबंधन,स्थानीय प्रशासन का अपने को हितैषी दिखा, इस मौके पर उनकी हमदर्दी बटोरने के चक्कर मे सारे मर्यादा को ताक पर रख दिया।थोड़े देर पहले उसी मंच पर नेता जी को संस्कार की पाठ पढ़ाने वाला यह शख्स कितना संस्कसरित था अब यह पाठको को बताने की आवश्यकता नही पड़ेगी,वह सब सहज ही समझ गये होंगें।

इस तरह यह शख्स आमजन में अपने को हिजहाईनेस साबित करने का प्रयास करने में अनुभवहीनता में अपना वह स्वरूप भी दिखा दिया।जिसके लिए वह चर्चित भी रहा है।जिसे यह कह सकते हैं कि जनता सब कुछ जानती हैं।यह नव धनाढ्य,सत्ता, दौलत, पद के नशे में इतना चूर था कि वह यह भी भूल गया कि नेता जी का परिवार तो उस परियोजना का विस्थापित भी है।

जिनका उस परियोजना के निर्माण में योगदान भी है।जो समिति उन्हें विशिष्ठ अतिथि बना के बुला कर मंच पर उनको सम्मान दिया।वह उसी विस्थापित परिवार के सदस्य थे।उस नेता को उसके ही सरजमी पर जिसने देश के यहा आनेवाले लोगो को पाव रखने और सर छिपाने का छत दिया अपना परिवार,भाई माना दशको से गले लगाया।अपने हकहकूक को छीनते अपनी आँखों से देखा परन्तु उफ तक नही किया।

श्रृंगी ऋषि के इस तपो भूमि के दधीचि रूपी भूमि पुत्रो में से एक का सार्वजनिक तौर पर छण भर के लिए ही सही अपमान कर नेता जी के 35 वर्षो के सामाजिक संघर्षों को झूठा आरोप उन पर मढ़ पलीता लगाने का दुस्साहस कर बैठा । इस तरह सत्ता-दौलत- पद में मदमस्त को बहकते देखा!

इस घटना कि दिन भर इलाके में प्रतिक्रिया होती रही।जितने मुह उतनी बाते होती रही है।पर इसमें यह भी सच है कि हो रही प्रतिक्रिया में निकल रहे मन के भड़ास से तो यह सहज ही अंदाजा लगाया जासकता है कि सत्ता के नाम पर दलाली करने वाले रहनुमाओं के खिलाफ वर्षो से सीने में दफन नाराजगी का जनआक्रोश में तब्दील न होजाये और अपमानित नेता कही खार खाने वालों की ढाल न बन जाये कि सम्भावना से भी इंकार नही किया जासकता है?
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