रफाल डील और सुको की सीमा

डॉ कुणाल सिंह 
रफाल डील पर सुको का फैसला आ चुका है. सरकार को क्लीन चिट से जहाँ इस फैसले से मोदी सरकार खुश नजर आ रही है, वहीँ विपक्ष अब भी हमलावर है. कानून के जानकारों के अनुसार सुको का यह फैसला विवशता भरा है. आइये समझते हैं कि सच्चाई क्या हो सकती है.

मार्च २०१५ में १२६ विमानों की खरीद का अनुरोध प्रस्ताव वापस लेने की बात अदालत के फैसले में है. डील होती है दस अप्रेल दो हजार पंद्रह को, आठ अप्रेल को विदेश सचिव कहते हैं कि एचएएल डील में शामिल है. दस अप्रेल के चौदह दिन पहले यानि मार्च २०१५ में ही रफाल के सीइओ “हाल” के डील में शामिल होने पर ख़ुशी जाहिर करते हैं. इधर सरकार डील हाल से नहीं बल्कि रिलायंश से करी थी. क्या उन्हें मोदी सरकार के डील की खबर नहीं थी या उन्हें नजरअंदाज कर दिया गया.

भारतीय आफसेट पार्टनर के बारे में सुको ने कहा है कि हमने रिकार्ड पर पर्याप्त सामग्री नहीं देखि है जिससे पता चलता हो कि यह मामला भारत सरकार द्वारा किसी को ( अनिल अम्बानी को) व्यवसायिक लाभ पंहुचाने का हो.

फैसले में लिखा है कि कीमतों को लेकर सीएजी की रिपोर्ट को देखा है जिसे संसद की लोकलेखा समिति को सौंपा गया. लेकिन इस समिति (पीएसी) के अध्यक्ष तो कांग्रेस के मल्लिकार्जुन खडके हैं. उनकी जानकारी में कोई सीएजी रिपोर्ट है ही नहीं , न उनके पास आया . तो फिर कोर्ट में कौन सी रिपोर्ट कैसे और कहाँ से पहुंची ?

छबीस पन्नों के फैसले में सुको ने कहा है कि की सवालों की समीक्षा उसके अधिकार छेत्र मेंमें नहीं आता है. मतलब अनुतरित सवालों का जबाब कोर्ट भी नहीं खोज सकता. यही वह पॉइंट है जिसमें मोदी सरकार डील के भ्रष्टाचार बचके निकलते दिख रही है.

राहुल गाँधी ने भी फैसले पर सवाल उठाए हैं. उन्हों ने कहा है कि जैसा सुको ने कहा है कि कैग की रिपोर्ट पीएसी द्वारा जांचा गया है वह सार्वजनिक है , तो मैं बता देना चाहता हूँ कि अभी तक किसी नें भी इस रिपोर्ट को देखा तक नहीं है.

कुल मिला कर राफेल डील का बैताल  फिर शक के उसी ठुठे डाल पर जा बैठा है जहाँ पहले बैठा था.
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