प्रदुषण से मुक्ति पाने के लिए जागरूकता जरूरी है।

सड़कों पर गर्द उड़ाते और मासूमों को कुचलते वाहनों पर कार्यवाही में आनाकानी और बेशर्मी करने वालों से ठोस कार्यवाही की उम्मीद ही बेईमानी है।

ब्दुल रशीद
देश में विकास के नाम पर नियमों को दरकिनार कर प्रकृति के दोहन से शहरों में बढ़ता प्रदूषण आम जनता के लिए बड़ी मुसीबत बनता जा रहा है। लोग प्रदूषण के कारण गंभीर बीमारियों का शिकार हो रहें और युवा अवस्था में ही अस्पतालों और डाक्टरों के चक्कर लगा रहे हैं। जीवन में से खुशियां और होंठो से हंसी लुप्त हो रही है। 

बाहर निकल कर साफ हवा में सांस लेना लाभदायक नहीं रह गया है।ऐसा अचानक नहीं हुआ है,लेकिन जिम्मेदार जिम्मेदारी निभाने के बजाय काग़जी कार्यवाही और लीपापोती करने में व्यस्त रहते हैं। बाबूओं और नेताओं को तो अपना पैसा बनाने और जनता को चूसने से फुर्सत ही नहीं मिलती। उन्हें प्रदूषण जैसी फालतू चीज से कोई मतलब नहीं है। 

भोजन बनाने के लिए प्रयोग किए जाने वाले चूल्हे और भट्टी की जगह लोग गैस का प्रयोग कर प्रदूषण से मुक्त हो गए। क्या गैस का प्रयोग करने के लिए कानून बनाना पड़ा? नहीं न। पॉवर प्लांट और कोयला खनन से निकलने वाले प्रदूषण से बचने के लिए जो मौजूदा तरीका उपलब्ध है कम से कम उसका तो इस्तेमाल हो? 

जलवायु परिवर्तन को लेकर भारत अपनी प्रतिबद्धताओं में भले ही आगे रहना चाहता है लेकिन सरकारों का और अधिकारियों का रवैया कुल मिलाकर पर्यावरण को लेकर उदासीन ही रहा है। फिर वो चाहे गंगा जैसी नदियों का प्रदूषण हो या फिर छोटे बड़े शहरों, महानगरों का वायु प्रदूषण, दिल्ली ही नहीं देश के कई शहर धूल और धुएं से घिरे हुए हैं। 

स्वास्थ्य पर वायु प्रदूषण के कुप्रभावों के बारे में अपनी तरह की पहली बैठक बीते महीने जिनेवा में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बुलाई थी लेकिन मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक इस महत्त्वपूर्ण बैठक में भारत सरकार का कोई मंत्री नहीं पहुंचा। बैठक में स्वास्थ्य, पर्यावरण और पेट्रोलियम मंत्रियों को विशेष तौर पर आमंत्रित किया गया था लेकिन तीनों केंद्रीय मंत्री उन दिनों सरकार पटेल की मूर्ति के अनावरण के अवसर पर रन फॉर यूनिटी अभियान में व्यस्त थे। पर्यावरण के लिए मौजूदा सरकार के मंत्री कितना गंभीर हैं उनके द्वारा चयनित प्राथमिकता दर्शाता है। 

मौजूदा स्थिति ये है कि वायु की गुणवत्ता, जैव विविधता और ग्रीन हाउस उत्सर्जन के मामलों पर अपेक्षित सुधार न कर पाने के कारण भारत वैश्विक पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक में सबसे निचले पायदानों पर है। 2018 में भारत 180 देशों में 177वें स्थान पर है। ये आंकड़ा स्टेट ऑफ इंडिया एन्वायरन्मेंट (एसओई) की रिपोर्ट में आया है। ऊर्जा क्षेत्र में भी स्थिति निराशाजनक है। 

जलवायु परिवर्तन को लेकर विश्व बैंक की एक रिपोर्ट में पिछले दिनों भारत के लिए कुछ गंभीर चेतावनी थी। रिपोर्ट के मुताबिक अगर हालात न सुधरे तो 2050 तक भारत को अपने सकल घरेलू उत्पाद, जीडीपी का करीब तीन फीसदी गंवाना पड़ सकता है। इसका असर देश की करीब आधी आबादी के जीवन स्तर पर भी पड़ेगा। ऐसी स्थिति में मौजूदा केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को तत्काल न सिर्फ अपने पर्यावरण सुधार कार्यक्रमों, नीतियों,कानूनों और अभियानों को चाकचौबंद करना चाहिए,बल्कि उन पर नए सिरे से विचार भी करना चाहिए। 

वन क्षेत्र में यूं तो करीब 0.2 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है लेकिन ये वृद्धि दरअसल खुले जंगल की है जिसमें व्यवसायिक वृक्षारोपण शामिल है। सघन वन का दायरा सिकुड़ रहा है। एक चिंताजनक पहलू ये भी है कि निर्माण कार्यों के लिए और विकास के नाम पर जंगल काटने का सिलसिला बढ़ा है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की आपत्तियों और फटकार के बावजूद विकास के नाम पर पर्यावरण का दोहन जारी हैं। मध्यप्रदेश के सिंगरौली और उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में बिजली उत्पादन के नाम पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की आपत्तियों और फटकार को दरकिनार कर जो हो रहा है वह भयावह। 
न जाने कौन कौन से अवॉर्ड से सम्मानित परियोजनाएं जो सोंचती है की प्रदूषण के कारण लुले-लंगड़े हो कर असमय जान गंवाने वाले सिंगरौली वासियों को प्रदूषण की चिंता ही नहीं है।उनकी नज़र में चलता फिरते मनुष्य जैसे दिखने वाले सिंगरौली वासियों की फिक्र होगी भी कभी? 
सिंगरौली जैसे प्राकृतिक रूप से संपन्न शहर को प्रदूषण से आजादी दिलाना कोई असंभव काम नहीं है।जरूरत है,सिर्फ थोड़ी समझदारी और इच्छा शक्ति की। 

सड़कों पर गर्द उड़ाते और मासूमों को कुचलते वाहनों पर कार्यवाही में आनाकानी और बेशर्मी करने वालों से ठोस कार्यवाही की उम्मीद ही बेईमानी है। क्योंकि जनता जब तक जागरूक हो कर अपने मूलभूत अधिकारों के लिए सजग नहीं होगी तब तक कारोपोरेटरी सांप,अजगर, सांड खुले फिरते रहेंगे और आपके हक़ का हनन कर सम्मानित होते रहेंगें।

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