सोनभद्र- बखौफ़ मनबढ़ प्रबंधक के कार्यप्रणाली से खौफजदा हैं बेरोजगार

ओबी कंपनी के प्रबंधक से मिलनेवाले को लगता है, किसी "डान" से मिलकर आ रहा है?


के सी शर्मा 

शक्तिनगर ।सोनभद्र।।उर्जान्चल में वृहद उद्योगीकरण के चलते पिछले 6 दशक से सिंगरौली परिक्षेत्र के लाखों लोग हजारो गाँव विस्थापित हुए है।देश के विकास के नाम पर छले गए इन विस्थापितों की हालत बेहद चिन्ताजक स्थिति में पहुच चुकी है।फटेहाल -बदहाल ये वेरोजगार विस्थापित रोजगार की तलास में दर-दर भटक रहे है।इनकी दशा- दुर्दशा पर किसी को तरस नही आरहा है।जिसका परिणाम आगामी लोक सभा के चुनाव पर सत्ता पार्टी के लिए विपरीत असर डालने वाला न पड़ जाए कहना अतिशयोक्ति नही होगा।

आपको बता दे कि जहा संघ का एक प्रमुख कार्यकर्ता स्थानीय भाजपा व विस्थापित बेरोजगार लोगो तथा एक विस्थापित युवा नेता के साथ मिलकर कर बढ़ रहे स्थानीय बे रजगारो के आक्रोश को थामने का काम कर रहा है ,वहीं एक कम्पनी का प्रवन्धक इस अभियान पर पानी फेरने में लगा हुआ है। जिसका आने वाले चुनाव में दुर्गामी असर पड़ने से कोई इनकार नही कर सकता है।जो चुनाव के बाद साफ साफ देखने को मिलेगा।जो सत्ता पार्टी के सेहत के लिए वेहद चिंताजनक है।

इस शह-मात के खेल में अगर स्थानीय संघ प्रमुख पर यह प्रबंधक भारी पड़ा तो इसके गम्भीर परिणाम देखने को मिलेंगे।इसमें आश्चर्य यह है कि प्रबंधक के इस खेल में सत्ता पार्टी के कुछ पदाधिकारी अपना हित साध उसे संरक्ष्ण और बर्दहस्त दिये हुए है। यह प्रबंधक उन्ही नेताओ के साथ गल बहिया किए सत्ता के गलियारे में देखा जासकता है।

कारखास बने सत्ताधारी पार्टी के नेता के शह पर मनबढ़ ओबी कंपनी के प्रबंधक करते हैं मजदूरों के साथ दुर्व्यवहार 

यह जिले के नेताओ सहित प्रभारी मंत्री के कार्यक्रमो में भी उपस्थिति दर्ज कराता रहता है।इस कार्य मे उसके सहयोगी सत्ता पार्टी में उभरी नई संस्कृति कारखास वाले नेता बने हुए है।चंद सिक्को पर अपना जमीर वेचने वाले ये कारखास संस्कृति के नेता व सत्ता पार्टी के पदाधिकारी अपने हित और अपने राजनैतिक आका की नजर में उनका खास बने रहने के लिए कारख़ासी करने में तल्लीन है, चाहे पार्टी का जनता में कुछ भी सन्देश जाए। जिसे स्थानीय सत्ता पार्टी के कार्यकर्ता व क्षेत्रीय जन खुली आँखों से देख कर मौन रहने से क्षेत्र में तरह तरह के चर्चा का विषय बना हुआ है।

ओबी कंपनियों के प्रबंधक द्वारा स्थानीय बेरोजगारो से दुर्व्यहार करना  इस समय इलाके में खासे चर्चा का विषय बना हुवा है,वही इसे संरक्ष्ण देने वाले सत्ता पार्टी के कारखास लोग भी लाइजनर ( कारखास)के रूप में अपनी नई पहचान के साथ व बेरोजगारो की नजरों में उस ठग की तरह बन गए हैं जो अपने घर के कंगूरे के लिए गरीब के घर के सुनी चूल्हे का भी व्यपार करने से परहेज़ नहीं करता।

इन नेताओं को के मौजमस्ती को देखकर रोजगार की तलास में दर -दर भटकते इन विस्थापित बेरोजगारो को लगता है कि उनके "हड्डी पर कोई कबड्डी" खेला जा रहा है,उनकी यह टीस उनसे बात करने पर उभर आंसूओं के रूप में छलक जाती है।

बखौफ़ मनबढ़ ओबी कंपनी केप्रबंधक के कार्यप्रणाली से खौफजदा हैं बेरोजगार

एनसीएल  में कार्यरत इस आउट सोर्सिंग कम्पनी में महीनों से स्थानीय वेरोजगार विस्थापित रोजगार की तलास में कम्पनी के चौखट तक जाते है और फिर हतास और निराश होकर उल्टे पांव लौट जाते है,और यह सिलसिला कई महीनों से चला आ रहा है।

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बेरोजगार युवाओं ने बताया कि यह कम्पनी वाला किसी से मिलता ही नही है।यदि किसी से मिल भी गया तो साफ साफ कह देता है हमारे पास अब जगह नही है।इनमें जब कोई अपने को सत्ता पार्टी का कार्यकता बताता है तो वह कहता है सत्ता पार्टी और संघ के नेताओ से मैं मिल कर बात कर चुका हूँ।संघ और सत्ता पार्टी को साधने का दावा करने वाला यह कम्पनी प्रबंधक अपने को पूर्वाचल के दो बाहुबलियों का रिस्तेदार बता इन स्थानीय युवा बेरोजगारो को खौफजदा किये हुए है।

बाहुबलियों और ओबी कंपनियों के गठजोड़ का यह आलम है की,जब इसने पूर्वाचल के एक चर्चित सांसद के भतीजे के साथ दुर्व्यहार कर अपनी हनक दिखाने का जुर्रत किया।मामला स्थानीय पुलिस तक पहुच कर रफा दफा हुआ था। उर्जांचल में इस प्रकरण की चर्चा खूब हुई। कार्यवाही तो नहीँ हुआ अलबत्ता इस मनबढ़ ओबी कंपनी केप्रबंधक  का का दुस्साहस और बढ़ गया।

ओबी कंपनी के प्रबंधक से मिलनेवाले को लगता है, किसी "डान" से मिलकर आ रहा है?

सिंगरौली परिक्षेत्र में अब तक माफिया संस्कृति देखने को नही मिली थी,किंतु इस मनबढ़ ओबी कंपनी के प्रबंधक  की कार्यप्रणाली इसी संस्कृति को जन्म देती नजर आरही है।जिसे गम्भीरता से लेते हुए "एन सी एल" प्रवंधन ने समय से स्वयं का हस्तक्षेप करते हुए नही रोका तो इस क्षेत्र को भी झरिया धनबाद बनते देर नही लगेगा?

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इस कम्पनी के कार्यालय पर पहुचने के पहले इनके बैरियर पर आपको रुकना पड़ता है।यदि कम्पनी के सुरक्षाकर्मियों को फोन अंदर भेजने का आता है, तो आपकी पहले चेकिंग होती है, फिर आपको अपना वाहन वही खड़ा कर कम्पनी के वाहन से उक्त प्रवन्धक के कार्यालय तक सुरक्षाकर्मी आपको लेकर साथ जाएगा और मुलाकत के बाद उसी वाहन से फिर वही सुरक्षाकर्मी मुलाकाती को बैरियर के बाहर गेट पर छोड़ देता है।ऐसी व्यवस्था किसी निजी कम्पनी कैम्प कार्यालय पर पहली बार देखने को मिल रही है।इस तरह का सुरक्षा के नाम पर बुना गया ताना बाना विभिन्न तरह की आशंकाओं को जन्म नही देता क्या?क्या इसका यहसास नही कराता है कि मिलनेवाले को लगता है किसी "डान" से मिलकर आरहा है?

 पत्र लिख कर प्रधानमंत्री को बताया गया विस्थापितों की दुर्दशा 

गत दिनों भाजपा म्योरपुर ( शक्तिनगर) के मण्डल अध्यक्ष 'प्रशांत कुमार श्रीवस्तव' ने देश के माननीय प्रधान मन्त्री को एक पत्र प्रेषित कर यहा रिहन्द बाँध के निर्माण से लेकर आज तक हो रहे उद्योगिकरण से हुए लाखो विस्थापितों की दशा-दुर्दशा का विस्तार से उल्लेख करते हुए यह मांग किया है कि विस्थापितों में बढ़ती वेरोजगरी को ध्यान में रख "एन सी एल' में हो रहे आउट सोर्सिंग कम्पनियों के ठेके के निविदा परिपत्र में ही 60%विस्थापित बेरोजगारो को नौकरी देने का प्रावधान कर आरक्षित किया जाए।इस पत्र को स्थानीय समाचार पत्रों व सोसल मीडिया में भी प्रमुखता से प्रकाशित किया गया था।

विकास के नाम पर विस्थापितों को ठग लिया गया 

इन विस्थापितों को लगता है कि हमारे सर जमी पर देश के विकास के नाम पर हमें सुनहरे भविष्य का सपना दिखा हमे अपने घर जमीन से बेदखल कर विस्थापित बना दिया गया और अब उनके साथ उपेक्षा व अपमानजनक व्यहार किया जा रहा है।जिससे वे अपने को अब ठगा सा महसूस करने लगे है।उन्हें लगता है उनके साथ छल किया गया है।उन्हें दिखाया गया सुनहरा सपना तो सपना ही रह गया।उनकी दशा तो पहले से भी ज्यादा दुर्दशा में बदल गयी हैं।जो रह रह के उनके सीने में टीस बन काटे जैसी चुभन पैदा करती रहती है।

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