सत्ता की चाह ने दिखाई गठबंधन की राह

बिहार में ऐसे तर्क को ही गल्थेथरई कहते हैं।


ब्दुल रशीद 
कोलकाता में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की नेता ममता बैनर्जी के निमंत्रण पर जुटे विपक्षी दलों के नेताओं ने एक सुर में कहा कि वे "मोदी से देश को बचाने के लिए एकजुट" हुए हैं, इस रैली में कांग्रेस समेत 22 राजनीतिक पार्टियों के 25 वरिष्ठ नेता शामिल थे लेकिन वामपंथी पार्टियों ने खुद को इससे अलग रखा। 

आजादी के बाद भारतीय राजनीती में कई सफल असफल गठबंधन हुए हैं,लेकिन महागठबंधन शायद पहला गठबंधन जिसका न तो कोई नेता है न ही कोई संयोजक। मंच पर खड़े होकर सभी भाजपा विरोधी नेताओं का एक-दूसरे का हाथ पकड़कर एकता की मिसाल पेश करना हवाहवाई सा लगता है क्योंकि,उनके आपसी टकराव, मनमुटाव और राजनीतिक महत्वाकांक्षा किसी से छिपी नहीं हैं। हां,गठबंधन की राजनीति को अहमियत देते हुए कर्नाटक में कांग्रेस ने कम विधायकों वाले एचडी कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री बनाकर यह दिखाया तो जरुर कि भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए वह कुछ भी त्याग कर सकती है।लेकिन कुछ महीने बाद ही मायावती और सोनिया का कर्णाटक के मुख्यमंत्री शपथ समारोह में गलबहियां डालकर खिचाई गई फोटो 80 संसदीय सीटों वाले राज्य उत्तर प्रदेश में सीटों के बँटवारे के मामले में बेअसर हो गई, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच किसी तरह के गठबंधन की संभावना ही नहीं दिखती, 20 संसदीय सीटों वाले राज्य ओडिशा में कांग्रेस और बीजू जनता दल (बीजेडी) अलग-अलग चुनाव लड़ने का फैसला किया है और कोलकाता रैली में वामपंथी पार्टियों का मोदी विरोधी विपक्षी एकजुटता से अलग रहना,यही दर्शाता है की महागठबंधन दरअसल भाजपा के विरोध से ज्यादा विपक्षी पार्टियों के लिए अपने अस्तित्व को मजबूत कर किंग या किंगमेकर बनने की जद्दोजहद है।यानी असल विपक्षी एकता का खेल चुनाव के बाद ही हासिल किए सियासी ताक़त के दम पर खेला जाएगा। 

कोलकाता में हुए विपक्षी रैली के बाद आनन-फानन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रतिक्रिया आई कि ये तमाम लोग अपने कुनबों को आगे बढ़ाने के लिए इकट्ठा हुए, और अपने भ्रष्टाचार को छुपाने के लिए भी। भाजपा की ओर से इस गठबंधन को अस्थिर और कमजोर बताते हुए तर्क दिया गया की यह गठबंधन बहुत सारी पार्टियों का समूह है। लेकिन ऐसा कहते हुए शायद भाजपा प्रवक्ता यह भूल गए की प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी खुद एनडीए गठबंधन के मुखिया हैं, जिसमें कोलकाता रैली से ज्यादा पार्टियां शामिल हैं। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एनडीए का गठन कर पांच साल तक भाजपा के नेतृत्व में पहली गैर कांग्रेसी सरकार चलाया। वर्ष 1999 में हुये चुनाव के बाद वाजपेयी ने अपने नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन बनाकर सरकार बनाई थी, जो अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा करने में सफल रही।मौजूदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में मई 2014 में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की ही सरकार बनी जो पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा करने वाली दूसरी भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार होगी। ऐसे में विपक्ष के गठबंधन को कोसने से पहले भाजपा को अपना वर्तमान, और दस बरस पहले का इतिहास, दोनों पर गौर करना चाहिए था। 

महा गठबंधन हो या एनडीए दोनों गठबंधन में कुनबापरस्त पार्टियां अपने अपने कुनबे के भविष्य का हित साधने में लगें हुए हैं, जहां एनडीए में उद्धव ठाकरे,महबूबा मुफ्ती,बादल और पासवान जैसे नेताओं की फेहरिस्त है, वहीँ विपक्ष एकजुटता के नाम पर साथ दिखने वालों में न केवल अखिलेश यादव,तेजप्रताप यादव,जैसे नेता हैं बल्कि ऐसे पार्टियों के नेता भी हैं जो वाजपेयी के नेतृत्त्व वाले एनडीए में शामिल थे, वे तब भी कुनबापरस्त थे, और आज भी कुनबापरस्त हैं। यानी दोनों तरफ कुनबापरस्त पार्टियां हैं ऐसे में अपने गठबंधन के कुनबापरस्त को भूल कर विपक्ष कुनबापरस्ती पर हमला करना कितना तर्कसंगत है,यह बात तो ठीक वैसा है जैसे की मेरे दाग़ तो अच्छे हैं लेकिन उनके नहीं? बिहार में ऐसे तर्क को ही गल्थेथरई कहते हैं। 

" कबीरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर। ना काहू से दोस्ती,न काहू से बैर " कुल मिलाकर राजनीति में सभी कबीर के दोहे के दूसरी पंक्ति का अक्षरशः पालन करते हैं,क्योंकि राजनीती में चुनावी दंगल बस सत्ता के लिए होता है जिसपर सभी नेता की नज़र टिकी रहती है। काश पहली पंक्ति का पालन भी अक्षरशः कर लेते तो आजाद देश के अन्नदाताओं पर गोलियां न बरसाई जाती और दुनियां के सबसे तेजी से बढ़ने वाले देश के डिग्रीधारी बेरोजगारों को पकौड़ा तलने की भी सलाह नहीं दी जाती।
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