गणतंत्र दिवस - गण को तंत्र में शामिल किये बिना विकास का कोई मतलब नहीं !

लोग गणतंत्र के जश्न से ज्यादा भूख के ताण्डव से जूझने में मशगूल हैं।



एम.अफसर खान ‘सागर’
गणतंत्र दिवस विशेष : आजाद भारत में लोकतंत्र की स्थापना ने गणतंत्र की भावना को मजबूत बनाया। गणतंत्र की भावना ने मुल्क के अवाम को बावकार जीने का हक दिया है। हमारा मुल्क संघीय ढाँचे का लोकतंत्रात्मक गणराज्य है। इस लोकतंत्रात्मक गणराज्य की विशेषता चुनी हुई, संविधान के अंतर्गत शासन करने वाली उत्तरदायी सरकार से है। 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान को मंजूरी मिलने के बाद मुल्क के आम नागरिकों को खुली हवा में जीने का हक हासिल हुआ। इसलिए हर साल 26 जनवरी को देश में गणतंत्र दिवस पूरी अकीदत और शान से मनाया जाता है। 

संविधान लागू होने के साथ ही सैकड़ों साल से चली आ रही अनेक परम्परायें जो कि इंसानी हक-हकूक में बाधक थीं सब एक झटके में खत्म हो गयीं। मुल्क का आम शहरी समानता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पंख फैलाये आजाद फिजां में परवाज करने लगा। हर साल हम गणतंत्र दिवस जश्न इसलिए भी मनाते हैं कि हमें संविधान के आदर्श याद रहें। गणतंत्र दिवस हमारी शासन प्रणाली, हमारे संविधान का स्मरण करा देता है और नये संकल्पों की ओर उन्मुख होने को प्रवृत्त करता है। 
आजादी के तवील अरसा गुजर जाने के बाद भी हम आज तक गणतंत्र की मूल भावना को समझ पाने में शायद नाकाम रहे हैं! असल में संविधान ने हमें जुबान दिया है ताकि गलत के खिलाफ आवाज बुलन्द कर सकें मगर अफसोस हमने खामोशी अख्तियार कर लिया है जबकि हमारे लब खुलने चाहिए हर उस गलत चीज के खिलाफ जो हमारे संवैधानिक अधिकारों का हनन करता है, लोकतंत्र की मूल भावना पर प्रहार करती हो! यही खामोशी हमें कमजोर बना रही है, अवाम की खामोशी लोकतंत्र की भावना के मौत का परवाना ही माना जाना चाहिए! गणतंत्र का एक मतलब शासन या सरकार में जनता की हिस्सेदार से भी है। 
मुल्क में लोकतंत्र की स्थापना के बाद सत्ता में नागरिकों को भागीदारी तो मिली मगर आम आदमी को शासन में हिस्सेदारी मिली की नहीं यह कह पाना मुश्किल है। हमें तो स्वच्छ शासन चाहिए, मानव कल्याण चाहिए, समाज का विकास चाहिए एवं भेद-भाव रहित समाज चाहिए। अगर गणतंत्र में नागरिकों को कुछ अधिकार मिला है तो महज वोट देने का ना कि सत्त में पूर्ण हिस्सेदारी, या यूं कह लें कि गांधी जी के पूर्ण स्वराज की स्थापना का सपना आजादी के तवील अरसे बाद भी किसी मृगमरिचीका से कम नहीं। कितना अफसोस का मकाम है कि जिस संविधान ने हमें बोलने, विचरने या यूं कह लें कि निर्बाध जीवन की उर्जा दी है, कुछ नाअहल उस मुकद्दस किताब को जलाने की हिमाकत करते हैं! उन्हें यह सोचना चाहिए कि यह किताब महज कागज का सहीफा भर नहीं जो जल कर राख हो जायेगा बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र की रूह है, जो अजर, अमर है। 
यह भारत के आम शहरी के आजादी का परवाना है, जमानत है। उनके हक-हकूक का पैरोकार है। भले ही कुछ सियासतदां इसकी कसमें खा कर इसके तय उसूलों के खिलाफ जाकर जातीय, धार्मिक फित्नों फसाद पर भी चुप्पी साधे हुए हैं मगर गणतंत्र ने भारतीय लोकतंत्र को हर पांच साल में चुनावी त्यौहार का सौगात दिया है। इस त्यौहार में गण को जो हासिल होना चाहिए शायद उस पर आज भी तंत्र हावी है। 
संसद हो या विधानसभायें वहां पहुंचने वाले सदस्यों को गण की आवाज बुलन्द करनी चाहिए मगर आज हालात ये हैं कि तंत्र की शोर में गण मौन नजर आता है। आखिर गण क्या करे पांच साल तक उसे जो मौन रहना पड़ता है? संसद या विधानसभाओं में इस बात पे तो चर्चा होती है कि फलां की सरकार में भुखमरी, मंगाई व बेरोजगारी है मगर इस बात पर ईमानदार चर्चा कभी नहीं होती कि इन समस्याओं का निस्तारण कैसे किया जाए। इसका एक खास वजह है कि सदन में जाने के बाद ये लोग गण से माननीय हो जाते हैं तथा इन्हें आराम तलब व ऐश्वर्य भरे जीवन की लत सी लग जाती है! माननीय बनने के बाद इनका मकसद सिर्फ और सिर्फ एक हो जाता है कि किसी जुगत से अपना आगामी जिन्दगी को सुख-सुविधाओं के अम्बार से भर लिया जाए। यही भावना तंत्र को गण से अलग कर देता है तथा ऐसे में गण बदहाल जिन्दगी जीने को बाध्य होता है। 
स्वस्थ समाज के निर्माण हेतु राजनैतिक आजादी के साथ-साथ सामाजिक एवं आर्थिक आजादी का होना भी लाजमी है। आर्थिक आजादी का मूल मंत्र आर्थिक विकेन्द्रीकरण तथा आत्मनिर्भरता है। सरकारी आंकड़ेबाजी से हट कर देखें तो आज भी हमारे समाज में 70 प्रतिशत से ज्यादा लोग मूलभूत जरूरतों से वंचित है। अर्थव्यवस्था का विशाल भण्डार चन्द लोगों के हाथों में है, जिसकी वजह से अनेक गम्भीर समस्याओं मसलन गरीबी, बेकारी, बाल मजदूरी, वेश्यावृत्ति आदि बढ़ी है। इसलिए लोग गणतंत्र के जश्न से ज्यादा भूख के ताण्डव से जूझने में मशगूल हैं।
सियासत का हालिया चेहरा लोगों के जख्मों पर मरहम की जगह नमक लगाता दिख रहा है। आमजन के विकास के लिए बनने वाली सैकड़ों, अरबों करोडों की योजनाओं में भ्रष्टाचार का पलीता यही नुमाइंदे लगाते नजर आ रहे हैं! एक तरफ जहां लोग भूख की आग में जल रहे हैं तो दूसरी तरफ कमीशन की काली कमाई से इन राजनेताओं के आलीशान महल और कोठियां आबाद हैं! गरीबी, भुखमारी का नारा देकर ये जनता को साल दर साल ठगते आ रहे हैं मगर इनके अनियोजित विकास ने मुल्क का पुरसाहाल हांफता नजर आ रहा है। जिस मुल्क में नागरिकों की हिस्सेदार चुनाव में सिर्फ वोट डालने तक महदूद हो, वहां गणतंत्र के मायने व मतलब निकालना कितना अहम माना जाएगा? 

सफेदपोशों की राजसी ठाठ के बाद आज नौकरशाहों की हालत भी किसी रसूखदारों से कम नहीं। इनके दरबारों की चक्कर लगाकर देश का गण खुद को बौना समझने लगा है। ज्यादातर सरकारी दफ्तरों में उन्ही की सुनी जाती है जो आम नहीं खास माने जाते हैं! आम को तो यहां से तसल्लीकुन बातों से टरका दिया जाता है। सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाते-लगाते ये लोग घनचक्कर हो जाते हैं। इंसाफ के लिए सालों-साल दर-दर की ठोकरें खाकर गण की हयात कब गुजर जाती है उसे पता भी नहीं लग पाता। इस बात से कत्तई इंकार नहीं किया जा सकता कि संविधान के निर्माताओं ने मुल्क के आम नागरिकों को ऐसा लोकतांत्रिक संविधान दिया है, जिसमें सभी सम्प्रदाय, धर्म व समुदाय के लोगों को भेद-भाव रहित बराबरी का हक मिला है। 

मगर संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों से आम नागरिक आज भी महरूम नजर आता है जबकि सफेदपोश सियासतदां संविधान के लचीलेपन का लाभ लेकर बड़े से बड़े कारनामें अंजाम दे जाते हैं! शायद यही वजह है की लोकतंत्र में अपराधतंत्र का बोलबाला होता जा रहा है। ऐसे लोग ही जनतंत्र की पवित्र मन्दिर में जाकर गणतंत्र का मखौल उड़ाते नजर आते हैं। गणतंत्र की मूल भावना को सभी को समझना बेहद लाजमी है चाहे वो सियासतदां हों, नौकरशाह या आमजन। सार्वजनिक स्थलों, सरकारी कार्यालयों या स्कूलों में तिरंगा फहराकर व बच्चों में मिठाईयां बांटकर तथा जय हिन्द का नारा लगाने भर से गणतंत्र का हक अदा नहीं हो सकता। ऐसा करके हम गणतंत्र दिवस की औपचारिकता तो पूरी कर सकते हैं, मगर गण को तंत्र में शामिल किये बिना गणतंत्र का कोई मतलब नहीं निकलने वाला। गणतंत्र दिवस हमें संविधान की याद दिलाता और नये संकल्पों की ओर उन्मुख होने की प्रेरणा देता है। स्वच्छ शासन, भेद-भाव रहित समाज एवं मानव कल्याण के लिए हमें तत्पर रहना होगा। संविधान से मिली व्यवस्था की वजह से हम आज जो कुछ हासिल करते हैं उसका गौरवगान करने का हक तो बनता ही है। 

हम बेहतर शहरी बनकर, जागरूक नागरिक बनने का हक अदा करें ताकि हम अपने संविधान का एहतराम करने वाला बन सकें। हमें मुल्क की एकता और अखण्डता के लिए खुद का सर्वत्र कुर्बान करने के लिए हमेशा तैयार रहना होगा। संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता, स्वतंत्र जांच एजेंसियां, आजाद पुलिस व्यवस्था, सस्ता, तेज और स्वतंत्र न्याय व्यवस्था के साथ ही स्वच्छ, जवाबदेह, ईमानदार राजनीतिक व्यवस्था से ही संविधान का गौरव बढ़ेगा। इसके लिए हम सबको चौकन्ना, मुखर और जगरूक रहना होगा।

लेखक एम. अफसर खान ‘सागर’उर्जांचल टाइगर के समाचार संपादक हैं, mafsarpathan@gmail.com

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