बैंक पुनर्पूंजीकरण और खतरे में बैंकिंग सुधार।


राहुल लाल
सरकार ने चालू वित्त वर्ष में सार्वजनिक बैंकों में 650 अरब रुपये की पूँजी डालने का बजट प्रावधान रखा था।इसमें से 420 अरब रूपये का आवंटन अब भी होना है।इसका आशय है कि मार्च 2019 तक सार्वजनिक बैंकों के भीतर कुल 830 अरब रुपये डाले जाने हैं।इस तरह चालू वित्त वर्ष के दौरान इन बैंकों में डाली जाने वाली कुल पूँजी 1.06 लाख करोड़ रुपये पहुँच जाएगी।अब प्रश्न उठता है कि बैंकों को इतनी अधिक पूँजी की जरुरत क्यों है?दरअसल फंसे कर्जों के लिए वित्तीय प्रावधान करने से उनके पास पूँजी घट गई है और वे नए कर्ज भी नहीं दे सकते।इसके अलावा आरबीआई ने 11 सार्वजनिक बैंकों पर सख्त पाबंदियाँ लगाई हुई हैं।अपने तरीके नहीं सुधारने तक उन पर सामान्य बैंकिंग कामकाज की भी पाबंदियाँ लगी हुई हैं।

केंद्र सरकार के अनुसार बैंकों में पूँजी डालने का मकसद बेहतर प्रदर्शन करने वाले बैंकों को त्वरित उपचारात्मक कार्यवाई(पीसीए) से बाहर निकालने में मदद करना है।इसके बाद वे दोबारा कर्ज दे सकेंगे।गौरतलब है कि 11 सार्वजनिक बैंकों के पीसीए मामला भी आरबीआई और सरकार के बीच मतभेद का बड़ा कारण बना था।अब सरकार का कहना है कि बैंकों में अतिरिक्त पूँजी डालने से कुछ ऐसे बैंक हैं,जो पीसीए सीमा के करीब हैं,वे सुरक्षित हो जाएँगें तथा 4-5 बैंक पीसीए से बाहर निकल सकते हैं।स्पष्ट है कि नई पूँजी डालने से कई कमजोर सरकारी बैंकों को आरबीआई की सख्ती से मुक्ति मिल जाएगी।वित्त मंत्रालय के अनुसार इससे पीएनबी जैसे बैंको को लाभ होगा,जो पीसीए नहीं है और लेकिन पीसीए के करीब है।बैंकों के पुनः पूँजीकरण के अंतगर्त जल्द ही यह निर्णय सरकार करेगी कि किस बैंक में कितनी पूँजी डाली जाएगी।लेकिन सरकार ने स्पष्ट कर दिया गया है कि बैंक ऑफ बड़ौदा,देना बैंक तथा विजया बैंक में पूँजी डाली जाएगी,जिससे नियामकीय और विकास पूँजी मुहैया करा बैंकों के एकीकरण को सुदृढ़ता प्रदान की जाएगी।

बैंकिंग क्षेत्र की ऋण वृद्धि दर 15 फीसदी को पार कर चुकी है,जो हम जीडीपी रफ्तार से डबल है। लेकिन सरकार को लगता है कि यह काफी नहीं है और बैंकों को और कर्ज देना चाहिए।सरकार को लगता है कि बैंक लोन नहीं देंगे,तो अर्थव्यवस्था की रफ्तार रूक जाएगी।लेकिन अगर वास्तव में बैंकिंग प्रणाली को मजबूत करना है,तो केवल अतिरिक्त पूँजी डालकर आरबीआई के पीसीए से बाहर लाकर बैंकों को मजबूत नहीं किया जा सकता,अपितु हमारे सार्वजनिक बैंकों के मूल समस्याओं पर ध्यान केंद्रित करनी होगी।

अतीत में भी यह फॉर्मूला बैंकों के लिए खतरनाक साबित हुआ

अतीत में भी बैंकों में इसी तरह से पूँजी डाला गया,लेकिन उससे समस्या सुलझने के बदले और उलझी ही। वर्ष 1985-86 और 2016-17 के बीच सरकार ने इन बैंकों में करीब 1.5 लाख करोड़ डॉलर डाले थे।इसमें से बड़ी पूँजी वर्ष 2008 में लीमन ब्रदर्स के पतन के बाद उभरे वैश्विक आर्थिक संकट के बाद आई।इस संकट के दुष्परिणामों को दूर करने के लिए आरबीआई ने बैंकिंग प्रणाली में पूँजी उड़ेल दी और नीतिगत ब्याज दरों को भी ऐतिहासिक निम्न स्तर पर ले आया।अपने पास काफी पूँजी होने के कारण इन बैंकों ने खुलकर कर्ज बांटे।इसका नतीजा यह निकला कि बैंकों के पास फंसे कर्ज का अंबार खड़ा होने लगा।

वर्तमान में सार्वजनिक बैंकों की स्थिति

यह समय सार्वजनिक क्षेत्र के बैकों के प्रदर्शन पर नजर डालने के लिए सबसे उपयुक्त है।वित्त वर्ष 2015-16 की दूसरी छमाही में आरबीआई ने पहली बार बैंकों के लिए परिसंपत्ति गुणवत्ता का आकलन किया था।दिसंबर 2015 से लेकर मार्च 2015 तक की पाँच तिमाहियों ने बैंकों ने अपने फंसे कर्जों की शिनाख्त की,लेकिन. उन पर कोई कदम नहीं उठाया गया।इन बैंकों की एनपीए जून के 8.74 लाख करोड़ रूपये से मामूली गिरावट के साथ सितंबर में 8.69 लाख करोड़ रुपये पर आ गई, लेकिन वह सितंबर 2017 के 7.34 लाख करोड़ रुपये की तुलना में काफी अधिक है।यही कारण है कि सितंबर 2018 में शुद्ध एनपीए 4.83 करोड़ रुपये रहा,जो एक वर्ष पूर्व 3.97 लाख करोड़ रूपये थे।

बैकों का अभूतपूर्व घाटा

इसके अतिरिक्त देश के 21 में से 12 सार्वजनिक बैंक सितंबर तिमाही में घाटे में रहे।इंडियन ओवरसीज बैंक,सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया और यूको बैंक ने इन सभी 12 तिमाहियों में कुल मिलाकर 37,500 करोड़ रुपया का घाटा उठाया।देना बैंक और बैंक ऑफ महाराष्ट्र को भी 11 तिमाही में कुल 94,00 करोड़ का घाटा झेलना पड़ा।कुल मिलाकर इस दौरान सार्वजनिक बैंकों को 1 लाख 84 हजार करोड़ रूपये का घाटा हुआ,जो देश के जीडीपी का करीब 1.2 फीसदी है।यह घाटा काफी बड़ा है।यह घाटा 1986 से 2017 तक बैंकों में डाली गई कुल पूँजी को भी पार कर जाता है।अनुमान है कि दिसंबर तिमाही तक यह घाटा 2.1 लाख करोड़ रुपये की नई पूँजी को भी पीछे छोड़ देगा।

बढ़ता बैंकिंग फ्रॉड और निम्नस्तरीय बैंकिंग कार्यप्रणाली

बैंकों की कार्य संस्कृति कितनी निम्नस्तरीय है,वह पिछले कुछ वर्षों से बैंकिंग फ्रॉड से भी स्पष्ट है।रिजर्व बैंक के रिपोर्ट के मुताबिक पिछले 4 वर्षों में फ्रॉड की वजह से बैंकों को हुए नुकसान की राशि बढ़कर चार गुनी हो गई।साल 2013-14 में 10,170 करोड़ रूपये के फ्रॉड के मामले आए थे,जबकि 2017-18 में 41,167.7 करोड़ रुपये के मामले पता चले।गौर करने वाली बात यह है कि 1 लाख रूपये से ज्यादा के 93 फीसदी फ्रॉड सरकारी बैंकों में हुए।फ्रॉड के बढ़ते मामलों से भी बैड लोन के आँकड़ों में वृद्धि हो गई।

सार्वजनिक बैंकों की घटती जमा राशि

चार सार्वजनिक बैंकों का अग्रिम पोर्टफोलियो जून तिमाही की तुलना में सितंबर तिमाही में कम हो गया।इनमें से 11 बैंकों का कर्ज आवंटन कम हुआ है।दो बैंकोन में तो 10 फीसदी से भी अधिक गिरावट हुई है।इसी तरह सार्वजनिक बैंकों में जमा राशि भी कम हुघ है।सात बैंकों का जमा पोर्टफोलियो कम हो गया है।

सकल एनपीए में वृद्धि

6 बैंकों का सकल एनपीए जून की तुलना में सितंबर तिमाही में बढ़ा है।सितंबर तिमाही में आईडीबीआई बैंक का सकल एनपीए 30 फीसदी अधिक रहा।इसके अतिरिक्त यूको,इंडियन ओवरसीज बैंक,देना बैंक,यूनाइटेड एवं सेट्रल बैंक का सकल एनपीए 20 फीसदी से अधिक रहा,जबकि 6 बैंकों का एनपीए 15% से ज्यादा रहा।

शुद्ध एनपीए के मामले में ,9 सार्वजनिक बैंकों का स्तर 10 फीसदी से ऊपर 17.3% फीसदी तक पहुँच गया है।इनमें से कुछ बैंकों का परिसंपत्ति गुणवत्ता सितंबर में और भी खराब हो गई।स्पष्ट है कि बैंकों ने आँखे़ मूँदकर कर्ज बाँटे।फंसे कर्ज की स्थिति को देखकर ऐसा लगता है कि इन बैंकों को कर्ज देने के सही तरीके ही मालूम नहीं हैं।अगर बैंकिंग कार्यसंस्कृति यूँ ही रही रही,तो सरकार चाहे बैंकों का कितना भी पूँजीकरण कर लें,बैंक पुनः इसी स्थिति में आ जाएगी तथा टैक्स पेयर की गाड़ी कमाई इसी तरह कर्ज में फंसती रहेगी।फंसे कर्ज में हुई बढ़ोतरी के लिए अर्थव्यवस्था की हालत को दोष देना सही नहीं होगा,क्योंकि उसी परिवेश में निजी क्षेत्रों के बैंकिंग परिसंपत्ति गुणवत्ता बेहतर है।सरकार का कहना है कि बैंक पूँजीकरण से भारतीय बैंक उच्चतर अंतरराष्ट्रीय नियमन मापदंडों का अनुपालन कर सकेंगे।लेकिन सरकार को समझना होगा कि प्रोजेक्ट आकलन,जोखिम प्रबंधन,पर्यवेक्षण और शासन की गुणवत्ता जैसे कठोर बिंदुओं पर ध्यान देने के बजाय सार्वजनिक बैंकों में समय-समय पर पूँजी डालने की परिपाटी अंततः देश के अर्थव्यवस्था को नुकसान ही पहुँचाएगा।सार्वजनिक बैंकों के पुनर्पूंजीकरण के निरथर्क प्रवाह से बैंकिंग सुधार के अल्पकालिक लक्ष्य प्राप्त किए जा सकते हैं,लेकिन दीर्घकालिक नहीं।इससे उल्टे बैंकों की कार्य शैली में सुधार पर भी ब्रेक ही लगता है।

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