सपा-बसपा का गठबंधन जरूरी कम मजबूरी ज्यादा !

गठबंधन की मिठास आगामी विधानसभा चुनाव तक थोडा कड़वा हो सकता है!


ब्दुल रशीद
देश की सियासत में उत्तर प्रदेश इसलिए अहम है क्योंकि केंद्र सरकार बनाने के लिए सबसे ज्यादा 80 लोकसभा सीट उत्तर प्रदेश में है। 2019 का चुनाव नजदीक है ऐसे में 25 वर्ष बाद सपा और बसपा के गठबंधन का एलान यकीनन बहुत महत्वपूर्ण है।

मुलायम और कांशीराम की ही तरह मायावती और अखिलेश यादव भी मिले। 25 वर्ष पहले सपा-बसपा की दोस्ती की नींव 1993 में मुलायम सिंह यादव और कांशीराम ने रखी थी। जब दोनों साथ आए थे तब भी मुद्दा भाजपा के बढ़ते कदम को रोकना था और आज भी कमोबेश वही है।

भले ही सपा-बसपा का गठबंधन को लेकर संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया गया की यह गठबंधन स्थाई है जो लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव में आगे भी बरकरार रहेगा।ऐसी घोषणाओं के बावजूद सपा-बसपा के इस गठबंधन के लिये  समाजिक -आर्थिक रूप से दलित पिछड़ों को एक साथ लाना सबसे बड़ी चुनौती होगी।

राफेल घोटाले में भाजपा को सत्ता गंवानी पड़ेगी

मायावती ने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा की,‘गुरू चेला अर्थात मोदी और शाह की नींद उडाने वाली यह प्रेस कांफ्रेंस है। आज उत्तर प्रदेश सहित देश की सवा सौ करोड जनता परेशान है। साथ चुनाव लड़ने का फैसला क्रांति संदेश देने वाला फैसला है।भाजपा ने बेईमानी से सरकार बनाई है। जन विरोधी पार्टी को रोकने के लिय हम एक हुये है। नोटबंदी और जीएसटी का फैसला बिना सोचे समझे किया गया। देश में अघोषित इमरजेंसी लगी है। राफेल घोटाले में भाजपा को सत्ता गंवानी पड़ेगी।’

भाजपा ने अघोषित तो कांग्रेस ने घोषित इमरजेंसी लगाई।

भले ही कांग्रेस के रायबरेली और अमेठी सीट पर सपा-बसपा गठबंधन ने अपने प्रत्याशी ना उतारने का संकेत दिया हो लेकिन कांग्रेस पर हमले से भी मायावती ने कोई परहेज़ नहीं किया। मायावती ने कहा कि, ‘कांग्रेस से गठबंधन से कोई खास फायदा नहीं होने वाला था। कांग्रेस का वोट ट्रांसफर नहीं होता, जबकी हमारा वोट ट्रांसफर हो जाता है। ऐसे में कांग्रेस जैसी पार्टी को लाभ हो जाता है पर हमारी पार्टी को कोई लाभ नहीं होता। 1996 में हमने और 2017 में सपा ने कांग्रेस से दोस्ती की पर कांग्रेस का लाभ सपा-बसपा को नहीं मिला।देश में  कांग्रेस ने घोषित तो भाजपा ने अघोषित इमरजेंसी लगाई। कांग्रेस ने भी बोफोर्स का घोटाला किया था।’

भाजपा धर्म की आड में देश का विनाश कर रही है। 

अखिलेश यादव ने संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस कहा कि सपा-बसपा मिलकर भाजपा को भगाने का काम करेंगे। भाजपा की कार्यशैली से भगवान भी दुखी है। भाजपा ने भगवान को भी जाति में बांट दिया।भाजपा धर्म की आड में देश का विनाश कर रही है। अखिलेश यादव की बातचीत से यह साफ़ नज़र आया कि आगामी चुनाव में सपा-बसपा भाजपा के हिंदुत्व की तर्ज पर धर्म कार्ड खेलने से परहेज़ नहीं करेगी।

मायावती का अपमान मेरा अपमान है।  

गठबंधन के एलान के लिए आयोजित संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में जब मायावती ने 2जून 1995 को लखनऊ के गेस्ट हाउस कांड का जिक्र करते हुए कहा की,देशहित में अपमान को भूल कर बसपा-समाजवादी पार्टी का यह गठबंधन हुआ है। तो अखिलेश यादव ने अपने समर्थकों को कड़ा संदेश देते कहा कि मायावती का अपमान मेरा अपमान है।  

गठबंधन की मिठास आगामी विधानसभा चुनाव तक थोडा कड़वा हो सकता है! 

अखिलेश यादव का मायावती को फूलों का गुलदस्ता देकर स्वागत करना और तालमेल बनाकर संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में हर बात पर खुलकर कहने से सपा-बसपा के बीच 23 साल की दुश्मनी दोस्ती में बदलती नजर आई। लेकिन क्या 25 वर्ष पहले सपा से समर्थन वापसी के बाद मायावती को मिले जख्म की टीस और भाजपा नेता द्वारा लगाए मरहम पर अपने राजनितिक हैसियत पाने के बाद विचार नहीं करेगी? मायावती और अखिलेश ने लोकसभा सीटों के बंटवारे का गणित समझाते हुए कहा कि बराबर की हैसियत रखते हुये दोनों ही दल 38-38 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे।तो क्या भविष्य में भी यही स्थिति बरक़रार रहेगी? इस गठबंधन का असल खेल तो आगामी उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में दिखेगा। आज यह गठबंधन जिस परस्पर मिठास के चाशनी में दिख रहा है तब ऐसा न हो कर थोडा कड़वा हो सकता क्योंकि बेहतर खिलाड़ी तय करेगा खेल के कायदे कानून। 

सपा-बसपा का गठबंधन जरूरी कम मजबूरी ज्यादा! 

सपा-बसपा का यह गठबंधन कब तक कायम रहता है,यह देखने वाली बात है।क्योंकि पिछले लोकसभा चुनाव में शून्य और एक अंक में सिमटी बसपा-सपा विधानसभा में भी भाजपा के सामने टिक नहीं पाए। कुल मिलाकर दोनों के लिए लोकसभा चुनाव में अपना अपना राजनीतिक कद कायम रखने के लिए यह गठबंधन करना जरूरी कम मजबूरी ज्यादा लगता है। सपा-बसपा गठबंधन न तो भाजपा के वोटबैंक में सेंध लगा सकती और न ही कोंग्रेस का अन्य पार्टी को जोड़कर चुनाव लड़ने से रातो रात कोई चमत्कार हो जाएगा,जिससे भाजपा को ज्यादा नुकसान हो। 

उपचुनाव के तर्ज पर यह प्रयोग यदि कामयाब होता है तब भी केंद्र में मजबूत सरकार बनने की संभावना दिखाई नहीं पड़ती कारण तब महागठबंधन के बजाय थर्ड फ्रंट ज्यादा प्रभावी होना चाहेगा साथ में क्षेत्रीय पार्टियों की महत्वाकांक्षा भी हावी रहेगी। ऐसे में भाजपा का परंपरागत वोट और विपक्ष के महागठबंधन में आपसी बिखराव ही विपक्ष के दाव और दावा दोनों धराशायी करने में अहम भूमिका निभा सकता है।
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