13 फरवरी "किस डे" पर पढ़िए "किस्सा" दिल्ली के राजधानी बनने का

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ब्दुल रशीद 
13 फरवरी वेलनटाईन डे यानी किस डे का दिन भारतीय इतिहास में बहुत खास है। क्योंकि आज ही के दिन से 89 साल पहले इसी दिन दिल्ली का सफर देश की राजधानी के रूप में शुरू हुआ था।

महाभारत काल का इंद्रप्रस्थ आज दिल्ली के नाम से जाना जाता है। तब से लेकर आज तक चेहरे बदलते रहें चाहे वह रहवासियों के हों या फिर शासक के,लेकिन खामोशी से ये शहर अपनी आगोश में इतहास को संजोता रहा, जी हां,हम बात कर रहें हैं उस दिल्ली की,जहां राष्ट्रपिता बापू का राजघाट है, जहां भारतीय विरासत की पहचान लाल किला है,जहां भारतीय सेना की वीरता की निशान इण्डिया गेट है। यह वह शहर है जहां रोज न जाने कितने ही लोग इसे देखने,समझने,घुमने-फिरने आते हैं। दिलवालों की दिल्ली का इतिहास ही नही बल्कि दिल्ली के राजधानी बनाने की कहानी भी बेहद दिलचस्प और खास है।

व्हाट्स ऐप युनिवर्सटी का इतिहास को छोड़ कर यदि वास्तविक इतिहास को पढ़ें तो पता चलता है की नई दिल्ली से पहले भारत की राजधानी कोलकाता थी। वहीं से पूरा कामकाज होता था। लेकिन कोलकाता से अंग्रेजों को एक समस्या थी। कोलकाता में गर्मियों में जमकर गर्मी पड़ती थी। जिसके कारण अंग्रेज गर्मियों में सारा कामकाज शिमला से देखते थे। इस बार-बार की परेशानी से बचने के लिए उन्हें ऐसी जगह चाहिए थी जो शिमला से ज्यादा दूर न हो। दिल्ली इस लिहाज़ से बिल्कुल सही जगह थी। इसलिए जब 1911 में इंग्लैण्ड के राजा जाॅर्ज पंचम दिल्ली आये। तो उनके सामने भी यही प्रस्ताव रखा गया। तब 11 दिसंबर 1911 को राजा जाॅर्ज पंचम ने घोषणा करते हुए कहा-

‘‘मुझे भारतवासियों को यह बताते हुए खुशी हो रही है कि अब भारत की राजधानी दिल्ली होगी।’’

दिल्ली को राजधानी बनाने की घोषणा 1911 में ही हो गई थी। लेकिन उसे वास्तविक रूप में लाने के लिए 1931 में आज की ही तारीख को चुना गया। ब्रिटिश भारत में आज के ही दिन 1931 में गर्वनर जनरल लाॅर्ड इरविन ने नई दिल्ली का उद्घाटन किया था।


इतिहासकारों की मानें तो कोलकाता की जगह दिल्ली को राजधानी बनाने के पीछे दो बेहद खास वजह थी। पहली तो ये कि ब्रिटिश सरकार से पहले कई बड़े साम्राज्यों ने अपना शासन दिल्ली से ही चलाया था, जिसमें आखिरी थे मुगल और दूसरी दिल्ली की उत्तर भारत में भौगोलिक स्थिति,जो कोलकाता के उमस भरी गर्मी बेहतर थी।हालांकि कुछ जानकार ऐसा भी मानते है कि बंगाल बंटवारे के बाद कोलकाता में हिंसा और उत्पात में हुए इजाफे और बंगाल से तूल पकड़ती स्वराज की मांग को ध्यान में रखकर लिया गया ये फैसला था।

"कुल मिलाकर दिल्ली ऐसी जगह पर था। जहां से पूरे देश को बेहतर तरीक़े व आसानी से संभाला जा सकता था।"

दिल्ली को डिजाइन करने का जिम्मा ब्रिटिश आर्किटेक्ट सर एडविन लुटियंस और सर हर्बट बेकर को सौंपा गया। लॉर्ड हार्डिंग का तो सपना था के चार साल के अंदर वे दिल्ली को राजधानी के रूप में पूरा कर लेंगे । लेकिन उनके इस सपने के बीच पहला वर्ल्ड वार आ गया। बंगाल बंटवारे का फैसला लेने वाले लॉर्ड कर्जन इस फैसले से खुश नहीं थे। 

बाद में आर्किटेक्ट लुटियन और बेकर ने दिल्ली शहर को डिजाइन करने के लिए शाहजहानाबाद के नाम से जाने जाने वाले इस शहर के दक्षिणी मैदानों को चुना।

आजादी के बाद 1956 में दिल्ली को यूनियन टेरिटरी यानी केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया और फिर साल 1991 में 69वें संशोधन से इसे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का दर्जा दिया गया।

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