कश्मीर के पुलवामा में चूक के कारण फिदायीन हमला।


नीता वर्मा
अंतर्राष्ट्रीय मामलोंं की जानकार
पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद का चेहरा एक बार पुनः बेनकाब हुआ है।दरअसल गुरुवार को लगभग 3.30 बजे नेशनल हाईवे से सीआरपीएफ के 78 गाडियों के काफिले जम्मू से श्रीनगर जाने के क्रम में पुलवामा में एक फिदायीन हमले के दौरान 37 जवान शहीद और अन्य जवान घायल हुए है।इस हमले की जिम्मेदारी जैश ए मुहम्मद आतंकी संगठन ने लिया है।इस आतंकी हमलें की अमेरिका, फ्रांस, रूस,ब्रिटेन आदि देशों ने निंदा की है। यह हमला इतना घातक था कि बस के परखच्चे उड़ गए है। 

यह आतंकी हमला दक्षिणी कश्मीर के पुलवामा में विस्फोटक से भरी एक कार द्वारा बस में टक्कर करके किया गया है।यहां देखा जाए तो आतंकवादियों ने आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने हेतु पहली बार भारत के सरज़मी पर इस प्रकार का फिदायीन हमला किया है।इस प्रकार की शैली को इराक,इरान और अफगानिस्तान में आतंकी गतिविधियों को अंजाम देते हेतु देखा गया है।अभी हाल में ईरान में रिवल्यूशनरी गार्डो के बस पर आत्ममघाती हमला किया गया। जिसमे 27 रिवल्यूशनरी गार्डो की जाने गई है। जिसकी जिम्मेदारी भी पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठन ने लिया है।

ज्ञात हो कि पाकिस्तानी सेना द्वारा समर्थित आतंकी आए दिन भारत पाकिस्तान सीमा पर तनाव पूर्ण माहौल बनाए रहते है और गोलीबारी करते है जिसमें भारतीय नागरिकों की मृत्यु और सैनिकों की शहादत होती है।लेकिन जिस प्रकार का फिदायीन हमला पुलवामा में हुआ है।उसमें पहली बार एक कश्मीरी युवक का ही मानव बम के रुप में इस्तेमाल किया गया है। जिसके कारण एक व्यापक क्षति हुई है। 18 सितंबर 2016 के उड़ी हमलें के पश्चात एक बड़ा हमला हुआ है। जिसमें 18 जवान शहीद हुए थे।मालूम हो कि आईबी के आतंकी हमलें के एलर्ट के पश्चात भी इस हमले को नहीं रोका जा सका है। जो दुर्भाग्य पूर्ण है।इससे कई गंभीर प्रश्न खड़े होते है।पहला जब आईबी ने एलर्ट किया था कि सीआरपीएफ पर कोई बड़ा हमला हो सकता है तो धरातल पर सुरक्षा बलों ने इसे क्रियान्वयन क्यों नहीं किया? दूसरा क्या आईबी एलर्ट को गंभीरतापूर्वक नहीं लिया गया ?तीसरा उस इलाके का मुआयना किया गया या नहीं।

दरअसल काफिला के आवागमन के पूर्व रोड ओपेनिंग पार्टी रुट को चेक करने के पश्चात रिपोर्ट देता है।रिपोर्ट के आधार पर ही काफिले का आवागमन होता है।यहाँ देखा जाए तो 78 गाडियों में 2547 लोग सवार थे तो ऐसे में रोड ओपेनिंग पार्टी निश्चित ही रुट को चेक किया होगा।बावजूद ऐसी दुर्घटना सुरक्षा में चूक को इंगित करती है।चौथा इतने बड़े काफिले के गुजरने पर चप्पे चप्पे पर सैनिक बलों की तैनाती होनी चाहिए थी लेकिन ऐसा होता हुआ प्रतीत नहीं हुआ है।पांचवा आतंकी ने कार में 200 किलोग्राम विस्फोटक रखा था तो क्या कही भी उस कार की जांच नहीं की गई?यहाँ देखा जाए तो निश्चित ही आईबी एलर्ट के पश्चात सुरक्षा जांच होनी चाहिए थी और यह चूक का ही मामला है।
प्रश्न उठता है कि राष्ट्रीय स्तर पर वे कौन सी परिस्थितियां है जिसके कारण आतंकी कश्मीर में अपनी उपस्थिति को दर्ज कराने में लगे हुए है?
पहला कश्मीर के अलगाववादी संगठनों जिसे पाकिस्तान की सह प्राप्त है के द्वारा कश्मीर के माध्यम से भारत को लगातार अस्थिर करने का प्रयास कर रहे है।दुखद है कि वे लोग कुछ कश्मीरी नौजवानों को आतंक के रास्ते पर चलने हेतु ब्रेनवाश करने में सफल हुए है।यहाँ देखा जाए तो कश्मीरी नौजवानों के भटकाव का सिलसिला तो जारी है।इसके उदाहरण के रुप में देख सकते है कि पिछले वर्ष कश्मीर मेंं काफी नौजवान अपनी जान की परवाह किए बगैर पत्थरबाजों के साथ खड़े दिखाई दिए।14 फरवरी 2019 को फिदायीन हमले में 37 सैनिकों की शहादत हुई है जिसका जिम्मेदार आदिल अहमद डार है जो एक कश्मीरी आतंकी है अर्थात स्थानीय आतंकी। यहाँ सरकारों को सोचना चाहिए कि आखिर कौन सी नीतियों के कारण कश्मीर में इस प्रकार का वातावरण तैयार हो रहा है जिससे सरकारों का प्रभाव कम हो रहा है और चरमपंथियों गुटों का प्रभाव बढ़ रहा है।कश्मीर के अंदर कुछ लोगों की राजनीतिक स्वार्थी नीतियों के कारण समस्याओं के समाधान के बजाय हालात खराब ही हुए है।जो भारत की सुरक्षा के समक्ष गंभीर चुनौती है।

दूसरा विश्व में आतंकवाद कही भी स्थानीय समर्थन के बगैर नहीं चल सकता है।चाहे किसी भी कारण से समर्थन दिया गया हो।उसमें भय , अज्ञानता या फिर स्वार्थ कोई कारण हो सकता है ।पिछले वर्ष आतंकियों ने सेना में तैनात औरंगजेब नामक सैनिक का अपहरण कर उनकी हत्या की ।इस प्रकार कश्मीर के समाज में भय को बढ़ाने का प्रयास किया।इसी प्रकार कुछ ऐसे लोगों की भी हत्याएं की जो सरकारी तंत्र का हिस्सा थे।मुखबिरी के शक में हुजैफ अशरफ की हत्या,तो पुलवामा के निकलोरा इलाके में आतंकियों ने एक छात्र की हत्याएं की। ऐसी घटनाओं से निश्चित ही रूह कांप जाती है।तीन दिन पहले समाज में आतंक का डर व्याप्त करने हेतु एक महिला को आतंकियों ने गोली मार दी।कहने का अर्थ है कि कश्मीर में आतंकी स्थानीय निवासियों के मन में खौफ़ पैदा करके भी कश्मीर के युवाओं को आतंक के मार्ग पर ढकेल रहे है।ताकि अपनी आतंकी गतिविधियों को सफलतापूर्वक संचालित कर सके। 

आवश्यकता है कि सरकार कश्मीर की नीतियों को लेकर स्पष्ट खाका खींचे और राजनीतिक स्वार्थ से ऊपर उठकर देश के एकता, अखंडता , शांति, विकास को बरकरार रखने संबंधित कदम उठाए ताकि लोगों में सरकारों और सरकार की नीतियों के प्रति विश्वास की भावना जागृत किया जा सके, लोगों में आतंकियों के भय को समाप्त किया जा सके तथा कश्मीरी नौजवानों को भटकाव के रास्ते पर जाने से रोका जा सके। तीसरा जिस प्रकार दक्षिणी कश्मीर में आतंकवादियों द्वारा आतंकी कार्यवाईयों को अंजाम दिया गया जैसे अमरनाथ बस पर हमला, सेना के जवानों पर हमला आदि ।सेना ने कश्मीर को आतंकवाद से मुक्त करने हेतु आपरेशन ऑल आउट चला रखा है जिसके कारण एक साल से प्रतिदिन लगभग चार से पांच आतंकी मारे जा रहे है।अब तक आपरेशन ऑल आउट के कारण पांच सौ से ऊपर आतंकी मारे जा चुके है।इस प्रकार सेना आतंकियों की कमर तोड़ने में लगी हुई है। जिसके कारण आंतकियों ने बौखलाहट में पुलवामा के अवंतिपुरा में गुरुवार को इस घटना को अंजाम दिया है।दरअसल अवंतिपुरा में हुए फिदायीन( मानव बम) हमले में 37 जवान शहीद हुए है।इस घटना के जिम्मेदारी जैश ए मोहम्मद आतंकी संगठन ने लिया है।इसका मुखिया मसूद मौलाना अजहर है ।यह वही व्यक्ति है जिसे भारतीय विमान आईसी 814 के अपहरण के पश्चात 176 यात्रियों की जान बचाने हेतु रिहा किया गया।13 दिसंबर 2001 को भारतीय संसद पर हमले का जिम्मेदार, 2 जून 2016 को पठानकोट पर हमलें का जिम्मेदार, 16 सितंबर 2016 को उड़ी हमले का भी जिम्मेदार है और 14 फरवरी 2019 को पुलवामा आतंकी हमले का जिम्मेदार तो है ही।दरअसल इस हमले के माध्यम से जैश ए मोहम्मद संगठन ने कश्मीर में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखा जाए तो भारत ने पाकिस्तान को लगातार कई मंचों से आतंकवाद के मामले पर घेरा है।जो पाकिस्तान के लिए सिरदर्द बन चुका है। चाहे वो संयुक्त राष्ट्र का मंच हो या आसियान या संघाई सहयोग संगठन हो या ब्रिक्स संगठन या अफ्रीकी संघ।ऐसे में संपूर्ण विश्व भली भांति परिचित है कि पाकिस्तान आतंकियों की शरणस्थली है।
अमेरिका ने तो पाकिस्तान की आर्थिक सहायता इसलिए रोक रखी है क्योंकि वह हक्कानी नेटवर्क के आतंकियों के खिलाफ आतंकी कार्रवाई करने में नाकामयाब रहा।यूरोपीय यूनियन भी पाकिस्तान को चेतावनी दे चुका है।लेकिन वर्तमान में आवश्यकता यह है कि विश्व स्तर पर आतंकवाद की स्पष्ट परिभाषा संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा दी जाए क्योंकि सभी राष्ट्र अपने हिसाब से आतंकवाद की परिभाषा गढ़ते है जिसके कारण संपूर्ण विश्व में आतंकवाद पर रोक लगाना मुश्किल होता है। ज्ञात हो कि वर्तमान में लगभग संपूर्ण विश्व ही आतंक के चपेट में है और पाकिस्तान की पहचान विश्व स्तर पर आतंकवाद के आश्रय स्थल के रूप में है। ऐसे में पाकिस्तान असहाय महसूस कर रहा है।

इन दिनों पाकिस्तान अपनी नीतियों के कारण कर्ज के जाल में बुरी तरह फंसा हुआ है।जिसके कारण पाकिस्तान के आर्थिक हालत ठीक नहीं है।उदाहरण के रुप में देखा जा सकता है कि हाल में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने सऊदी अरब से आर्थिक मदद हेतु गुहार लगाई है।ऐसे में पाकिस्तान की जनता को एकता के सूत्र में पिरोने हेतु पाकिस्तान आर्मी आतंकियों के माध्यम से भारत के साथ प्राक्सी वार (छद्म युद्ध) छेड़ रखा है।एक प्रकार से देखा जाए तो पाकिस्तान की सत्ता भारत विरोध पर ही बनती है।उसके मूल कारणों में यह है कि पाकिस्तान की अधिकांश जनता आज भी हुक्मरानों की बातों के बहकावे में आकर,विकास नहीं बल्कि कश्मीर के मुद्दे पर ही सरकारों को चुनती है और वही सरकारें स्थाई रुप से चल पाती है जिसे पाकिस्तान आर्मी का समर्थन हासिल होता है। वर्तमान में पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति क्यों खराब है? इस पर गौर करने की आवश्यकता ही महसूस नहीं होती है क्योंकि उनके यहाँ अशिक्षा ,धार्मिक आधार पर और बड़े पैमाने पर व्याप्त बेरोजगारी आदि के कारण वहाँ के हुक्मरान और आर्मी बड़े आसानी से ऐसे लोगों का ब्रेनवॉश करने में सफल हो जाते है जो आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने हेतु अपनी जान तक की परवाह नहीं करते है।जैसा 2008 में मुंबई हमले के दौरान कसाब के संदर्भ में देखा जा सकता है।
पाकिस्तान की पहचान वर्तमान में एक आतंकिस्तान राष्ट्र के रूप में हो चुका है।पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद की चपेट में पड़ोसी मुल्क जैसे भारत,ईरान, अफगानिस्तान ,बांग्लादेश आदि तो है ही,साथ में यूरोप,अफ्रीका और अमेरिका भी आतंकवाद के प्रभाव से अछूते नहीं है।ऐसे में लगभग सभी राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय मंचों से पाकिस्तान की आलोचना करते है लेकिन पाकिस्तान के विरुद्ध ठोस कदम उठाने की भी आवश्यकता है। 
पेरिस स्थित अंतर सरकारी संस्था फाइनैंशल ऐक्सन टास्क फोर्स ने 2018 में आतंक की फंडिंग रोक पाने में विफल रहने पर पाकिस्तान को ग्रे लिस्ट यानी ब्लैक लिस्ट में डाल दिया है।ग्रे लिस्ट में डालने का आशय है कि इसको अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से कर्ज मिलने में कठिनाई होना।जिसका प्रभाव निश्चित ही अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है ।साथ ही बहुराष्ट्रीय कंपनियों के निवेश पर भी विपरीत प्रभाव पड़ रहा है लेकिन चीन जो पाकिस्तान का सदाबहार मित्र है ।वह एक शातिर राष्ट्र है ।

एक तरफ चीन ने पाकिस्तान में अपनी महत्वाकांक्षी परियोजना वन वेल्ट वन रोड के तहत चीन पाकिस्तान इकोनॉमिक कारिडोर के तहत करोड़ों डॉलर निवेश कर पाकिस्तान को अपने कर्ज के जाल में फंसा चुका है।तो दूसरी ओर पाकिस्तान समर्थित आतंकी मौलाना मसूद को संयुक्त राष्ट्र द्वारा आतंकी घोषित करने में अडंगा लगाता है।उससे चीन को दो लाभ है एक पाकिस्तान के प्रति दोस्ती को बनाए रखने का संकेत देता है और दूसरा भारत को वर्तमान के वैश्विककरण के दौर में आतंक में मामले में उलझाकर रखना चाहता है ताकि भारत को वैश्विक आर्थिक महाशक्ति बनने की राह में रोड़ा अटका सके। ज्ञात हो कि भारत और चीन एशिया की दो प्रतिस्पर्धात्मक अर्थव्यवस्थाएं है।चीन नहीं चाहता है कि भारत एक आर्थिक महाशक्ति बने।

जिस प्रकार पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद द्वारा कश्मीर में युवाओं को भटकाने का प्रयास किया जा रहा है और कश्मीर में आतंकवाद के प्रसार हेतु आतंकी सक्रिय है। ऐसे में सरकारों को कई स्तरों पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।जैसे कश्मीर के लोगों में सरकार के प्रति विश्वास पैदा करना क्योंकि कश्मीर में आतंकवाद का सफाया भी स्थानीय लोगों के मदद से ही संभव है। अलगाववादी संगठनों पर लगाम लगाने की आवश्यकता,सर्जिकल स्ट्राइक के अतिरिक्त भी अन्य प्रभावकारी कदम उठाने हेतु सेना को छूट देना, एलओसी के पास चल रहे ट्रेनिंग कैंपों और आतंकियों को नेस्तनाबूद करने की इजाजत देना आदि।अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत को ऐसी नीति अपनानी चाहिए जिससे चीन मजबूर होकर भारत के पक्ष में आतंकवाद के मसले पर खड़ा दिखाई दे क्योंकि अंतरराष्ट्रीय पटल पर चीन जिस प्रकार भारत के संदर्भ में आतंकवाद के मसले पर व्यवहार कर रहा है वह उचित नहीं है।इस प्रकार के व्यवहार से आतंकवाद विश्व में मजबूत ही होगा जो किसी भी देश के हित में नहीं है। 

चीन के इस प्रकार के दोयम दर्जे के व्यवहार से विश्व व्यापी आतंकी फंडिंग पर रोक लगाना मुश्किल होगा।वर्तमान में भारत को पाकिस्तान के प्रति अपनी नीति को बदलना चाहिए और रक्षात्मक के बजाय ,आक्रामक नीति को अपना चाहिए क्योंकि जिस प्रकार 71 सालों में पाकिस्तान की नीति केवल भारत विरोधी रही है।ऐसे में पाकिस्तान ने अपनी अर्थव्यवस्था को स्थिरता प्रदान करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई है और इसकी अर्थव्यवस्था दूसरे देशों जैसे अमेरिका की मदद से चलती रही है। इसी वजह से जब अमेरिका ने हक्कानी नेटवर्क पर कार्यवाही न करने के क्रम में आर्थिक मदद पर रोक लगाई तो पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की स्थिति लगातार खराब हुई है।ऐसे में यहाँ बेरोजगारी, अशिक्षा, सामाजिक उथलपुथल के कारण अराजकता होना तय है।अपने ऐसे अंदरूनी मामलों से निपटने के लिए पाकिस्तान द्वारा भारत के विरुद्ध समय के साथ प्राक्सी वार में वृद्धि होगी।ऐसे में भारत सरकार और राज्य सरकारों को जम्मू कश्मीर के मसले के साथ साथ संपूर्ण भारत की सुरक्षा पर भी सतर्क रहने की आवश्यकता है और भारत सरकार को अंतर्राष्ट्रीय स्तर के साथ साथ राष्ट्रीय स्तर पर भी पाकिस्तान से निपटने हेतु ठोस रणनीति बनाकर उसको ईमानदारी से क्रियान्वयन करने की आवश्यकता है जिससे भारत की सरजमीं पर आतंकी गतिविधियों को रोका जा सकें।

Post a Comment

MKRdezign

Contact Form

Name

Email *

Message *

Powered by Blogger.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget