बेघर होने जा रहें लाखों आदिवासियों पर इतनी खामोशी क्यों?



ब्दुल रशीद
सुप्रीम कोर्ट ने जंगलों से आदिवासियों को निकालने का आदेश दिया है। इस आदेश के बाद देश के 17 राज्यों के जंगलों से करीब 23 लाख आदिवासी परिवार बेघर हो जाएंगे। वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) के तहत जंगल में ज़मीन के पट्टों पर इन लोगों का दावा खारिज हो गया है। 

वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) को कई NGO और रिटायर्ड वन अधिकारियों ने कोर्ट में चुनौती दी हुई है। वाइल्ड लाइफ फर्स्ट और अन्य बनाम पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के मामले में कोर्ट ने 19 फरवरी को एक आदेश दिया है। जिसमें 17 राज्यों के चीफ सेक्रेटरी से कहा गया है कि वो खारिज दावों वाले लोगों को 12 जुलाई 2019 से पहले जंगलों से तकरीबन 11 लाख परिवारों को बाहर करें।जो दावे पेंडिंग हैं, उन्हें भी इस तारीख तक निपटाना है। इस दिन मामले की फिर से सुनवाई होगी। 

जंगलों से आदिवासियों को निकालने का आदेश देने वाला सुप्रीम कोर्ट ने 2011 के एक फैसले में आदिवासी समुदायों के उत्पीड़न पर फटकार लगा चुका है और जंगलों पर उनका जायज हक भी मान चुका है। 

बहरहाल सुप्रीम कोर्ट के नए आदेश के बाद लाखों आदिवासी,वनवासी और जनजातीय परिवारों पर बेघर होने का खतरा मंडरा रहा है।आदिवासी मामलों के मंत्रालय के अनुसार वनवासियों के 42.19 लाख दावे किए गए थे जिनमें से 18.89 लाख ही स्वीकार किए गए हैं। जिससे यह साफ़ है के 23 लाख से ज्यादा आदिवासी और वनवासी परिवारों पर तलवार लटकी है। 
  • देश के आदिवासी जो जंगल की जमीन पर बसे हुए हैं,उनको पट्टे दिए जाएं,या नही इस मामले में सरकार का पूरा अमला पट्टे दिए जाने के सख्त खिलाफ रहता है,और सामान्य सरकारी तर्क यह है कि आदिवासी खेती करने के लिए जंगलों को काट लेते हैं,वहां पर पेड़ों की जगह खेत बना लेते हैं,और फिर उस जमीन पर पट्टे की मांग करते हैं। और सरकारी तंत्र यह मानती रही है,कि आदिवासियों की वजह से जंगल घट रहे हैं,और जंगली जानवरों पर भी खतरा है। 
  • वही आदिवासियों की वकालत करने वालों का यह कहना है कि देश में आज जितने भी जंगल बचे हुए हैं,वे आदिवासियों की वजह से बचे हैं,उनका तर्क यह है कि जंगल और आदिवासी एक-दूसरे के लिए बने हैं, और सहअस्तित्व उनकी जिंदगी की सोच है। वे हजारों बरस से इन्हीं पेड़ों के बीच रहते आए हैं,और इन पेड़ों से उनसे अधिक और कोई मोहब्बत नहीं कर सकता। 

दरअसल मामला प्रकृतिक संपदाओं का है क्योंकि जहां खदानें हैं,उनमें से बहुत से इलाकों पर जंगल हैं।और जहां जंगल हैं,उनके बीच आदिवासी रहते हैं। ऐसे में प्रकृतिक संपदाओं का दोहन करने वाले कॉर्पोरेट,खदान मालिक,और लकड़ी के कारोबारियों की आंखों में आदिवासी स्वाभाविक रूप से किरकिरी की तरह खटकते रहते हैं। अर्थात यह मामला आदिवासी अधिकारों बनाम कट्टर संरक्षणवादियों के हठ का तो दिखता है लेकिन असल में पर्दे के पीछे सक्रिय कॉरपोरेट,निर्माण और निवेश लॉबी,वन प्रशासनिक मशीनरी की सुस्ती और अनदेखी, कॉरपोरेट से कथित मिलीभगत,कानून के लूपहोल और सरकारों की उदासीनता का भी है। 
ज्ञात हो की,2006 में जब अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वनवासियों के हितों और अधिकारों की सुरक्षा के लिए वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) लाया गया था तो इस कानून का विरोध करने वालों में बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी, वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया, और वाइल्डलाइफ फर्स्ट जैसे पर्यावरणप्रेमी संगठन भी थे। 
जंगल में लकड़ी की तस्करी,खनन और भू माफिया द्वारा अतिक्रमण,अवैध कब्जा किए जाने की बात से इनकार नहीं किया जा सकता,यह भी सच है की जंगल सिकुड़ रहा है।लेकिन उसका दोष आदिवासीयों के सर नहीं मढ़ा जा सकता क्योकि विकास के नाम पर पेड़ो को भी काटा गया हैं और जंगलों से उनके मूल निवासी आदिवासीयों को बेदखल भी किया गया है। 
पर्यावरण प्रेमी और संरक्षणवादी संगठनो को अपना सोंच स्पष्ट करना चाहिए,आप जंगल के संरक्षण की वकालत क्या आदिवासियों और जंगल के जैविक संबंध के बगैर करते हैं? क्या आपके लिए पेड़ पौधा ही महत्वपूर्ण है या पर्दे के पीछे विरोध का असल खेल कुछ और है? 
चूंकि,आम चुनाव नजदीक है,और लोकसभा में 47 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। अतः कोर्ट के इस फैसले से राजनीतिक दलों में खलबली मची हुई है,इसलिए कांग्रेस और बीजेपी शासित राज्यों ने आननफानन में बयान जारी किए और कोर्ट मे गुहार लगाने की बातें कहीं. मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ तो पुनर्विचार याचिका डालने का एलान भी कर चुकी है। 

इस तरह के खानापूर्ति के बजाय,सरकारों को यह बात समझना चाहिए के आदिवासीयों के लिए जंगल पिकनिक प्लेस या कमाई का स्रोत नहीं है,जहाँ वे मौज मस्ती और कमाई के लिए रहते हैं,जंगल से उनका रूहानी रिश्ता है,जहां उनका घर है,जहां उनकी पीढी दर पीढ़ी रही है,जहां उनकी संस्कृति जन्मी है,परम्पराएं पनपी है।मुख्यधारा से अलग हुए इस पुरे समाज को बेघर करने के बजाय मुख्यधारा से जोड़ने की जरुरत है लेकिन विडंबना तो देखिए सरकारे आदिवासी जिन्हें मूलभूत अधिकार भी पूर्ण रूप से नहीं मिल पाता है,उनके प्रति दायित्व निभाने के बजाय विकास की ओट लेकर प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर थैली भरने वाले थैलीशाहों के मदद के लिए ज्यादा आतुर रहती है।

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