'चाय पर चर्चा' को भूल, कहिए 'मैं भी चौकीदार'

#MainBhiChowkidar


ब्दुल रशीद 
जैसे जैसे आम चुनाव करीब आ रहा है,नोटबंदी, जीएसटी,आतंकवाद और बेरोजगारी का मुद्दा प्रचार से ग़ायब होता जा रहा है. पुराने जुमले चायवाला को ढकने के लिए नया जुमला चौकीदार गढ़ दिया गया है। प्रधानमंत्री और भाजपा के नेताओं ने ही अपने नाम से पहले चौकीदार लगाया है बल्कि अब बाकायदा सोशल मिडिया पर #MainBhiChowkidar कैम्पेन चलाया जा रहा है।अब जरा ऐसे जुमलों और कैम्पेन के उद्देश्य पर गौर कीजिए,सब साफ़ हो जाएगा के नेताओं के नजर में देश का विकास और सत्ता में कौन सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।

विडंबना देखिए पांच साल सरकार चलाने के बाद सत्ता पक्ष अपने 5 साल के काम को मुद्दा बनाने की जगह चौकीदार को मुद्दा बना रही है। तीन हजार से चार हजार रूपये महीना पाने वाला चौकीदार की मूलभूत सुविधाओं की जद्दोजहद को झांकने तक की जिन्हें फुर्सत नहीं,वे भी सोशल मिडिया पर नाम के चौकीदार बनने की होड़ में दौड़ लगा रहें हैं।

न्यूनतम मजदूरी को तरसता चौकीदार

अंग्रेजों के जमाने में चौकीदार वजूद में आया,रात में पहरा देने की जिम्मेदारी निभाने के साथ गांव में होने वाली आपराधिक घटनाओं की सूचना पुलिस को देना था। अंग्रेजो के समय में यह आजादी की लड़ाई की सूचना भी देते थे। चौकीदार को एक तरह से अंग्रेजो का मुखबिर माना जाता था। आजादी के बाद चौकीदार पुलिस के मुखबिर तंत्र का हिस्सा बन गया लेकिन इनकी हालत जस के तस रही।

बीते साल इनका मानदेय तो बढ़ाया गया लेकिन बढ़ा मानदेय भी न्यूनतम मजदूरी से कम है। बढ़ती मंहगाई में 2500 मानदेय पाने वाले की जिंदगी बदहाल है,अपनी बदहाली से मुक्ति के लिए सालों से संघर्षरत इन चौकीदारों की चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी की तरह से वेतन और सुविधाएं देनें की मांग मानना तो दूर उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं।

बगैर शैक्षणिक योग्यता के चौकीदारी पद पर नियुक्ति आसान नहीं

बगैर शैक्षणिक योग्यता के इस पद पर आवेदन कलेक्टर कार्यालय में होता है। लेकिन इस पद पर आवेदन पत्र मंगाए जाने की कोई समय सीमा तय नहीं होता। चौकीदार बनने के लिए आवेदन करने वालों के नामों को पुलिस थाने को दिया जाता है,आवेदनकर्ता का चरित्र सही पाये जाने पर पुलिस अधीक्षक की रिपोर्ट पर नौकरी पर रखा जाता है,जिसकी सूची कलेक्टर कार्यालय द्वारा जारी किया जाता है।लेकिन आवेदन पत्र मंगाए जाने का अता-पता लग जाए यह बीरबल के खिचड़ी पकने से कम नहीं।

देश में चौकीदार की हालत का अंदाज़ा इस बात से लगा सकते हैं की,उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में 8 सौ गांव में केवल 4 सौ चौकीदार है,यानी आधे पद खाली हैं।एक चौकीदार पर दो गांवों की सुरक्षा की जिम्मेदारी है।
2014 लोक सभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने खुद को ‘चायवाला’ कहा था। 2019 के लोकसभा चुनाव में प्रचार की शुरूआत खुद को ‘मैं भी चौकीदार’ कह कर किया है। हकीक़त तो यह है की चायवाले की मन की बात हो या चौकीदार बनने का जोश,यह बस चुनाव जीतने के लिए एक चुनावी कवच है जिसके सामने झूठ है और पीछे सच,झूठ के सहारे सत्ता पाने वालों के इन नारों के पीछे का सच यह है कि चायवाला और चौकीदार के जीवन में कोई बदलाव हुआ ही नहीं।
चायवाला बनकर सत्ता के शिखर पर नेता तो पहुंच गए,लेकिन आज भी सत्ता के तंत्र पुलिस, नगर पालिका और छुटभैये नेताओं ने सड़क पर तपती धूप में अपने परिवार का भरण पोषण करने वाले चाय वालों से लालच का सिक्का लूटते हैं और और फिर इन्हीं को ताक़त दिखा कर चाय में पड़ी मक्खी की तरह रोजी रोटी के साधन के साथ फेंक देतें हैं,और वसूली की रक़म बढ़ा कर निर्लज्ज तंत्र ढिठाई से दोबारा ठेला लगाने देता है।
सोशल मीडिया का क्या है,एडिट कीजिए बन जाईए बादशाह,तानाशाह,चायवाला या चौकीदार जो मन करे ऐसा करने में कुछ लगता थोड़े ही है।सोशल मीडिया पर आभासी,ख्याली पुलाव पकाने वालों द्वारा किया जाने वाला इसतरह का मसखरापन, असल में दो वक़्त की रोजी रोटी के लिए जद्दोजहद करने वाले चायवाले और चौकीदार को चुभता है,क्योंकि आभासी ख्याली पुलाव पकाने वाले मसखरा कर मज़ा ले सकते हैं,लेकिन असल में एक दिन का भी मसखरापन पूरे परिवार को भूखे पेट की तपिश से झुलसा जाता है।
बेरोजगार से चौकीदार बनने की इस ऐतिहासिक आभासी परिवर्तन के बाद कोई देशभक्त यह पूछने वाला ही नहीं, कि चायवाला बनकर अच्छे दिन का सपना दिखाने वाले के लोकलुभावन वायदों का क्या हुआ? कुल मिलाकर आभासी विकास के चमत्कारी परिवर्तन पर विश्वास कीजिए,ट्विटर पर टूट जाइए,फेसबुक पर फेंक दीजिए,और महसूस कीजिए बदलाव के बाहर ने आपका सब कष्ट हर लिया है। 

इस लेख को पढ़ने के लिए शुक्रिया, और पढ़ कर यदि आभास और प्रकाश का भेद समझ आजाए तो टुकुर टुकुर देखने के बजाय प्रकाश को फैलाइये, क्योंकि अंधेरा बहुत है।
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