राजनितिक दलों को अपने चंदे का स्रोत बताने में आपत्ति क्यों है?

राजनितिक पार्टियों को अपने चंदे का स्रोत बताने में आपत्ति क्यों है?


ब्दुल रशीद 
दुनिया के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश भारत में मतदान और मतदाता की कितनी अहमियत है,इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि,एशियाई शेरों का घर कहे जाने वाले गिर के जंगल में केवल एक ही वोटर के लिए 2009 में बूथ स्थापित किया गया था। लेकिन यह भी सच है के इसी देश के नेता अब सत्ता पाने के लिए चुनावी प्रणाली के मजबूत तंत्र को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करने के हर संभव प्रयास से परहेज़ नहीं कर रहें। 

भारत के चुनाव आयोग के मुताबिक, 2009 आम चुनाव के बाद से 81.45 करोड़ लोग मतदान के लिए पात्र थे,जिससे यह दुनिया में सबसे बड़ा चुनाव बना। 2014 आम चुनाव देश के इतिहास में सबसे लंबा और सबसे मंहगा आम चुनाव था, इस चुनाव में खजाने से 3500 करोड़ रुपये (यूएस $ 577 मिलियन) का खर्च हुआ। सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज के मुताबिक, दलों को चुनाव में 30,500 करोड़ रुपये (यूएस 5 अरब डॉलर) खर्च करने की उम्मीद थी। यह खर्च 2009 की पिछली चुनाव में खर्च की गई तीन गुनी राशि थी। 

दिल्ली स्थित थिंक टैंक सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज के मुताबिक, 2019 के आम चुनाव में पिछले आम चुनाव से ज्याद लगभग 8.5 बिलियन डॉलर खर्च होंगे। पिछले साल कॉरपोरेट डोनेशन पर सीमा खत्म होने के बाद रक़म और भी अधिक हो सकती है।सेंटर फॉर रिस्पॉन्सिव पॉलिटिक्स के अनुसार, अमेरिकी सीनेट, हाउस और राष्ट्रपति की दौड़ में तीन साल पहले अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प के निर्वाचित होने पर खर्च की गई राशियों की तुलना 6.5 बिलियन डॉलर से की गई थी। 

चुनाव में भारतीय राजनितिक दल पैसा पानी की तरह इसलिए बहा देते हैं क्योंकि ऐसा करने से उनके उम्मीदवारों को अयोग्य घोषित नहीं किया जा सकता,और जीतने के बाद पानी की तरह से बहाए पैसे की रिकवरी बेहद आसान होता है,महज़ एक पंच वर्षीय चुनाव जीतने के बाद ही भारतीय नेताओं के आर्थिक स्थिति में चमत्कारिक परिवर्तन आ जाता है। कुछ राज्यों में नमूनों से सीएमएस शोधकर्ताओं ने यह भी पाया है कि 37 प्रतिशत तक मतदाताओं को वोट के लिए पैसे मिले हैं। एक दिलचस्प धारणा यह भी है के दाग़ी प्रत्याशियों के पास आकडे बेहद मजबूत होते हैं जिससे उनके जितने की सम्भावना ज्यादा होती है,और यह बात चुनावी नतीजों में देखा भी गया है। 

दूसरी बेहद चिंताजनक स्थिति यह है कि, चुनाव आते ही तथाकथित पेड न्यूज और फेक न्यूज के सहारे ऐसा माहौल बना दिया जाता है,जिससे मूल मुद्दे से वोटरों का ध्यान हटकर भावनात्मक मुद्दों में उलझ जाता है । हालंकि,आगामी लोकसभा चुनावों में सोशल मीडिया पर फर्जी खबरों की बाढ़ पर अंकुश लगाने के लिए चुनाव आयोग ने फेसबुक, ट्विटर और गूगल से बातचीत की है। सरकार ने इन कंपनियों से चुनावों के दौरान पोस्ट किए जाने वाले तमाम राजनीतिक कन्टेन्ट पर नजर रखने और फेक न्यूज को बढ़ावा देने वाले पोस्ट को 24 घंटे के भीतर हटाने को कहा है। हाल में इन कंपनियों के प्रतिनिधियों की चुनाव आयोग के साथ एक बैठक हुई थी। बैठक में चुनाव आयोग ने इन कंपनियों को इस बात का ध्यान रखने का निर्देश दिया कि चुनाव प्रचार खत्म होने से लेकर मतदान तक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कोई भी पार्टी किसी भी तरह का कोई राजनीतिक प्रचार नहीं कर सके। 
भारतीय नौकरशाही को दुनियाभर में बेहद सम्मान से देखा जाता है,और यह इस देश की नौकरशाही की दक्षता को ही दर्शाता है के दुर्लभ परिस्थितियों के बावजूद चुनाव कराने में सफल रहती है। लेकिन वही ब्यूरोक्रेट लोकतंत्र के लिए सबसे महत्वपूर्ण चुनावी प्रणाली को दूषित करने वाले भ्रष्ट व्यवस्था पर अंकुश लगाने में ज्यादा सफल नहीं रही है। इसका मुख्य कारण ब्यूरोक्रेसी पर राजनीतिक प्रभाव का होना,क्योकि सत्ता में आने के बाद ब्यूरोक्रेट के प्रति सभी राजनैतिक दलों का व्यवहार एक समान ही रहता है,जिसमें निष्पक्षता का अभाव रहता है। 
कोई भी लोकतांत्रिक देश दल बिना चंदे के चुनाव लड़ने की सोच भी नहीं सकते। और खर्चीले चुनाव राजनीति में भ्रष्टाचार का एक बहुत बड़ा कारण बन जाता है।चुनावी खर्च करने के मामले में अब तक भारत दुनिया में दुसरे पायदान पर है और आने वाले आम चुनाव में प्रथम स्थान पर पहुंच जाय ऐसी संभावना से इनकार भी नहीं किया जा सकता। आजादी के बाद राजनीतिक दलों का जिस तरह से चमत्कारी रूप से विकास हुआ है, वह जनता से मिलने वाले चंदे से नहीं बल्कि बड़े कॉरपोरेट घरानों से मिलने वाले धन और सत्ता प्राप्त करने के बाद किए गए भ्रष्टाचार से कमाए धन का कमाल है। जहां भारत में चुनाव सुधारों और चुनावी चंदे को पारदर्शी बनाने पर बातें तो बहुत की जाती हैं, वहीं भारत की दो सबसे बड़ी पार्टी सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और विपक्षी कांग्रेस धन इकट्ठा करने की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए वादे भी करती रही हैं लेकिन असलियत वायदों और बातों के ठीक विपरीत ही होती है। 
चुनाव आते ही पेड न्यूज और फेक न्यूज के सहारे मूल मुद्दों से जनता का ध्यान भटका कर भावनात्मक मुद्दों में उलझाने वाली राजनितिक पार्टियों को अपने चंदे का स्रोत बताने में आपत्ति क्यों है? 
जबतक भारत में सभी राजनितिक पार्टियों के चंदे का स्रोत अनिवार्य रूप से सार्वजनिक करने का कानून नहीं बनाया जाता है,तबतक भ्रष्टाचार,कालाधन ख़त्म करने और सुशासन के दावों को चुनावी जुमला ही समझिए। अंत  में इन दावों के लिए इतना ही कहा जा सकता है कि,न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी।
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