मसूद अजहर और चीन का ये रिश्ता क्या कहलाता है?


राहुल लाल
पाकिस्तान से संचालित आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के सरगना और पुलवामा आतंकी हमलों के मास्टर माइंड मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा वैश्विक आतंकवादी घोषित करने की राह में चीन ने एक बार फिर अडंगा लगा दिया है।सुरक्षा परिषद में अमेरिका,ब्रिटेन और फ्रांस की तरफ से लाए गए इस प्रस्ताव को चीन ने चौथी बार असफल कर दिया है।यह प्रस्ताव 27 फरवरी को सुरक्षा परिषद के "1267" कमेटी में लाया गया था।इस प्रस्ताव पर आपत्ति दर्ज करने के लिए 13 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय समयानुसार रात 12:30 तक का समय था।लेकिन चीन ने इस समय अवधि से कुछ देर पूर्व बुधवार देर रात को "टेक्नीकल होल्ड" का प्रयोग कर दिया।इसके अंतर्गत चीन ने प्रस्ताव की जांच के लिए और समय की माँग की।स्पष्ट है कि चीन मसूद अजहर को बचाने के लिए आखिरी समय में सक्रिय हो गया।अगर कोई आपत्ति नहीं आती तो प्रस्ताव को स्वीकार्य मान लिया जाता।यह 'टेक्नीकल हॉल्ड' 9 माह तक प्रभावी होगा।इसके बाद इस प्रस्ताव को फिर से पेश किया जा सकता है।

चीन द्वारा मसूद अजहर को बचाने के लिए वीटो लगाने पर अमेरिका ने चीन को चेतावनी दी है कि वह अन्य सदस्य देशों के साथ दूसरे कठोर कार्यवाई के लिए मजबूर हो सकते हैं।यह अमेरिका के तरफ से चीन को एक कठोर संदेश हैं,जिसमें कहा गया कि 'अगर बीजिंग आतंकवाद से लड़ने के लिए गंभीर है,तो उसे पाकिस्तान और अन्य देशों के आतंकियों का बचाव नहीं करना चाहिए।

इससे पहले भी वर्ष 2009 में भारत स्वयं यह प्रस्ताव लेकर यूएन सेक्शन कमिटी 1267 में गया था। 14 फरवरी 2019 के कायराना पुलवामा आतंकी हमले के पूर्व भी मसूद अजहर वर्ष 2001 में संसद पर आतंकी हमला,जनवरी 2016 में पठानकोट हमला और सितंबर 2016 में उड़ी आतंकवादी हमलों का भी मास्टरमाइंड रहा है।पठानकोट आतंकवादी हमले के बाद 2016 में भारत ने पी-3 देशों के साथ मिलकर संयुक्त राष्ट्र में मसूद अजहर के विरुद्ध प्रस्ताव पेश किया था।यहाँ पी-3 से आशय अमेरिका,ब्रिटेन और फ्रांस है। 2017 में भी पी-3 देशों ने ही यह प्रस्ताव पेश किया।संयुक्त राष्ट्र में चारों बार मसूद अजहर को चीन ने ही बचाया।चीन का कहना है कि सुरक्षा परिषद के "1267 समिति"में आतंकवादी संगठनों या किसी व्यक्ति के लिए लिस्टिंग मानदंडों के लिए स्पष्ट नियम हैं।चीन के अनुसार वह चाहता है कि "1267 समिति"निष्पक्ष और प्रोफेशनल तरीके से कार्य कार्य करे।चीन इसी मामले को लेकर बार-बार सुरक्षा परिषद में मसूद अजहर के मामले को टालता है।इस संपूर्ण प्रकरण को समझने के लिए "1267 समिति" को भी समझना आवश्यक है।

आखिर "1267 समिति" क्या है?

ये समिति संयुक्त राष्ट्र संघ में प्रतिबंधों के मानकों की देखरेख करती है।निर्धारित लिस्टिंग के मानदंडों को पूरा करने वाले व्यक्तियों और संस्थाओं को नामित करती है।यह सुरक्षा परिषद को प्रतिबंधों के मानकों की सलाना रिपोर्ट भी पेश करती है।

'1267' समिति की कार्यप्रणाली और मसूद अजहर

यह समिति आम सहमति से कार्य करती है।अगर किसी मुद्दे पर आम सहमति नहीं बन पाती है,तो सुरक्षा परिषद के पास भेज दिया जाता है।अगर किसी तरह का विरोध नहीं होता है,तो स्वाभाविक रूप से सुरक्षा परिषद उसे वैश्विक आतंकवादी घोषित कर देता है।चीन ने इसी स्टेज पर मसूद अजहर का विरोध कर दिया।इसे पारित करने के लिए सभी सदस्यों की सहमति आवश्यक थी,जो केवल चीन के कारण नहीं बन पाई।ऐसे में आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष के लिए आवश्यक है कि भारत न केवल चीन के प्रति आक्रामक रवैया अपनाएँ,अपितु वैश्विक घेराबन्दी भी तेज करे।चीन ने पहले ही मसूद अजहर को बचाने के संकेत दे दिए थे।चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा था कि इस मामले का समाधान इस तरह निकलना चाहिए,जिससे सभी पक्षों को संतुष्टि हो।

अब प्रश्न उठता है कि चीन को पाकिस्तान की जरूरत क्यों हैं?

चीन में शी जिनपिंग की नई सरकार के 2013 में आने के फौरन बाद पाकिस्तान में नाटकीय तरीके से उसकी दावेदारी बढ़नी शुरु हो गई ।शी जिनपिंग ने अपने महत्वाकांक्षी योजना "बेल्ट एंड रोड" में पाकिस्तान को महत्वपूर्ण भूमिका दी।इसके अंतर्गत "चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा(सीपीईसी) में चीन लगभग 1 बिलियन डॉलर खर्च कर रहा है।

चीन सीपीईसी से 2 हित पूरा होते देखता है।प्रथम, अपने करीबी की बिखरती अर्थव्यवस्था में जान फूंकना,जो बदले में चीन के लिए एक स्थिर पश्चिमी परिधि बनाएगा।द्वितीय, अपने उद्यमों के लिए नई जगह मुहैया कराना ताकि उनकी परियोजनाओं को एकमुश्त तट पर ले जाया जा सके,जो चीन में क्षमता की अधिकता से जूझ रहे हैं।चीन के नियोजकों के लिए इस परियोजना का एक रणनीतिक मूल्य भी है,क्योंकि यह ऊर्जा के आयात के लिए अरब सागर तक उसकी पहुँच बनाएगा,जिसके चलते मलक्का जलडमरूमध्य से चीन को मुक्ति मिल सके।चीन के मन में लंबे समय से यह आशंका थी कि कोई प्रतिद्वंद्वी ताकत मलक्का के संकरे मार्ग को बाधित करके चीन की अर्थव्यवस्था को कहीं बंधक न बना ले।इस तरह उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि चीन ने पाकिस्तान में भारी निवेश किया है।अगर पाकिस्तान को चीन को नया उपनिवेश कहा जाए,तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

पाकिस्तान के डीप स्टेट पर चीन का वर्चस्व

चीन अब तक मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने में रोढ़ा डालता रहा है।चीन पाकिस्तान के समर्थन में इसमें बाधा उत्पन्न करता है।चीन संयुक्त राष्ट्र के 15 सदस्यीय सुरक्षा परिषद का एकमात्र सदस्य है,जो मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने से रोकने के लिए वीटो का प्रयोग कर देता है।चीन ने वर्ष 2017 के ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में जैश-ए-मोहम्मद को आतंकवादी संगठन के रुप में मान्यता दी थी,फिर भी संयुक्त राष्ट्र में वीटो के द्वारा मसूद अजहर का बचाव जारी है।इसका प्रमुख कारण है,चीन एवं पाकिस्तान की घनिष्ठ मित्रता है।पाकिस्तान का संपूर्ण मूल ढांचा वहाँ की लोकतांत्रिक सरकार नहीं, अपितु "डीप स्टेट" तय करती है।प्रश्न उठता है कि इस "डीप स्टेट" का मुख्य हिस्सा कौन है?पाकिस्तानी डीप स्टेट में सेना एवं कट्टर चरमपंथी संगठन शामिल हैं।वहाँ की सेना एवं कट्टरपंथियों को यह फंड भारत विरोध के नाम पर ही उपलब्ध है।अब चीन ने पाकिस्तान में भारी निवेश किया है।अमेरिका से पाकिस्तान की दूरी बढ़ने पर पाकिस्तान एक तरह से चीन का उपनिवेश ही बन गया है।ऐसे में अब पाकिस्तानी डीप स्टेट पर भी पूर्णतः चीनी वर्चस्व कायम है।चीन भारत को प्रतिस्पर्द्धी मानता है तथा भारत को प्रतिसंतुलित करने के लिए पाकिस्तान का प्रयोग करता है।इसलिए अब यह आवश्यक हो गया है कि भारतीय विदेश नीति को चीन के प्रति भी आक्रामक बनाया जाए।ज्ञात हो,वर्ष 2017 मेंं जब चीन के तमाम प्रतिरोधों के बावजूद भारतीय सेना डोकलाम में डटी रही,तो भारत - पाकिस्तान सीमा पर शांति कायम थी।दूसरे शब्दों में ,चीन पर भारतीय आक्रामक रवैया को देखकर पाकिस्तान भी भयभीत हो गया था।

चीन व पाकिस्तान को प्रसंतुलित करने के उपाय

इस समय अमेरिका के साथ ट्रेड वार के कारण चीन पहले से ही भारी आर्थिक दबाव में है।वहीं 28 वर्षों के बाद प्रथम बार भारतीय आर्थिक विकास दर चीन से काफी आगे है।ऐसे में चीन पहले ही अमेरिका का बाजार खो चुका है।इस हालत में चीन कभी भी भारतीय बाजार को खोना नहीं चाहेगा।इसके अतिरिक्त चीन के साथ भारतीय व्यापार पूर्णतः चीनी पक्ष में ही झुका हुआ है।सरल शब्दों में कहें तो इस समय चीन पर दबाव डालना बेहद आसान हैऔर इस मामले में भारत को बाजार कूटनीति का प्रयोग करना चाहिए।

चीन आर्थिक मंदी से जूझ रहा है और भारत अभी दुनिया का सबसे तीव्र आर्थिक विकास दर वाला देश है।ऐसे में भारतीय बाजार का चीन के लिए महत्व समझा जा सकता है।यही कारण है कि वर्ष 2017 में डोकलाम विवाद के कारण जब भारत और चीन का तनाव चरम पर था,तब भी चीन ने भारत के साथ व्यापारिक रिश्ते नहीं तोड़े थे।ऐसे में आज भारत चीन के ऊपर और भी मजबूती से दबाव डाल सकता है।भारतीय अर्थव्यवस्था के मजबूती को इससे भी समझा जा सकता है कि चीनी अरबपति वांग जियानलिन भारत में सबसे बड़ा निवेश कर रहे हैं।वांग का वांडा ग्रुप करीब 10 अरब डॉलर का निवेश कर रहा है।ऐसे में अब भारत को आर्थिक मोर्चे पर चीन को कठोर संकेत देना चाहिए।अगर चीन के द्वारा पाकिस्तानी आतंकवाद को प्रोत्साहन नहीं मिलेगा,तो पाकिस्तान के रवैये में बदलाव अवश्य दिखेगा।इसके अतिरिक्त भारत को पाकिस्तान के निकट सहयोगी सऊदी अरब पर भी दबाव डालना चाहिए। खागोशी हत्याकांड के बाद उनकी स्थिति भी वैश्विक स्तर पर कमजोर हुई है।भारत फ्रांस, आस्ट्रेलिया इत्यादि देशों के द्वारा सऊदी अरब पर सामूहिक दबाव बनाया जा सकता है।अभी एक अंतरराष्ट्रीय एजेंसी"फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स " पाकिस्तान को मनी लॉन्ड्रिंग एवं आतंकवाद को बढ़ावा देने के मामले में' ग्रे लिस्ट' में रखा है।अभी जिस तरह संपूर्ण विश्व में पाकिस्तान अलग-थलग पड़ा है,उस जनमत का प्रयोग कर पाकिस्तान को फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स के "ब्लैक लिस्ट"में भी डलवाया जा सकता है।इससे वैश्विक वित्तीय संस्थाओं से सहयोग मिलना और भी बहुत ज्यादा कठिन हो जाएगा।

चीन जिस तरह आतंकवाद पर भी पाकिस्तान का बार-बार बचाव करने का प्रयास करता रहा है,उससे उसके जिम्मेदार महाशक्ति बनने पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।साथ ही यह चीन के आतंकवाद के प्रति दोहरे रवैया को भी प्रतिबिंबित करता है।चीन जहाँ उईगुर में आतंकवाद के नाम पर मुस्लिमों को दाड़ी तक नहीं रखने दे रहा है,वहीं कुख्यात आतंकी मसूद अजहर के प्रति अतिशय सहानुभूति को देखा जा सकता है।चीन को समझ लेना चाहिए कि इस तरह आतंकवाद के प्रति दोहरा रवैया दरअसल उसे भी नुकसान ही पहुँचाएगा।आतंकवाद को पोषित करने वाले देशों को भस्मासुर की कहानी का निहितार्थ सदैव स्मरण रखना चाहिए।चीन के ऊपर भी लगातार वैश्विक दबाव बनाए रखने की आवश्यकता है,जिससे आतंकवाद के विरूद्ध वैश्विक आवाज में कोई बाधा उत्पन्न नहीं हो।

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