हे नारी, सिर्फ अबला हो तुम.....

"यस्य पूज्यन्ते नारी तत्र वसते देवता"


डॉ कुणाल सिंह 
पैसठ साल की हमारी उम्र में हमें नारी कभी सबला नहीं दिखी,न तो धर्म सम्प्रदाय में,न सामाजिक ताना बाना में और न ही साशन प्रसाशन में। इस सृस्टी के भगवानों,श्रीषी मुनियों और संतो को जन्म देने वाली नारी को क्यों कमजोर बना कर रखा गया है। इसका कारण क्या है? धर्म सम्प्रदायों का जाना बुझा अनुबंधन,पुरुष प्रधान समाज में निर्बल बनाए रखने की सोची समझी प्रवित्ती या तार्किक अज्ञानता। 

नारी को भारत के किसी भी धर्म सम्प्रदाय में समानता और सम्मान दिए जाने की बात नहीं लिखी है।सभी धर्मों नें नारी के अधिकारों का दोहन किया है।सभी धर्मों का निर्देश केवल महिलाओं पर ही लागू होते हैं। इसका मूल कारण है पुरुष प्रधान सत्ता का सामाजिक ताना बाना। लोगों ने मिल कर समूह और समाज बनाया, धार्मिक कानुन बनाए परन्तु पुरुष की प्रधानता को ध्यान में रख कर ही। इसका पालन चिरकाल ( सनातन ) से चला आ रहा है।

इस विश्व में बहुतेरे देश हैं पर नारियों का सबसे ज्यादा दोहन विकासशील देशों में ही होता आ रहा है।विकासशील देशों में फलने फूलने वाले दो ही कट्टर धर्म हैं मुस्लिम और हिन्दू धर्म। महिलाओं की नैसर्गिक सुन्दरता से कोई अन्य पुरुष प्रभावित न हो जाय, इसके कारण इनमें बुर्का और का चलन धार्मिक रूप से कायम किया गया। 
यानी वह महिला मुस्लिम है और कथित धर्म में आस्था रखती है तो उसे बुर्का पहनना ही चाहिए। सबसे बड़ी समस्या शादी शुदा महिलाओं की है।मुस्लिम धर्म में तिन तलाक शब्द बहुत महत्व पूर्ण है। कोई पुर्ष जब जी चाहे पत्नी को छोड़ना तो उसे बस तलाक शब्द बिना कारण बताये ती न बार कहना काफी है।इसके लिए धर्म की कोई कोर्ट कचहरी नहीं लगाती। 
इसके बाद धार्मिक रूप से उस महिला से पत्नी का दर्जा छीन लिया जाता है। इसमें महिलाओं की इचा अनिक्षा का कोई महत्व नहीं होता। यही नहीं, पुरुष चाहे तो अपनी मर्जी से कई पत्नियां रखा सकता है। मुस्लिम धर्म में तो धार्मिक कर्मकांडों में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित की ही नहीं गयी है। सीधा सा अर्थ है,वह नमाज अदा करने मस्जिद भी नहीं जा सकती। 

हे नारी, तुम्हें आदिशक्ति का दर्जा देने वाले भी तुमें "अबला" से ऊपर का दर्जा नहीं देना चाहते और दोयम पर रखना चाहते हैं और यह परिपरती सनातन रूप से चली आ रही है। तुम्हें शिव के कथित अपमान पर अग्नि स्नान कर जल मरना पड़ता है पार्वती बना कर, तो सीता बना कर शील प्रमाण हेतु अग्नि परीक्षा भी देनी पड़ती है।

एक तरफ प्रणय निवेदन करने वाली सुपर्न्खा का नाक काटा जाता है तो दूसरी तरफ प्रेम करने वाले कृष्ण की राधा को रुक्मिणी से ज्यादा सम्मान भी दिया जाता है। हिन्दू के पुरुष प्रधान समाज में तुम्हें द्रोपदी के रूप में पांच पांच पुरुषों की पत्नी भी बनना पड़ता है।प्रिय चौपड़ खेल पर दांव पर भी तुम्हीं लगाती हो।तुम्हारा लज्जा हरण होता रहता है और कथित खेल धर्म के नाम पर किम कर्त्तव्य विमूढ़ हो तुम्हारे पांचो बलवान पति कुछ नहीं कर पाते।आश्चर्य है कि तुम्हें बचाने कोई आदिशक्ति नहीं एक पुरुष कृष्ण आते हैं,वह भी केवल वस्त्रम्बार लगाने।तुम्हें नरक का द्वार ही कह डाला गया है। रामचरित मानास के रचना कार संत तुलसी दास नें तुम्हें ताडन की अधिकारी कहनें में भी संकोच नहीं किया। 

"यस्य पूज्यन्ते नारी तत्र वसते देवता" का उद्घोष भी इसी बात का प्रमाण है कि नारियों के अधिकारों का उत्पीडन सनातन से होता चला आ रहा है। नारी सशक्तिकरण के नाम पर तिन तलाक के मुद्दे पर मोदी ने सशक्त कदम उठाया तो सबको अच्छा लगा कि मोदी जी नारीओं की प्रति काफी संवेदन शील हैं। वहीँ सबरिवाला मंदिर में जब दस से पचपन वय तक की उम्र की नारियों को सुको ने पूजा करने की इजाजत दे कर इस कु प्रथा को समाप्त करने का आदेश दिया तो पाखंड के समर्थन में मोदी सरकार,भाजपा,और उसकी अनुसांगिक संगठन का आ जाना दुर्भाग्य ही कहा जाएगा। परिणाम स्वरूप इस वय के बिच की पूजा करने वाली विन्दु और अनक दुर्गा को जान से मारने की धमकी डी जा रही है।

हद तो यहाँ तक कि आर आर इस के जिला प्रभारी प्रवीन और उसके साथी संघ कार्य कर्ता शिर जित ने तीन जनवरी को सम्बंधित दुभंगड थाणे पर बम फीके थे जिन्हें बाद में गिरफ्तार भी कर लिया गया है।"धर्म की नफ़रत" भरी राजनीति वोट के लिए किया जाना निश्चय ही निंदनीय है। नारी तब ही सम्मान और सोहरत अर्जित कर पाई है जब ही उसने धर्म सांप्रदायिक पाखण्ड के चौकठ को लांघा है। चुल्हा चौका के साथ उसने स्कुल कालेग का रुख किया है और घर के उत्पीडन भरे माहौल को बड़ी धीरता के साथ सहन करते हुए अपने बाला पर अस्तित्व कायम किया है। आज अगर नारी कुछ बनी है तो सिर्फ अपने संघर्ष के बाला पर।

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