होली - ऐसा पर्व जिसमें कोई एकरंगा रह ही नहीं सकता।


ब्दुल रशीद 
होली के त्योहार पर हिंदू मुस्लिम एकता का संदेश देता हुआ सर्फ एक्सल ने एक विज्ञापन बनाया। लेकिन कट्टरपंथियों को यह विज्ञापन पसंद नहीं आया और सोशल मीडिया के अधकचरे स्वंयम्भूओं ने सर्फ पाउडर के बहिष्कार का अभियान बायकौटसर्फएक्सेल औरबायकौटहिंदुस्तानलिवर जैसे हैशटैग के साथ शुरू कर दिया। ये वही लोग हैं जो दीपावली पर चाइनीज मोबाईल से चाइनीज सामानों का विरोध तो करते हैं लेकिन पड़ोस के कुम्हार से दीया खरीदने के बजाय रात के अंधेरों में चाइनीज झालर से अपने मकानों को सजा कर सोशल मीडिया पर औरों को ख्याली पुलाव बांटते हैं।

क्या है विज्ञापन में

सर्फ एक्सल के विज्ञापन में एक मुस्लिम बच्चा नमाज पढ़ने के लिए घर से निकलना चाहता है पर गली के मकानों में बच्चे पिचकारी और रंग भरे गुब्बारे लिए खड़े हैं। उसे डर इस बात का है कि नमाज पढ़ने से पहले उस का सफेद कुर्ता खराब न हो जाए।तभी एक हिंदू बच्ची साइकिल से आती है और गली के सारे बच्चों से होली का रंग अपने ऊपर फेंकने को कहती है,बच्चे रंग फेंकते हैं,जब बच्चों का सारा रंग खत्म हो जाता तब बच्ची मुस्लिम बच्चे को अपनी साइकिल पर बैठा कर मस्जिद तक छोड़ कर आती है। ऐसा करने के पीछे बच्ची का मकसद होता है के मुस्लिम बच्चे को नमाज़ पढ़ने जाने के रास्ते में रंग न पड़े। हां, जब मस्जिद में जाते समय बच्चा उस से कहता है, नमाज पढ़ कर आता हूं तो बच्ची जवाब देती है, बाद में रंग पड़ेगा। दो मजहबों के बीच का गंगा जमुनी यह सदभाव कट्टरपंथी लोगों को भला कैसे रास आता, क्योंकि सदभावना यदि पूरे देश में फैल जाय तो उनकी दुकानदारी जो बंद हो जाएगी।

क्या है आपत्ति 

विज्ञापन की टैगलाइन है,"अपनेपन के रंग से औरों को रंगने में दाग लग जाए तो दाग अच्छे हैं।" विज्ञापन में सौहार्द के सन्देश की सराहना करने के बजाय कट्टरपंथियों द्वारा आपत्ति इस बात की बताई जा रही है कि विज्ञापन में बच्ची हिंदू और बच्चा मुस्लिम क्यों दिखाया गया। ऐसे विज्ञापनों से लव जिहाद बढ़ेगा,बच्चों के मन पर दकियानूसी परंपराओं के दाग गहरा असर डालेगा। यह भी कहा जा रहा है कि विज्ञापन देख कर बच्चे पूछेंगे नहीं क्या कि इस बच्चे ने टोपी क्यों पहन रखी है? होली के रंग से बच्चा बच क्यों रहा है?
क्या कट्टरपंथी इस बात से अंजान हैं या अंजान बनने का ढोंग कर रहें हैं के इंसानों को बांटने वाला प्रतीक तिलक,चोटी,दाढ़ी,टोपी और धोती पहले से ही हमारे समाज में मौजूद है।गुरुकुल,मदरसा और मिशनरी स्कूलों में बच्चों को क्या पढाया जा रहा है? बच्चों को धार्मिक शिक्षा कौन दे रहा है? धार्मिक जुलूस कौन निकलता है और क्यों निकाला जाता है? तब ये ऐसे ज्ञानी विरोध करने के बाजय मौनधारण कर किस कोने में दुबक जाते हैं?
दरअसल, नफ़रत और घृणा के सौदागरों के धंधे की जड़ें सौहार्द के हल्के से झोकें से हिलने लगती है।ऐसे विज्ञापनों से समाज में सौहार्द बढ़ेगा,लोगों के बीच आपसी भाईचारा बढ़ेगा। कट्टरपंथियों के आपत्ति का मुख्य कारण यही है। 

होली की रंगतें देश के गंगा जमुनी सांस्कृतिक में रची बसी है। मान्यता और मिथक कुछ भी हों, कुछ भी कहें लेकिन भारत का सामाजिक तानाबाना तो मानो होली की मस्ती और रंग के रेशों से बुना गुंथा हुआ है। बेशक इसे तोड़ने वाले भी यही हैं और वे हर किस्म के सौहार्द को शक और क्रोध से देखते आए हैं वे बस एक ही रंग जानते हैं जो हिंसा का डरावना रंग है लेकिन ये पर्व है ही ऐसा कि इस पर्व में कोई एकरंगा रह ही नही सकता है।

तभी तो होली खेलें रघुवीरा अवध में और राजस्थान के अजमेर शहर में ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर आज रंग है री मन रंग है, अपने महबूब के घर रंग है री होली गाई जाती है।
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