मोदी जी,महंतो की आलोचना नही, उनका अभिनंदन-नमन कीजिए

Shri kashi vishwanath corridor


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के बहुचर्चित ड्रीम प्रोजेक्ट श्री काशी विश्वनाथ मंदिर कारिडोर का शुक्रवार आठ मार्च की सुबह सर्वान्ग सिद्ध महूर्त मे मंत्रोच्चार के बीच भूमि पूजन कार्यक्रम सम्पन्न हुआ।

मोदी जी ने नियत समय पर प्रदेश के राज्यपाल श्री राम नाइक और मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ के साथ मिर्जापुर मठ के पार्श्व मे आयोजित इस धार्मिक अनुष्ठान मे भाग लिया। इसके पूर्व प्रधानमंत्री जी ने बाबा के दरबार मे विधिवत पूजन किया।

अपने संक्षिप्त उद्बोधन मे मोदी जी ने सौ साल पहले महात्मा गांधी के विश्वनाथ मंदिर मे दर्शन का जिक्र करते हुए कहा कि बापू की भी इच्छा इस कारिडोर के बनने से पूरी हो जाएगी।

प्रधानमंत्री जी ने कारिडोर के निमित्त सैकड़ो मकानों को अधिग्रहीत करने जैसे जटिल कार्य के लिए योगी जी को बधाई देते हुए कहा कि मुख्यमंत्री जी ने जो श्री काशी विश्वनाथ न्यास की टीम बनायी वह अभिनंदन की पात्र है। टीम ने रात दिन मेहनत करते हुए कारिडोर निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया।
मोदी जी ने जब यह बताया कि अधिग्रहण के दौरान 40 ऐसे दुर्लभ मंदिर सामने आए जो छिपे हुए थे, तब मुह का जायका बिगड़ गया। शायद उनको जिन अज्ञानियो ने फीड बैक दिया होगा उनको सिक्के के इस एक पहलू की ही जानकारी थी। यह भी गलत नही कि कुछ मंदिरो मे रसोई और वाश रूम थे। लेकिन ये अपवाद स्वरूप रहे। शेष सभी मे बाकायदा पूजन-अर्चन हुआ करता था।

जिनको इतिहास नही पता कि ये मंदिर क्यो लुके- छिपे थे। उन लोगो ने स्थानीय निवासियों से जानकारी ली होती तो मोदी जी के मुख से इतना असत्य नही कहलावाते। सच्चाई यह है कि ये मंदिर और भूल भूलैया सरीखी तंग गलियों का निर्माण एक सुविचारित रणनीति के तहत किया गया था। हालाँकि इसकी शुरुआत तो अलाउद्दीन खिलजी के पहली बार प्राचीन विश्वनाथ मंदिर को ध्वस्त करने के बाद ही हो चुकी थी मगर औरंगजेब ने पुनः इस मंदिर पर, जिसका जीर्णोद्धार अकबर के नवरत्नो मे एक राजा टोडरमल ने कराया था, जब हमला करते हुए उसके ध्वंसावशेष पर मस्जिद बना दी तब काशीवासी चेते और उन्होंने मंदिरो को छिपाना शुरू कर दिया ताकि खुद को शांति और भाई चारे के मसीहा का दावा करने वालो की नजरो से वे बचे रहें। बहुतेरे सिर्फ यही जानते है कि औरंगजेब ने विश्वनाथ मंदिर ही तोड़ा था उन्हें इसकी जानकारी नही कि आदि विश्वेश्वर और पंचगंगा घाट पर स्थित बिन्दु माधव मंदिर भी उस मुगल हमलावर के शिकार बने थे।

किसी ने भी मोदी जी को यह नहीं बताया कि इन मंदिरों के दरवाजे इतने छोटे इसलिए रखे गए थे कि एक साथ दो लोग भी अंदर घुस न सके। यही नहीं जहाँ द्वार बड़े थे उनमे सीढ़ियों की ऊँची कतार लगा दी गयी ताकि घोड़े न चढ सकें। गलियों को इस कदर घुमावदार रखा गया कि हमलावर उसी मे खो जाएँ।

मोदी जी को किसी ने यह भी नही बताया होगा कि मंदिर स्वामियो-सेवइतो ने अपने प्राणो की परवाह किए बिना सैकड़ो साल तक इन विग्रहो को आतताइयो के हाथो खंडित नही होने दिया।
कहते है न कि काशी मंदिरो का शहर है और भगवान शिव की तरह ही अजन्मी यह नगरी भी गलियों मे ही स्थित है। यदि सेवइत और मंदिरों के महंतो ने अपने आराध्यो को हमलावरों से न बचाया होता तो काशी आज मंदिरों की नही मस्जिदों की नगरी होती। 
करबद्ध प्रार्थना है मोदी जी से, जो वाराणसी के सांसद भी है, इनकी आलोचना नही बल्कि इनका अभिनंदन कीजिए, नमन कीजिए। यदि ये मंदिरों के सच्चे प्रहरी न होते तो कारिडोर बनने की आज नौबत ही नहीं आती।
काश ! आज की तरह मोदी जी ने असली काशी को बीते पांच वर्षों मे यदि एक बार भी देखा होता तो वो पाते कि प्रहलाद घाट से लेकर अस्सी तक जितने भी मंदिर है वे तंग गलियो मे घरो का सा ही अहसास कराते है।

जहाँ तक जन प्रतिनिधियों का सवाल है तो वाराणसी शहर दक्षिणी और उत्तरी के विधायक क्रमशः नीलकंठ तिवारी और रवीन्द्र जायसवाल के अलावा पूर्व विधायक श्यामदेव राय चौधरी ही इस अवसर पर आमंत्रित 51 लोगों मे शामिल थे।

लेखक - पदमपति शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार

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