देश के लिए सब कुछ कुर्बान करने वाले सिंगरौलीवासी आज बदहाल क्यों?

इस चुनाव में सिंगरौलीवासी अवसरवादी नेताओं को धूल जरूर चटाएंगे!


देमें चुनावों का बिगुल बजते ही लोकलुभावन वादों और बड़े बड़े दावों के सुरीला संगीत शुरू हो जाता है और और आजादी से लेकर आज तक जस की तस स्थिति में रही जनता इन वादों को ललचाई नजरों से देखती है और इन्ही के आधार पर झंडा उठा लेती है।

राजनीति में नए किरदार आते जाते रहते हैं लेकिन खेल वही पुराना चलता रहता है।जो आजादी से लेकर आज तक चल रहा है। हर एक दल का नेता चुनावों के समय कर्मठ,लगनशील,जुझारू और ईमानदार होता है जैसे इनके अलावा सभी बेईमान और भ्रष्ट हों। 

सभी दलों और नेताओं को अंतिम व्यक्ति की चिंता रहती है लेकिन ये चिंता सिर्फ और सिर्फ चुनावों में ही दिखती है वोट डलने के बाद ये सारी चिंताएं कल्पना मात्र रह जाती हैं,क्योंकि ये वही अंतिम व्यक्ति है जो आजादी के बाद नेहरू के समय और फिर इंदिरा गाँधी के गरीबी हटाओ नारे के समय मे भी अंतिम पायदान पर था और आज भी अंतिम पायदान से आगे नहीं बढ़ पाया। ये सिलसिला पीढ़ी दर पीढ़ी यूँ ही चलता रहा और आज भी चल ही रह है,बड़े बड़े वादे और सुनहरे सपने दिखाने वाले खादीधारी देश को किस कदर लूटते रहे हैं या ये कह लीजिए कि आज भी लूट रहे है। लेकिन जनता आज भी मात्र वोटबैंक से ज्यादा और कुछ भी नहीं !


देश के लिए सबकुछ कुर्बान करने वाले सिंगरौलीवासी आज बदहाल क्यों?

देश की उर्जाधानी "सिंगरौली परिक्षेत्र" के "उर्जान्चल" को ही ले लीजिए सिंगरौली वासियों ने लगभग सभी राजनैतिक दलों को "सरआंखों" पर बैठाया लेकिन चुनावी वादों से इतर किसी ने भी सिंगरौली के मूल वाशिन्दों, विस्थापिति, आदिवासियों, व वनवासियों  की बदहाली दूर करने के लिए कोई प्रयास ही नही किया और न उनकी सुधि ली।
शायद यही वजह है कि अपनी आन -बान -शान और योगदान,पानीदारी,उदार सहृदय,निष्कपट, निश्चल स्वभाव, भोलेपन,के लिए प्रसिद्ध सिंगरौलीवासी पिछले 6 दशकों में देश के विकास के नाम पर अपने जीविका के सभी स्रोतों को हंसते -हंसते देश के नाम कुर्बान कर देश के विकास में अपना सब कुछ न्योछावर कर देनेवाला सिंगरौलीवासी देश के विकास के साथ अपना भी विकास का दिखाए गए सपनो को संजोए अपना सब कुछ गवा देने के बाद खुद हंसी और उपहास का पात्र बन,उर्जान्चल में दोहरी नागरिकता जिने को विवश कर दिया गया है।

जो कल सिंगरौली के खुद मालिक हुवा करते थे, वही आज फटेहाल-बदहाल जीविका चलाने के लिए एक अदद नॉकरी की तलास में दर - दर भटकते और अपनी ही ,"जन्मभूमि" पर स्थित दुसरो के चौखट पर दो जून की रोटी के तलाश और जुगाड़ में गिड़गिड़ाते अक्सर देखे जा सकते है। 

इस चुनाव में सिंगरौलीवासी अवसरवादी नेताओं को धूल जरूर चटाएंगे!

"श्रृंगीऋषि" की तपोभूमि "श्रीगावली से सिंगरौली","सिंगरौली से उर्जान्चल", "उर्जान्चल से मिनी भारत", "मिनी भारत से देश की "ऊर्जा राजधानी" तो बन गयी लेकिन सिंगरौली वासियों के इस सफर को तय करने में दिए गए महत्वपूर्ण योगदान को देश की ऊर्जाधानी,आज उस,"सिंगरौली" को ही भूल गई। इस योगदान के लिए जिनका सम्मान होना चाहिए था जिसके वे जायज हकदार थे,लेकिन आज उल्टे उनके साथ नाजायज ढंग से उनका उपहास हो रहा है, जो उन्हें उनकी "हड्डी पर कबड्डी" खेलने जैसे टीस के साथ -साथ उनके सीने में पल -पल चुभन वाले दर्द का एहसास करता है।

जिसके लिए सबसे बड़े जिम्मेदार है यहाँ के राज नेता जो फिर तरह- तरह का सब्ज बाग दिखा एक बार फिर उन्हें छलने "टर्र -टर्र" करते उनके चौखट पर पहुच रहे है, जो चुनाव खत्म होते ही 5 साल के लिए पूर्व की भांति फिर एक बार "फुर्र" हो जाएंगे।इस तरह "सिंगरौली परिक्षत्र" आज भी अपनी वेरोजगरी, बदहाली और दुर्दशा - उपेक्षा व अपमान, पर रोने को मजबूर है।

बदहाल, फटेहाल, बेरोजगार, विस्थापिति, रोजगार की तलास में दर-दर भटकते "सिंगरौली परिक्षेत्र" के उपेक्षित मुलवासिंदे इस बार किस पर अपना भरोसा जताते हैं ये तो चुनावी नतीजे ही बताएंगे,लेकिन इतना तो तय है कि इस चुनाव में "सिंगरौली परिक्षेत्र" के "उर्जान्चल वासी" अवसरवादी नेताओं को धूल जरूर चटाएंगे! 
के.सी.शर्मा 
(पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्त्ता)

Post a Comment

MKRdezign

Contact Form

Name

Email *

Message *

Powered by Blogger.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget