विंध्य के "राहुल भईया" की चुनौती भाजपा नहीं,राजनितिक विरासत बचाने की है !


ब्दुल रशीद
मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव 2018 में कांग्रेस के वापसी की चर्चा के बाद सबसे ज्यादा चर्चा अजय सिंह 'राहुल भईया' के चुरहट विधानसभा से हारने की रही, क्योंकि मध्यप्रदेश की राजनीति में चाणक्य कहे जाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय अर्जुन सिंह के परिवार का इस क्षेत्र में राजनितिक वर्चस्व रहा है, लेकिन कहते हैं न राजनीति में परिस्थिति कब करवट बदल ले कुछ तय नहीं होता।
मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के पुत्र अजय सिंह सीधी-सिंगरौली लोकसभा सीट से कांग्रेस के उम्मीदवार हैं।बीते विधानसभा चुनाव में अजय सिंह को अपने  पैतृक सीट चुरहट में ही पराजय का कड़वा स्वाद चखना पड़ा था। ऐसे में लोकसभा चुनाव में अजय सिंह को जीत हासिल करना उनके लिए प्रतिष्ठा प्रश्न है?

प्रदेश की सत्ता जाने के बाद भी विंध्य में भाजपा मजबूत 

मध्यप्रदेश का विंध्य क्षेत्र पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के कर्मभूमि के रूप में जाना जाता है,जिन्हें दाऊ साहेब के नाम से भी पुकारा जाता हैं। विंध्य क्षेत्र में सीधी, सतना, रीवा और शहडोल लोकसभा सीट आती है।इस क्षेत्र में हमेशा से ही सिंह के परिवार का वर्चस्व रहा है। लेकिन अब वर्चस्व कम हुआ है,यही वजह है की विंध्यक्षेत्र के 30 विधानसभा में से 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को महज़ 06 सीट से संतोष करना पड़ा, जबकि प्रदेश की सत्ता जाने के बाद भी 24 सीटें भाजपा के खाते में आई थीं।

अर्जुन सिंह निर्दलीय जीतने के बाद हुए कांग्रेस में शामिल 

वर्ष 1952 में तत्कालीन विंध्य प्रदेश के चुरहट में जवाहरलाल नेहरू चुनाव प्रचार के लिए पहुंचे थे,जहां मंच से उनके द्वारा अर्जुन सिंह के पिता राव शिवबहादुर सिंह को विधानसभा चुनाव का प्रत्याशी घोषित किया गया। किंतु चुरहट से रीवा पहुंचने के बाद जवाहर लाल नेहरू ने फिर घोषणा कर दिया  कि चुरहट से मेरे पार्टी का कोई प्रत्याशी नहीं है उसके बाद भी राव शिवबहादुर सिंह निर्दलीय प्रत्याशी बतौर चुनाव लड़े किंतु वे चुनाव जीत नहीं पाए।वर्ष 1957 में अर्जुन सिंह कांग्रेस का टिकट लेने से मना कर दिए,और अपने पिता की तरह बतौर निर्दलीय प्रत्याशी चुरहट विधानसभा चुनाव में उतरे और विधायक निर्वाचित हुए।इसके बाद वे कांग्रेस में शामिल हुए।

सतना से लड़ना चाहते थे अजय सिंह 

अर्जुन सिंह  1991 में सतना लोकसभा का चुनाव लड़कर संसद पहुंचे। पिता अर्जुन सिंह के केंद्र की राजनीति में जाने के बाद "अजय सिंह राहुल भईया" इस सीट से चुनाव लड़ते रहे और जीतते भी रहे। चुरहट उपचुनाव में पहली बार 1985 में विधायक बने। फिर 1990, 1998, 2003, 2008, 2013 में विधायक चुने गए। साल 2018 विधानसभा चुनाव में उन्हें चुरहट में भाजपा के शरतेंदु तिवारी के हाथों हार का सामना करना पड़ा। लोकसभा चुनाव वे सतना से लड़ना चाहते थे, लेकिन पार्टी ने सीधी-सिंगरौली लोकसभा से उम्मीदवार बनाया है।

भाजपा कार्यकर्ता नाराजगी के बाद भी एकजुट रहते हैं  

सीधी में अजय सिंह का मुकाबला भाजपा सांसद ​रीति पाठक से है। इस बार भाजपा  प्रत्याशी की स्थिति उतनी मज़बूत नहीं है।क्योंकि उनके नाम की घोषणा के बाद इस्तिफ़ा का दौर शुरू हो गया था,जो बाद में नाटकीय अंदाज में ख़त्म हुआ और सब कुछ ठीक होने का प्रदर्शन भी किया गया।जानकारों का मानना है पार्टी के भीतर ही उनके खिलाफ अभी भी असंतोष का माहौल है।यह सच है की,संसद में भाजपा सांसद ​रीति पाठक की  उपस्थिति बेहतर रही है लेकिन अपने पांच साल के कार्यकाल में सीधी-सिंगरौली जिले को जोड़ने वाले सड़क मार्ग पर विकास के दो अक्षर भी लिख नहीं सकी। चुनावी प्रचार में कहती हैं के मेरे काम जनता के सामने है और वोट प्रधानमंत्री और उनके योजनाओं के नाम पर मांग रहीं हैं। कार्यकर्ताओं में नाराजगी है और ऐसी नाराजगी विधानसभा चुनाव2018 में भी था लेकिन परिणाम जो परिणाम आया उससे सभी कयास को विराम लग गया,आलोचक भी कहने लगें की भाजपा में सतही बातें चुनाव के दौरान चर्चा का विषय जरुर बनी लेकिन अंदरखाने में सब ठीक था।

एम पी अजब है एम पी  गजब है जैसा  है विंध्य क्षेत्र का सियासी मिजाज 

विंध्य क्षेत्र का सियासी मिजाज मध्य प्रदेश पर्यटन के लिए प्रयोग किये  जाने वाले नारे एम पी अजब है एम पी  गजब है  की तरह ही है। सत्ताधारियों के बजाय विपक्ष को ज्यादा जनता का आशीर्वाद प्राप्त होता रहा है। विंध्य क्षेत्र के पिछड़ने का एक कारण यह भी रहा है।2018 में जब कांग्रेस का बनवास ख़त्म हुआ तब विंध्य के 30 विधानसभा सीटों में से न केवल 6 सीटें हासिल हुई बल्किविंध्य क्षेत्र की राजनीति में अजेय कहे जाने वाले अजय सिंह को हार का सामना करना पड़ा। अजय सिंह के राजनितिक कद का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है की यदि वे विजयश्री प्राप्त कर लेते तो मध्यप्रदेश की राजनीती में मुख्यमंत्री के बाद उनका ही नाम होता।

इस बार गड़बड़ हुई तो हम लोग कहीं के नहीं रहेंगे

भाजपा में विरोध के बावजूद वोट में बिखराव नहीं होता है,लेकिन कांग्रेस में भीतरघात कोई नई बात नहीं। ऐसे में अजय सिंह के लिए यह चुनाव बेहद चुनौतीपूर्ण है।इसलिए शायद एक पराजय के बाद मध्यप्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह को सिंगरौली में अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहना पडा कि 'इस बार गड़बड़ हुई तो हम लोग कहीं के नहीं रहेंगे

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