श्राप देने वाली साध्‍वी,दिग्विजय के लिये भाजपा की चैलेंजर या मात्र फेस सेवर

स्‍पष्‍ट है कि इतनी लंबी खोज के बाद भी भाजपा तथा संघ मिल कर दिग्विजय सिंह की टक्‍कर का नेता नहीं ढूंढ पाये.


स्‍पष्‍ट है कि इतनी लंबी खोज के बाद भी भाजपा तथा संघ मिल कर दिग्विजय सिंह की टक्‍कर का नेता नहीं ढूंढ पाये. 
     मोकर्रम खान
भोपाल लोकसभा सीट पर कांग्रेस प्रत्‍याशी घोषित होते ही दिग्विजय सिंह लगभग 25 दिनों से फुल एक्‍शन मोड पर हैं. इन 25 दिनों में भाजपा तथा संघ केवल यही मंथन करते रहे कि दिग्विजय को टक्‍कर देने के लिये किसे मैदान में उतारा जाय. यद्यपि दिग्विजय के नाम की घोषणा होने के पहले तक भाजपा भोपाल को सबसे सुरक्षित सीट मान कर चल रही थी क्‍योंकि यह सीट पिछले 30 सालों से भाजपा के कब्‍जे में है. यह सीट इतनी सुरक्षित मानी जा रही थी कि लोकप्रियता के ग्राफ में निरंतर गिरावट झेल रहे नरेंद्र मोदी को भी भोपाल से चुनाव लड़ने का सुझाव दिया जा रहा था, काफी संभावना थी कि मोदी भोपाल से ही चुनाव लड़ते.परंतु दिग्विजय सिंह के नाम की घोषणा होते ही परिस्थितियां एक दम पलट गईं. 

भाजपा तथा संघ मिल कर प्रत्‍याशी ढूंढने में लग गये. पहले बड़े नेताओं जिनमें पूर्व मुख्‍य मंत्री तथा वर्तमान केंद्रीय मंत्री उमा भारती, 13 वर्षों तक निष्‍कंटक राज किये शिवराज सिंह, केंद्रीय मंत्री नरेंद्र तोमर तथा प्रभात झा आदि को कहा गया किंतु इनमें से कोई भी भोपाल के चुनावी समर में उतरने को तैयार नहीं हुआ. फिर विष्‍णुदत्‍त शर्मा, वर्तमान सांसद आलोक संजर तथा भोपाल के महापौर आलोक शर्मा के नामों पर विचार मंथन हुआ किंतु इनकी जीत का भरोसा न तो भाजपा को था, न ही संघ को. इस बीच भाजपा के कुछ नेता यह डींग अवश्‍य मारते रहे कि दिग्विजय को तो कोई भी हरा देगा किंतु अंदर ही अंदर व्‍याकुलता बढ़ती रही और मामला संघ मुख्‍यालय नागपुर तक पहुंच गया. भाजपा द्वारा प्रत्‍याशी की घोषणा में हो रहे असाधारण विलंब के कारण पार्टी की काफी किरकिरी हुई. जनता में यह संदेश जाने लगा कि दिग्विजय के सामने भाजपा असहाय की स्थिति में है. इस बात की चर्चा देश के अन्‍य भागों में भी होने लगी तथा भाजपा की कमजोरी राष्‍ट्रीय स्‍तर पर उजागर होने लगी. 

इन परिस्थितियों के प्रभाव को कम करने के लिये अकस्‍मात साध्‍वी प्रज्ञा का नाम उछाल दिया गया,वह भी बड़े नाटकीय ढंग से. पहले साध्‍वी प्रज्ञा को भाजपा की सदस्‍यता दिलाई गई फिर मात्र कुछ घंटों के अंदर उन्‍हें भोपाल से लोकसभा प्रत्‍याशी घोषित कर दिया गया. राजनीति में शायद ही कोई ऐसा उदाहरण हो कि जो व्‍यक्ति कभी किसी राजनीतिक दल का सदस्‍य भी नहीं रहा, उसे सीधे चुनावी रण भूमि में उतार दिया गया वह भी‍ दिग्विजय सिंह जैसे कद्दावर नेता के सामने जो कांग्रेस जैसी विशाल पार्टी के नीति नियामकों में से एक हैं. इससे स्‍पष्‍ट है कि इतनी लंबी खोज के बाद भी भाजपा तथा संघ मिल कर दिग्विजय सिंह की टक्‍कर का नेता नहीं ढूंढ पाये. 

पार्टी की लाज बचाने के लिये एक ऐसी महिला को राजनीति में धकेल दिया जिसने अपनी तरुणाई के 9 महत्‍वपूर्ण वर्ष जेल में बिताये हैं तथा अभी तक उस सदमें से उबर नहीं पाई हैं. 

साध्‍वी ने आते ही अपनी राजनीतिक ज्ञानशून्‍यता का परिचय देना प्रारंभ कर दिया. पहले दिग्विजय सिंह को कोसती रहीं फिर शहीद हेमंत करकरे के लिसे अपशब्‍द कहने शुरू कर दिये तथा कहा कि वह उन के (साध्‍वी के) श्राप से आतंकवादियों द्वारा मारे गये. इस पर आईपीएस एसोसियेशन ने कड़ा एतराज जताया. साध्‍वी के इन बयानों की राष्‍ट्रीय स्‍तर पर इतनी कड़ी प्रतिक्रिया हुई कि भाजपा जिसने साध्‍वी को दिग्विजय सिंह के विरुद्ध अमोघ अस्‍त्र के रूप में प्रस्‍तुत किया था, ने भी उनके बयानों से पल्‍ला झाड़ लिया. साध्‍वी अलग थलग पड़ गईं, दबाव बढ़ते देख अपने शब्‍द वापस लिये तथा क्षमायाचना की. 

दिग्विजय सिंह ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान मतदाताओं को अपना विज़न दिखाया है,भोपाल के विकास के लिये कई अहम वायदे किये हैं. दूसरी ओर साध्‍वी प्रज्ञा फिलहाल केवल आंसू बहा कर जनता की सहानुभूति बटोरने का प्रयास कर रही हैं. वह युवावस्‍था में 9 साल जेल में रहीं. जेल में रहना ही एक बड़ी यातना है. यदि वे इतने लंबे समय तक निरपराध जेल में रहीं तो उनसे सहानुभूति होनी ही चाहिये किंतु अभी वह बाइज्‍जत बरी नहीं हुई हैं, केवल जमानत पर जेल से बाहर हैं, वह भी कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के आधार पर. 

आज साध्‍वी प्रज्ञा जेल में 9 सालों में अपने ऊपर हुये ज़ुल्‍मों का हिसाब मांग रही हैं किंतु इस अवधि में तो शिवराज सिंह मध्‍य प्रदेश के मुख्‍यमंत्री रहे तथा पिछले 5 सालों से नरेंद्र मोदी देश के प्रधान मंत्री हैं (इन्‍हीं दो नेताओं के कंधों पर साध्‍वी को चुनाव जिताने की जिम्‍मेदारी है) फिर साध्‍वी पर अत्‍याचार करने का दुस्‍साहस किसने किया और किस के इशारों पर. एक प्रश्‍न यह भी है कि साध्‍वी के श्राप तथा आंसू क्‍या इतने वोट कबाड़ पायेंगे कि वह दिग्विजय सिंह जैसे हैवीवेट नेता की राह मुश्किल कर सकें.

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