LOKSABHA ELECTION 2019- सबसे बड़ा नुकसान चुनाव आयोग की साख को हुआ है।


राहुल लाल
लोकसभा चुनावों के मतगणना से महज पहले ईवीएम से कथित छेड़छाड़ की खबरें आने के बाद मंगलवार को राजनीतिक विवाद पैदा हो गया।विपक्ष ने चुनाव आयोग से अपील की है कि वे मतगणना में पूरी पारदर्शिता बरतें।ईवीएम को कथित तौर पर इधर उधर ले जाने और इन मशीनों से छेड़छाड़ के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद विरोध प्रदर्शन होने लगे।विरोध प्रदर्शनों पर प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए कांग्रेस ने कहा कि चुनाव आयोग को देश के विभिन्न हिस्सों में स्ट्रांग रूमों से ईवीएम लाने ले जाने के शिकायतों के निदान के लिए तत्काल प्रभावी कदम उठाने चाहिए।

हालांकि चुनाव आयोग ने इस आरोप को "ओछा" और "अवांछित" करार दिया।चुनाव आयोग का कहना है कि 11 अप्रैल को शुरू और 19 मई को खत्म हुए 7 चरणों के चुनाव के लिए इस्तेमाल की गई वोटिंग मशीनें स्ट्रांगरूमों में "पूरी तरह सुरक्षित" है।

दरअसल ईवीएम विवाद को समझने के लिए चुनाव में प्रयुक्त तीन प्रकार के ईवीएम को समझना होगा।ईवीएम के तीन प्रकार हैं-प्रथम -पोलिंग में प्रयुक्त ईवीएम, द्वितीय रिजर्व में रखे गए ईवीएम और तृतीय ट्रेनिंग में प्रयुक्त ईवीएम।चुनाव आयोग का कहना है कि जो भी ईवीएम देश भर के वायरल अलग-अलग वीडियो में दिख रहे हैं,वे सभी या तो रिजर्व ईवीएम हैं या ट्रैनिंग में प्रयुक्त ईवीएम हैं।दूसरे शब्दों में चुनाव आयोग का कहना है कि ये सभी ईवीएम पोलिंग में प्रयुक्त ईवीएम नहीं हैं।जिस प्रकार ये ईवीएम कहीं किसी दुकान में लापरवाही के साथ दिख रहे हैं या कभी किसी गाड़ी में या होटल में अनधिकृत रूप से दिख रहे हैं,उससे यह तो स्पष्ट है कि इन अप्रयुक्त ईवीएम के लिए जो मानक प्रक्रिया है,उसका पालन नहीं किया जा रहा है।इससे जनता के बीच गलत संदेश जा रहा है।यही कारण है कि आरजेडी नेता राबड़ी देवी ,पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती,आम आदमी पार्टी नेता संजय सिंह समेत कई विपक्षी दलों ने ईवीएम और उसकी सुरक्षा पर सवाल उठाए हैं।इस बीच जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने भी ईवीएम पर आशंका जताते हुए कहा कि ईवीएम से छेड़छाड़ एक और बालाकोट जैसा है।यही नहीं वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने भी सवाल खड़े करते हुए कहा कि ईवीएम में छेड़छाड़ की नहीं बल्कि अदला बदली की आशंका है।

इस पूरे विवाद में दखल देते हुए पूर्व राष्ट्रपति भारत रत्न प्रणव मुखर्जी ने ईवीएम संबंधी विवाद को लेकर मतदाताओं के फैसले से कथित छेड़छाड़ पर चिंता जताई और कहा कि संस्थागत सत्यनिष्ठा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी चुनाव आयोग पर है और उसे सभी अटकलों पर विराम लगाना चाहिए।मुखर्जी ने यह भी कहा कि भारतीय लोकतंत्र के मूल आधार को चुनौती देने वाली किसी भी अटकल के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए।उन्होंने ट्वीटर हैंडल पर जारी एक बयान में कहा -"मैं मतदाताओं के फैसले से कथित छेड़छाड़ की खबरों पर चिंतित हूँ।आयोग की देखरेख में मौजूद इन ईवीएम की सुरक्षा की जिम्मेदारी आयोग की है"।मुखर्जी ने कहा कि जनादेश अत्यंत पवित्र होता है और इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं होना चाहिए।"

दूसरी ओर राजनीतिक पार्टियों ने अपने नेताओं, उम्मीदवारों और कार्यकर्ताओं को सभी जिलों में उन जगहों पर चौकस रहने का निर्देश दिया है,जहाँ चुनाव में इस्तेमाल की गई ईवीएम रखी है।कांग्रेस, द्रमुक, तेदेपा और बसपा सहित 22 विपक्षी पार्टियों के नेताओं ने दिल्ली में चुनाव आयोग से मुलाकात की और एक ज्ञापन सौंपकर मांग की कि वोटों की गिनती से पहले औचक तरीकों से चुने गए 5 मतदान केंद्रों की वीवीपैट पर्चियों का सत्यापन कराया जाए।उन्होंने यह भी मांग की कि यदि वीवीपैट के सत्यापन के दौरान कोई विसंगति पाई जाती है,तो उस विधानसभा क्षेत्र के सभी मतदान केंद्रों की वीवीपैट पर्चियों की 100 फीसदी गिनती की जाएँ और उसकी तुलना ईवीएम के नतीजों से की जाएँ।तेलुगूदेशम के प्रमुख एन चंद्र बाबू नायडू ने कहा"हम चुनाव आयोग से कह रहे हैं कि वह जनादेश का सम्मान करें,इसमें हेराफेरी नहीं होनी चाहिए।"

इस संपूर्ण चुनाव में "चुनाव आयोग" को जिस उच्चतर पारदर्शिता को प्रतिबिंबित करना चाहिए, वह चुनाव आयोग नहीं कर पा रहा है।न्याय और पारदर्शिता केवल होना ही पर्याप्त नहीं है,बल्कि उससे ज्यादा महत्वपूर्ण उसका प्रभावी रुप से प्रकटीकरण भी है।चुनाव आयोग को इस संपूर्ण विवाद के निपटारे के लिए वीवीपैट के पर्चियों से मिलान के लिए विस्तृत व्यवस्था करनी चाहिए।जब देश 7 चरण के अब तक के सबसे विस्तृत चुनाव प्रक्रिया में भाग ले सकता है,तो वह लंबे मतगणना प्रक्रिया में भी भाग ले सकता है।

वैसे भी 10 मार्च से जब देश में आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू हुई,उसका समुचित रुप से क्रियान्वयन इस बार चुनाव आयोग नहीं करा पाया है।भारतीय संविधान का अनुच्छेद -324 चुनाव आयोग को चुनाव कराने के लिए अनन्य शक्तियाँ प्रदान करता है।इन चुनावों में सत्ता पक्ष और विपक्ष सभी राजनीतिक दलों के वरिष्ठ नेताओं ने खुलेआम आचार संहिता का उल्लंघन किया,वह पिछले हाल के दशकों में कभी परिलक्षित नहीं हुआ था।चुनाव के दौरान चाहे भड़काऊ बयान हो या धर्म अथवा जातिगत टिप्पणियां, इन सभी मामलों में चुनाव आयोग केवल नोटिस जारी कर अपनी भूमिका समाप्त कर गया।कुछ मामलों में सुप्रीम कोर्ट के दबाव में चुनाव आयोग ने कुछ राजनीतिक दलों के नेताओं पर कुछ घंटे के चुनाव प्रचार का प्रतिबंध लगाया।परंतु यह पर्याप्त नहीं रहा,क्योंकि इसके बाद भी चुनाव के आदर्श आचार संहिता को तोड़ने वाले बयान राजनीतिक दलों के तरफ से आते रहे। 1987 में स्वर्गीय बाला साहब ठाकरे का एक भड़काऊ बयान का मामला पहले मुंबई हाई कोर्ट पहुँचा,फिर सुप्रीम कोर्ट पहुँचा।तब सुप्रीम कोर्ट ने 1999 में भी बाल ठाकरे पर न केवल चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाया,अपितु उनके मताधिकार को भी कुछ वर्षों के लिए समाप्त कर दिया।तब भी सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से कहा था कि संविधान का अनुच्छेद -324 चुनाव आयोग को अनन्य शक्तियाँ प्रदान करता है।सुप्रीम कोर्ट ने इसी अनुच्छेद के अंतर्गत बाल ठाकरे पर यह कठोर कार्यवाई की।इस बार भी सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयोग को उसकी शक्तियों के बारे में बताना पड़ा।स्पष्ट है कि चुनाव आयोग आदर्श चुनाव आचार संहिता के पालन करवाने में मूकदर्शक ही साबित हुआ।अगर वह सक्रिय रहता,और प्रारंभ में कुछ कठोर कार्यवाई करता,तो आदर्श चुनाव आचार संहिता का पालन सभी राजनीतिक दल गंभीरता से करते।



इस संपूर्ण चुनाव प्रक्रिया के दौरान नमो टीवी का मामला भी छाया रहा।नमो टीवी को लेकर चुनाव आयोग ने कई दिशा निर्देश भी दिएँ,लेकिन नमो टीवी का प्रसारण आखिरी चरण के चुनाव प्रचार के बाद ही बंद हुआ। 2007 और 2012 में भी गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान इस प्रकार के टीवी चैनल को प्रारंभ करने के प्रयास हुए थे,तब तो चुनाव आयोग ने इसे बंद करा दिया था,परंतु इस बार 7 वें चरण के चुनाव प्रचार तक नमो टीवी सक्रिय रहा।

इसी तरह प्रथम चरण से आखिरी चरण तक पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा जारी रही।ज्ञात हो 10 मार्च को आदर्श चुनाव आचार संहिता जारी होने के बाद केंद्र और राज्य सरकार केवल "केयरटेकर सरकार " के रुप में काम करती है,प्रशासन के संचालन की वास्तविक जिम्मेदारी चुनाव आयोग पर होती है।ऐसे में पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा को रोकने की जिम्मेदारी भी केवल चुनाव आयोग की थी,जिसे रोकने में चुनाव आयोग विफल रहा।

लोकतंत्र के इस महोत्सव में जनता ने जहाँ सक्रियता और उत्साह के साथ भाग लिया,वहीं चुनाव आयोग के तरफ से लापरवाहियों की पूरी श्रृंखला नजर आई।टीएन शेषन के बाद से जिस तरह से चुनाव आयोग नित नए प्रतिमान बना रहा था,वह इस बार नहीं दिखा।इस बार चुनाव आयोग या तो अपनी मूकदर्शक भूमिका अथवा अपने आंतरिक मतभेदों के कारण चर्चा में रहा।भारतीय लोकतंत्र को गतिमान बनाने में चुनाव आयोग की अति महत्वपूर्ण भूमिका है।ऐसे में चुनाव आयोग से देश को यही उम्मीद है कि वह अपने संवैधानिक संस्था के गरिमा को बनाएँ रखे।
लेखक - वर्ष 2002 से राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय मामलों पर सतत लेखन कर रहें हैं,आपका लेख भारत के लगभग सभी प्रमुख अखबारों में छपता रहा है,टीवी डिबेट बतौर एक्सपर्ट अपना पक्ष बेबाकी से रखते हैं।

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