"मां" के पास बेटा बनकर बैठिए तो सही !

मां



अब्दुल रशीद
अपने कोख़ में नौ महीने गढ़ना,फिर असीम पीड़ा को सहकर दुनियां में लाना और देख कर मुस्कुराना । आंचल में छुपाकर अपने लहू को निचोड़ कर दूध पिलाना।लड़खड़ाते कदमों को उंगलियों के सहारे चलना सिखाना। और तोतली आवाज़ की फ़रमाइश पर आंचल की गांठ खोलकर चवन्नी अठन्नी  देना। 
बच्चे बड़े हो जाते हैं,व्यापार चलने लगता है,शादी हो जाती है, बच्चे हो जाते हैं,नई गाड़ी और नया मकान में माता-पिता बने बच्चे अपना बचपन भूल जाते हैं,बस याद रहता है,बिजनेस बढ़ाने की,कामयाबी के बाद बने दोस्तों के साथ पार्टी करने की,मियां- बीवी को सैर-सपाटे की।

दोस्तों से गपशप में यह कहना कि  सोंचता हूं मां को उमरा करने भेजने की लेकिन फुर्सत नहीं,बिजनेस बहाना है। खाली वक्त तो है लेकिन कौन मां के साथ सर खपाए,बैठो तो बुढ़िया नसीहत सुना सुना कर बोर कर देती है।

तो क्या,जमाना बदल गया है,ढकोसलों का ढोंग करते करते एहसास मर चुका है। तभी तो बूढ़े मां का चिड़चिड़ापन चुभता है,उनकी दवाइयों का खर्च अखरता  है, टकटकी लगाए धुंधली आंखों से देखना परेशान करता है, की  कहीं कुछ फ़रमाइश न कर दे। 

जमाना नहीं बदला, तुम बदल गए हो,कामयाबी की उड़ान, अपनी जिंदगी जीने और ढकोसलों का दिखावा करने में। क्या वाक़ई भूल जाते हो,या ढोंग करते हो, क्योंकि एहसास तो होता ही होगा,टीस तो उठता ही होगा। वो लोरी,थपकियां,परियों की कहानी, रूठ जाने पर मनपसंद खाना बनाना,और चोट लगने पर मां का झर झर आंसू बहाना ।

याद करो शायद याद आ जाए आखरी बार कब मां से बेटा बनकर बात किए हो,पास बैठे हो,कितनी बार मन हुआ लेकिन ढोंग के लिए असल को नकार दिए हो।
जिंदगी देने वाली मां को देना क्या कुछ लौटा ही नहीं पाओगे। क्योंकि तुम्हारे ख़जाने में झूठ है,फरेब है,गुस्सा है,अवसाद है, बनावटी चिड़चिड़ापन है,दिखावे का परेशानी है। 
मां को ढोंग नहीं आता,बूढी हैं,तकलीफ़ में हैं लेकिन एक बार मां के पास बेटा बनकर बैठो तो सही,बात तो करो, मुस्कुराना आ जाएगा,उसकी आंचल की छांव में तुम्हारे सारे अभाव दूर हो जाएंगे ,औए ये जो तुम नींद की गोली सोने से पहले लेते हो न मां के गोद में सर रख कर देखना दवा की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।

मदर्स डे के ही दिन क्यों,जब मन में ख्याल आए तब ही सही, मां के पास बेटा बनकर बैठिए तो सही !

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