राष्ट्रपति के अभिभाषण के महत्वाकांक्षी आर्थिक लक्ष्य और चुनौतियाँ


राहुल लाल
संसदीय शासन प्रणाली में राष्ट्रपति के अभिभाषण में सरकार की नीतिगत प्राथमिकताओं और आने वाले वर्ष की योजनाओं का अनिवार्य रुप से उल्लेख होता है।अभिभाषण सरकार के एजेंडा और दिशा का व्यापक फ्रेमवर्क प्रदान करता है।संविधान के अनुच्छेद 87 में ऐसी दो स्थितियों का उल्लेख किया गया है,जब राष्ट्रपति द्वारा विशेष रूप से संसद के दोनों सदनों का संयुक्त संबोधन किया जाएगा।प्रत्येक आम चुनाव के बाद पहले सत्र की शुरुआत होने पर,जब निचले सदन की पहली बार बैठक होगी,राष्ट्रपति द्वारा संयुक्त सत्र को संबोधित किया जाएगा।इसके अतिरिक्त प्रत्येक वर्ष के पहले सत्र की शुरुआत में भी राष्ट्रपति द्वारा दोनों सदनों को संबोधित किया जाएगा।इस दृष्टि से प्रथम स्थिति अर्थात आम चुनाव के बाद पहले सत्र में राष्ट्रपति का अभिभाषण मूलतः अगले 5 वर्षों के सरकार के एजेंडे तथा दिशा को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।यही कारण है कि 17 वीं लोकसभा के गठन के बाद संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने नए भारत के निर्माण के लिए उठाए गए कदमों की चर्चा करते हुए अगले 5 साल के अहम लक्ष्यों को भी गिनाया।

संसद को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ने गुरुवार को कहा कि केंद्र सरकार जल्द ही "इंडस्ट्री 4.0" के आधार पर नई औद्योगिक नीति की घोषणा करेगी। "इंडस्ट्री 4.0" नई उद्योग की चौथी पीढ़ी को परिलक्षित करता है;जिसमें स्वचलन और डिजिटलीकरण के बढ़ते उपयोग के चलते आए बदलावों को शामिल किया गया है।राष्ट्रपति ने कहा कि सरकार आर्थिक वृद्धि तेज करने तथा 2024 तक भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर अर्थात 5 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के लिए कृतसंकल्प है।यह एक अत्यंत चुनौतीपूर्ण लक्ष्य है।देश का जीडीपी फिलहाल करीब 2.8 लाख करोड़ डॉलर है।यानी तय लक्ष्य पाने के लिए अगले 5 वर्ष में इसमें 87% की बढ़ोतरी करनी होगी।ऐसे समय में जबकि अर्थव्यवस्था 6 फीसदी से भी कम दर से बढ़ रही है,इस तेजी को हासिल करना अत्यंत कठिन है।जनवरी से मार्च 2019 के तिमाही की बात करें तो इस अवधि में वृद्धि दर 5.8 फीसदी रही।यानी उक्त लक्ष्य को हासिल करने के लिए 12.8 फीसदी की समेकित वार्षिक वृद्धि दर हासिल करनी होगी।फिलहाल अर्थशास्त्री 8 फीसदी की वृद्धि दर को भी हासिल करना कठिन मानते हैं,ऐसे में द्विअंकीय वृद्धि दर के बिना इस लक्ष्य की पूर्ति संभव नहीं है।देश की अर्थव्यवस्था की दिक्कतों से निपटने के लिए कहीं अधिक तार्किक तौर तरीके अपनाने की आवश्यकता है।इस संदर्भ में सरकार का तात्कालिक लक्ष्य होना चाहिए, उसे मौजूदा संकट से उबरना और मध्यम अवधि में उसे स्थायित्व के साथ 8 फीसदी वार्षिक की दर से आगे ले जाना चाहिए।एक बार मौजूदा मंदी का हल निकाल लिया जाए,तो वृद्धि को भी दो अंकों में ले जाने पर विचार किया जा सकता है।इसमें दो राय नहीं है कि वृद्धि दर को भी जल्द से जल्द दो अंकों में ले जाना तात्कालिक लक्ष्य होना ही चाहिए।लेकिन इसके शुरुआत के लिए तात्कालिक कदमों को उठाने की आवश्यकता है।

वृद्धि दर में इजाफा लाने के लिए केंद्र सरकार को सहयोगी संघवाद अर्थात सभी राज्यों से व्यापक सहयोग के साथ तैयारी करनी होगी।उदाहरण के लिए पिछले कुछ समय से निर्यात की स्थिति खराब बनी हुई है।ट्रेड वार के कारण अमेरिका का बाजार छुटता चला जा रहा है,जबकि यूरोप अभी मंदी से उबरा नहीं है।ऐसे में केंद्र सरकार दक्षिण पूर्वी एशियाई देश अर्थात आसियान देशों,अफ्रीकी देशों तथा दक्षिण अमेरिकी देशों के नए बाजार को विकल्प के रूप में देख सकती है।साथ ही वहाँ के जरुरतों के अनुसार राज्यों के साथ तालमेल कर तत्संबंधी उद्योगों को प्रोत्साहित किया जा सकता है।इसी तरह वित्तीय तंत्र को निरंतर संकट का सामना करना पड़ रहा है।सरकारी बैंकों की चिंता बरकरार है और इसी बीच गैर बैकिंग वित्तीय कंपनियों की ओर से नई समस्या खड़ी हो गई है।बुनियादी ढांचागत विकास के लिए धनराशि कहाँ से आएगी, यह सवाल बरकरार है।आईएलएंडएफएस मामले के बाद जाहिर है कि एनबीएफसी यह काम करने की स्थिति में नहीं है।निजी-सार्वजनिक भागीदारी मॉडल की अपनी दिक्कतें हैं और सरकार हमेशा बुनियादी फंडिंग के लिए संसाधन नहीं जुटा सकती।निरंतर दो अंकों में वृद्धि हासिल करने के लिए बेहतर निर्यात और शिक्षित उत्पादक श्रम शक्ति की आवश्यकता है।अब तक यह हमारी प्राथमिकताओं में नहीं रहा है।इसे जल्द से जल्द हल करना होगा।इस दिशा में कदम उठाए जाने के बाद ही हम दो अंकों की वृद्धि की बात कर सकते हैं।

राष्ट्रपति के अभिभाषण में कृषि' उत्पादन केंद्रित 'के बजाए 'आय केंद्रित 'बनाने पर जोर दिया गया है।वर्ष 2022 तक कृषकों की आमदनी दोगुनी करने के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सरकार की योजनाओं पर कारगर अमल किया जाएगा।राष्ट्रपति ने कहा कि इसके लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य में डेढ़ गुना तक की वृद्धि,खाद्य प्रसंस्करण में शत प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की छूट,अधूरी सिंचाई परियोजनाओं को पूरा करने और फसल बीमा योजना को तेज किया जाएगा।कृषि क्षेत्र के ढ़ाँचागत विकास के लिए सरकार आने वाले कुछ वर्षों में 25 लाख करोड़ रूपये का निवेश करेगी।कृषि क्षेत्र पर सरकार द्वारा ध्यान देना स्वागत योग्य कदम है,परंतु मुख्य चुनौती उपरोक्त घोषणाओं को क्रियान्वित करना है। 2016-17 के बजट में सरकार ने पहली बार 2022 तक किसानों की आमदनी दुगुनी करने का लक्ष्य रखा,परंतु पिछले तीन वर्षों में इसमें कोई उल्लेखनीय सफलता नहीं मिली। 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने के लिए सुझाव देने के मकसद से केंद्र सरकार ने उच्चाधिकार प्राप्त अशोक दलवाई समिति बनाई थी।इसमें कहा गया है कि अगर सरकार किसानों की आय दुगुनी करने का लक्ष्य 2022 तक हासिल करना चाहती है,तो उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि कृषि की सलाना विकास दर 12 फीसदी या इससे अधिक रहे।कृषि विकास दर 2014 से 2019 तक औसतन 2.7% रहा है।स्पष्ट है कि इस गति से लक्ष्य को प्राप्त नहीं किया जा सकता।अशोक दलवाई समिति ने कृषि क्षेत्र में आय में वृद्धि के लिए भारी निवेश की बात की थी।इस संदर्भ में राष्ट्रपति के अभिभाषण में कृषि के ढ़ाँचागत विकास के लिए 25 लाख करोड़ निवेश की बात महत्वपूर्ण है,परंतु मुख्य प्रश्न यह है कि निवेश की यह भारी राशि कहाँ से आएगी?

राष्ट्रपति ने अभिभाषण में कहा कि सरकार ने 50 करोड़ गरीबों को "स्वास्थ्य सुरक्षा कवच" प्रदान करने वाली विश्व की सबसे बड़ी हेल्थ केयर स्कीम "आयुष्मान भारत योजना" लागू की गई।लेकिन बिहार में चमकी बुखार से भारी संख्या में बच्चों की मौतों से स्पष्ट है कि केवल बीमा संबंधित योजनाओं से स्वास्थ्य की स्थिति नहीं सुधरने वाली है,जब तक की स्वास्थ्य क्षेत्र के मूलभूत ढ़ाँचे को मजबूत नहीं किया जाए।देश इस समय डॉक्टरों एवं स्वास्थ्य कर्मियों की भारी कमी से जूझ रहा है।देश में फिलहाल 11,802 की आबादी पर एक डॉक्टर है,जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के वैश्विक मानकों के अनुसार प्रति एक हजार की आबादी पर एक डॉक्टर होना चाहिए।वहीं बिहार में स्थिति और भी गंभीर है।वहाँ 30 हजार की आबादी पर एक डॉक्टर है।ऐसे में स्वास्थ्य क्षेत्र का बजट जीडीपी का कम से कम 6% होना चाहिए, जो वर्तमान में केवल 1 से 1.5% तक ही सीमित है।

राष्ट्रपति के अभिभाषण में यह भी कहा गया है कि हर घर तक नल से पानी पहुँचाना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता में है।यह लक्ष्य भी बेहद चुनौती पूर्ण है।वर्तमान में देश के केवल 18% घरों तक ही नल जल की सुविधा सीमित है।वर्तमान में चैन्नई जैसे महानगर भी पानी के गंभीर संकट से जूझ रहे हैं।स्थिति यह है कि कई आईटी सेक्टर कंपनियों और स्कूलों को जल संकट के कारण बंद करना पड़ा है।इससे तरह हम लोग पा रहे हैं कि देश के 18% तक घर जहाँ नल है,वहाँ भी जल नहीं है।स्पष्ट है कि प्रत्येक घर में नल जल के लिए संपूर्ण देश में सुव्यवस्थित व्यापक जल प्रबंधन की आवश्यकता है।

उत्पादन क्षेत्र अब भी उपेक्षित है।वित्त विर्ष 2018-19 में जीडीपी में इसकी हिस्सेदारी 18.2% थी,जो 2013-14 के अंत में 17.2 % थी। 5 साल में महज 1% की वृद्धि से पता चलता है कि अगर भारत को चीन,अमेरिका,जापान, दक्षिण कोरिया जैसे देशों के साथ प्रतिस्पर्धा में खड़ा होना है,तो जीडीपी में उत्पादन की हिस्सेदारी को 2022 तक 25% तक पहुँचाना होगा।इसी स्थिति में देश में युवाओं के लिए पर्याप्त रोजगार का सृजन हो सकेगा।

राष्ट्रपति के अभिभाषण में घोषित महत्वाकांक्षी लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए भारत को त्वरित तौर पर 9% से अधिक वृद्धि दर पर ले जाने के लिए साहसिक और आक्रामक उपायों की त्वरित आवश्यकता है।प्रधानमंत्री को अब मजबूत और स्थिर सरकार का जनादेश मिला है।इसलिए निर्णायक और प्रभावी कदम की उम्मीद की जानी चाहिए।

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