महान परियोजना बरगवां: पूनर्वास बस्ती "मझिगवां" अपने दुर्दशा पर बहा रही है "आंसू"

फोटो:उर्जांचल टाइगर 

सिंगरौली।।म.प्र.के सिंगरौली जिले में बिड़ला घराने की बरगवां में महान परियोजना स्थापित है।यह परियोजना बिजली और आल्युमिनियम उत्पादन कर रही है। इस परियोजना से कई गांवों के हजारो लोगो विस्थापित किये गए है।जिन्हें मझगवां में पूर्वास स्थल पर बसाया गया है। लेकीन महान परियोजना काम मानवता को शर्मसार करने वाला महा निकृष्ट है।

विस्थापितो की दुर्दशा और परियोजना प्रबंधन द्वारा किये जारहे उपेक्षात्मक व्यहार तथा इनकी बदहाल स्थिति पर एक दैनिक अखबार द्वारा विगत एक सप्ताह से इनके दुर्दशा व बदहाली पर चलाये जा रहे खबरों को पढ़ के देश की एक बड़े विस्थापित संगठन "उद्वासित किसान मजदूर परिषद" ने निर्णय लिया कि संगठन का एक प्रतिनिधि मंडल पुनर्वास स्थल और विस्थापितो के बीच जाकर "हकीकत' की जानकारी ले।

"उद्वासित किसान मजदूर परिषद" के राष्ट्रीय अध्यक्ष के सी शर्मा ने संगठन के प्रतिनिधि मंडल और कुछ पत्रकार साथियो के साथ पुनर्वास स्थल का दौरा किया और ओडगड़ी में महान विस्थापित एवं श्रमिक संघ द्वारा आयोजित एक बैठक में शिरकत करते हुए परियोजना के विस्थापितो की "हकीकत" उनकी जुबानी,सुनी और जानी तो "आँखे' खुली की खुली रह गयी।चौकाने वाली "हकीकत" सामने आई।

"मझगवां पुनर्वास बस्ती" अपने दुर्दशा पर "आंसू" बहा ,कह रही है अपने उपेक्षा और बदहाली की कहानी!

बिड़ला ग्रुप की सिंगरौली जिले की महान परियोजना के विस्थापितो की पूर्वास बस्ती मझगवां में पहुचते ही उसकी बदहाली और दुर्दशा अपने आप एक झलक में ही देखने को मिल जाती है।जो सभी तरह की मूलभूत सुविधाओं के अभाव में अपने दुर्दशा और बदहाली की आँसू बहाती अपनी कहानी बयां कर रही है। टापू नुमा पहाड़ी पर बसाई गयी इस बस्ती के रिहायशी आवासों की स्थिति अत्यंत दयनीय है।मकानों की स्थिति इतनी जर्जर है होगयी है कि वह कब धराशायी हो जाये कहा नही जासकता? मकानों के छत इस वर्षात में पूरीतरह टपक रहे है जो रहने लायक नही रह गए है।पानी की इतनी किल्लत है कि उन्हें दैनिक जरूरत तक के लिए भी नही मिल पा रहा है।
फोटो:उर्जांचल टाइगर 
कई कई दिनों तक टैंकर जलापूर्ति करने भी नही पहुचता है।स्थायी कालोनी में पीने के पानी की व्यवस्था वर्षो बाद भी कम्पनी नही कर सकी है।विजली,शिक्षा, चिकित्सा की तो बात ही करने लायक नही है। जिन भूस्वामियों की जमीन कौड़ी के भाव लेकर बिड़ला जी ने अपना उद्योग स्थापित कर करोड़ो का हर महीने मुनाफा कमा रहे है और वही अपने अधिकारियों, कर्मचारियों के निवास करने के लिए आधुनिक सुविधाओं से युक्त पर्यावरणीय बातावरण से आच्छादित कालोनी बनाई है।जो साफ सफाई की उत्तम व्यवस्था तथा 24 घण्टे बिजली की उपलब्धता सहित उच्चकोटि की शिक्षा,चिकित्सा की व्यवस्था अपने परिसर में कर रखी है।जिसे देख अपनी ज़मीन से बेघर हुए विस्थापितो को अपने सीने में रह रह के टीस उभरती रहती है।

उन्हें अपने जमीन से बेघर करते समय बिड़ला प्रवंधन ने बडे बडे सुनहरे भविष्य के सब्ज बाग दिखाये गए थे। उन्हें पहले से बेहतर जिंदगी मिलेगी और लग रहे उद्योग मे नॉकरी ,रोजगार मिलेगा, बेहतरीन पुनर्वास किया जायेगा।

लेकिन अब वे अपने को ठगा महसूस कर रहे है।उन्हें लगता है उनको झूठे सुनहरे सब्ज बाग दिखा कोरा आश्वासन दे धोखा दिया गया है।इसी लिए इस वर्षात में टपकती छत जहा उन्हें अपना सर छिपाने की समस्या बनी हुई है, वही उसी के बगल जगमगाती परियोजना की रिहायशी कालोनी व 24 सो घण्टे गड़गड़ाती मशीनों की आवाज और जहरीला धुवा निकालती चिमनियों को देख,उन्हें लगता है जैसे उनके सीने पर कोई "मूंग की दाल" दल रहा है का पल पल यहसास करता है और उन्हें लगता है जैसे उनकी "हड्डी पर कबड्डी" खेली जा रही है। 

कल जिस जमीन के वे मालिक थे आज उसीसे बेदखल हो कर खानाबदोसो से बदतर बदहाल जिंदगी जीने के लिए विवस कर दिये गए है।उनके हिस्से में मिला है जहरीला धुवा रूपी प्रदूषण, बेगारी, दर दर रोजगार के लिए भटकते इनके युवा पल- पल अपमान का घुट पीते दोहरी नागरिकता की जैसी जिंदगी जी रहे है।जिसके चलते अनेको बीमारियों से ग्रसित भी हो चुके है।

ओडगड़ी में हुई विस्थापितों के साथ बैठक!

ओडगड़ी गांव जो परियोजना की चाहर दिवारी से सटा हुआ है वहाँ विस्थापितों के साथ बैठक हुई।बैठक का आयोजन महान विस्थापित एवं श्रमिक संघ ने आयोजित किया था। बैठक में उपस्थित विस्थापित ने जो कुछ भी बताया वह इस आजाद भारत मे अंग्रेजी हुकूमत को माद कर देने वाली व्यथा - कथा की कहानी ने रोंगटे खड़े कर दिये।

फोटो:उर्जांचल टाइगर 
अंग्रेजी हुकूमत से भी क्रूर उत्पीड़न की कार्यवाही,निष्ठुर बिड़ला प्रबंधन ने जिले के प्रशासन व स्थानीय पुलिस को साध, ओ कहर इन निरीह बनवससियो जो अब परियोजना के विस्थापित कहे जाते है उन पर ढ़हवाया की कितने विस्थस्पित परिवार तबाह होगये। 

विस्थापित संघ के अध्यक्ष नारायण दास विष्वकर्मा के ऊपर तो दर्जनों मुकदमे लाद दिए गए।इतना ही नही बल्कि गुंडा और जिला बदर की कार्यवाही तक प्रबंधन के इशारे पर कर विस्थस्पित आंदोलन की कमर तोड़ दी गईं।भारतीय निजी उद्योगपतियों के क्रूरतम चेहरों में यह एक मिसाल है जिसे कोई भी कभी भी यहा पहुच देख सकता है।यहा बिड़ला प्रबंधन और उनके पाले हुए दलालों के ख़ौफ़ का आलम इस कदर है कि लोग चौबीसों घण्टे अनहोनी की आशंका से भयाक्रांत रहते है।

यशवंत सिंह नाम का विस्थापितों में है बेहद ख़ौफ!

महान परियोजना के विस्थापितो मे यशवंत सिंह नाम का इस कदर ख़ौफ़ है कि उसका नाम लेते ही वे ख़ौफ़जदा हो जाते है, उसने इस कदर पुलिसिया कहर इन विस्थापितो पर ढ़हवा और जुल्म ज्यादती की उसका नाम सुनते ही उनके रूह कांप जाते है। 



आपको बतादे यह यशवंत सिंह बिड़ला के महान कम्पनी का एक महानअधिकारी है।जिसका काम उतना ही उल्टा महानिकृष्ट है। यह यशवंत सिंह का बिभस्त क्रूर चेहरा है, जो विस्थापितों के सर पर भय का भूत बन के सवार है। इस अधिकारी के ,"शान औ शौक" तथा कारगुजारिओ के किस्से हर जुबान पर सुने जा सकते है।

"उद्वासित किसान मजदूर परिषद ने कहा"!

"उद्वासित किसान मजदूर परिषद" के राष्ट्रीय अध्यक्ष के सी शर्मा ने दौरे के बाद जारी उक्त रिपोर्ट सार्वजनिक करते हुए कहा है कि "हकीकत" इससे भी भयावह है।विस्थापितो के साथ बेहद नाइंसाफी की गई है।इनकी स्थिति बेहद चिंताजनक है।इनका शोषण, उत्पीड़न चरम पर है।विस्थापितो को फर्जी मुकदमे में बिड़ला प्रबंधन फसा कर क्रूरतम व्यहार करते हुए उन्हें ख़ौफजदा कर उद्योग चला रहा है।



दूसरी तरफ देश दुनिया मे में विस्थापितों के लिए तथा स्थानीय लोगो मे उनका जिवन स्तर बेहतर बनाने में कम्पनी के द्वारा महत्वपूर्ण भूमकी निभाने का डंका पिट कर बाह बही लूटते रहते है।परन्तु ज़मीनी हकीकत बिल्कुल ठीक उल्टी है।

संगठन इस "हकीकत" को देश दुनिया मे काम करने वाले सामाजिक संगठनों तथा सरकार के समच्छ रखा इनके चेहरे से नकाब उतारने के साथ संगठन इनके साथ हुए नाइंसाफी की लडाई लड़ इन्हें न्याय दिलाने का निर्णय लिया है।

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