त्रिदिवसीय अर्न्तराष्ट्रीय शास्त्रार्थ महाकुम्भ का प्रारम्भ।


अजीत नारायण सिंह 

सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय,वाराणसी के कुलपति प्रो0 राजाराम शुक्ल की अध्यक्षता में आज योग साधना केन्द्र में अर्न्तराष्ट्रीय शास्त्रार्थ सम्मेलन एवं संगोष्ठी का उद्घाटन किया गया।यह महोत्सव-भारतीय शिक्षण मण्डल, इण्डिक अकादमी एवं सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में हो रहा है।

संगोष्ठी के मुख्यातिथि सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति वी0 कुटुम्ब शास्त्री ने कहा कि आज की शिक्षा व्यवस्था केवल रोजी-रोटी के लिये है जिसमें ज्ञान प्राप्त करना उसके मूल में कम ही दिखाई देते है। चारों पुरूषार्थो की सिद्धी ‘‘अर्थ‘‘ से होती है जिसमें क्रमशः धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष किन्तु गुरूकुल की पद्धति संस्कृत में होती रही लेकिन आज मैकाले की शिक्षा पद्धति को स्वीकार करके अंग्रेजी को बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे संस्कृत पीछे हो रहा है। हम पाश्चात्य परम्परा के पोषक होते जा रहे है साथ ही भारतीय संस्कृति, संस्कार को पूर्णतः भूलते जा रहे है।

पूर्व कुलपति प्रो0 शास्त्री ने कहा कि गुरूकुल के परम्परा को पुनः स्थापित किया जाना अति आवश्यक है। इससे संस्कृत विद्या का प्रभाव बढ़ेगा तो भारतीय संस्कृति की बृद्धि होगी। प्राचीन गुरूकुल की मूल भावना हमारी संस्कृति, संस्कार और संस्कृत की भावना से प्रेरित है किन्तु वर्तमान शिक्षा पद्धति रोटी-रोजगार तक सीमित रह गया है। प्राचीन गुरूकुल पद्धति के मूल भावना के अनुसार शिक्षा, ज्ञान के लिये है लोक कल्याण के लिये है राष्ट्र चिन्तन के लिये है किन्तु वर्तमान शिक्षा प्रणाली से लोग संकुचित होते जा रहे है साथ लोग अपने बारे में ही सोचते है।

पूर्व कुलपति प्रो0 शास्त्री ने कहा कि हमारी गुरूकुल विद्या पॉच हजार वर्ष पुरानी विधा है इससे प्रभुत्व का निर्माण होता है और सत्मार्ग पर चलते हुये जीवन को मोक्ष प्राप्त होता है। आज की शिक्षा के साथ-साथ गुरूकुल के मूल सिद्धान्त को भी समिस्तृत करने की आवश्यकता है। इसी से जन-कल्याण एवं राष्ट्र कल्याण अविरल गति से चलता रहेगा।

विशिष्ट अतिथि के रूप में भूटान सरकार के राजगुरू पूज्य स्वामी विवेकानन्द सरस्वती ने कहा कि भारत तपस्वीयों, ऋषियों एवं मुनियों की तपोभूमि है यह भारतीयों के लिये गौरव की बात है। स्वामी जी ने भारत की महिमा भागवत में उद्धरण के माध्यम से शिक्षा जगत के सम्बन्ध में गुरूकुलों के प्रकल्पों के सम्बन्ध में चर्चा करते हुये कहे कि भारत से प्राचीन परम्परा एवं शास्त्रों में समाहित ज्ञान के माध्यम से समूचे विश्व को सम्बल एवं प्रकाश मिला। उन्होंने कहा कि मातृभक्ति, ईश्वर भक्ति, पितृ भक्ति, राष्ट्र भक्ति और गुरू भक्ति से ही हमारा जीवन सार्थक होगा। विद्या फलम् च असतः निवृत्तिः अर्थात विद्या के माध्यम से असत् से निवृत्ति होकर सत्य की ओर जाना।

स्वामी विवेकान्द जी ने कहा कि विद्या डिग्री के लिये नही बल्कि डिग्री विद्या के लिये होना चाहियें। विद्या के माध्यम से सत्य चरित्र का निर्माण उत्तम व्यक्तित्व का निर्माण एवं उत्तम संस्कार का विकास होता है। हमारे लोग गुरूकुल के पद्धति को भुलते जा रहे है आज इसके संरक्षण की आवश्यकता है।

सारस्वत अतिथि के रूप में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के आर्थिक सलाहकार के.वी.राजू ने कहा कि प्राचीन अर्थशास्त्र की मीमांसा पर आज भारत सरकार कार्य कर रही है इसके माध्यम से अर्थशास्त्र को और आगे बढ़ाना है। श्री राजू ने कहा कि गुरूकुल परम्परा को आगे बढ़ाने के लिये पुनः इस पर विचार करके संरक्षित करने की आवश्यकता है।

अध्यक्षता करते हुये कुलपति प्रो0 राजाराम शुक्ल ने कहा कि इस महाकुम्भ का आयोजन का उद्देश्य प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति एवं शास्त्रों की रक्षा करने के लिये किया जा रहा है जो सोये हुये है उन्हें जगाना है। कुलपति प्रो0 शुक्ल ने कहा कि उस समय पूर्व मैने विदेश में जाकर देखा कि वहॉ पर यहॉ के विद्यार्थी रहें लोग वहॉ गुरूकुल पद्धति से विद्यार्थियों को तैयार करते है साथ ही यह भी देखा कि भारतीय शिक्षा पद्धति को आगे बढा रहे है। आज सम्पूर्ण भाषाओं में संस्कृत की लोकप्रियता का याद दिलाने की जरूरत है। विज्ञान,प्रबन्धन शास्त्र एवं कम्प्यूटर को संस्कृत दर्पण के माध्यम से शोध करने की आवश्यकता है। आधुनिक शिक्षा को प्राच्य विद्या से जोड़कर चलने पर ही संस्कृत का विकास गति पकड़ेगा। आज विदेशों से संस्कृत पढ़ने के लिये इंजीनियर,डाक्टर एवं प्रबन्धन में दक्ष लोग आ रहे है। वे संस्कृत के व्याकरण अर्थशास्त्र आयुर्वेद आदि पर काम कर रहे है। यदि संस्कृत प्रणाली पर विशेष प्रयोग करे तो निश्चित ही चमत्कार होगा।

उस दौरान गुरूकुल समन्वय विभाग इंडिक अकादमी के निदेशक डॉ0 नागराज पातूरी ने भी अपने विचार व्यक्त किया। स्वागत भाषण प्रो0 रामकिशोर त्रिपाठी ने किया तथा संचालन डॉ0 ज्ञानेन्द्र ने किया। संगोष्ठी के प्रारम्भ में मंचस्थ अतिथियों द्वारा मॉ सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्जवलन किया गया तथा कुलपति प्रो0 राजाराम शुक्ल के द्वारा मंचस्थ अतिथियों का माल्यार्पण कर स्वागत किया।

उस दौरान प्रो0 हेतराम कछवाह, प्रो0 रामपूजन पाण्डेय, प्रो0कमलाकान्त शुक्ल, प्रो0 हरिशंकर पाण्डेय, डॉ0 दिनेश कुमार गर्ग, डॉ0 विजय कुमार पाण्डेय एवं अन्य लोग उपस्थित थे।

प्रातः 07.30 बजे विश्वविद्यालय के शताब्दी भवन में ब्रम्हश्री विश्वनाथ गोपाल कृष्ण शास्त्री की अध्यक्षता में अर्न्तराष्ट्रीय वाक्यार्थ/शास्त्रार्थ महाकुम्भ का प्रारम्भ वाग्गदेवी पूजन एवं गणेश पूजन के द्वारा किया गया। जिसमें संस्कृत के शास्त्रों में मर्मज्ञ विद्वानों का जमावड़ा लगा रहा। यहॉ के त्रिदिवसीय अर्न्तराष्ट्रीय शास्त्रार्थ सम्मेलन के प्रथम दिवस के प्रातः नेपाल, वर्मा, भूटान आदि देशों के विद्वान काशी सहित दक्षिण भारतीय पंडितों ने विभिन्न विषयों पर अपना-अपना तर्क प्रस्तुत करते हुये एक दुसरें को शास्त्र संमत चुनौतियॉ दिये। व्याकरण शास्त्र के दरभंगा से आये विद्वान गणेश्वर झा ने अटकुप्वांगनुमव्यवायेपि सूत्र पर अपने पक्ष को रखना। इनके सामने उपस्थित गोआ के आचार्य पं0 देवदत्त गोविन्द पाटिल (कुलगुरू श्री विद्या गुरूकुलम्, गोवा) ने भी शास्त्र के मतानुसार अपनी बातों को रखा। उन्होंने कहा कि शास्त्रार्थ कला एक प्राचीन कला है जिसके माध्यम से विभिन्न गुढ़ समस्यों का शास्त्र सम्मत समाधान किया जाता रहा है।

कुलपति प्रो0 राजाराम शुक्ल ने कहा कि शास्त्रों में निहीत शब्द लोकोपयोगी है जो कि शास्त्रार्थ के माध्यम से ही इसके गुढ़ रहस्य शोधित रूप में बाहर आयेगें।आज शास्त्र लुप्त हो रहे है इसी को पूर्नजीवित रखने के लिये शास्त्रार्थ परम्परा की शुरूआत हुई है। जिसमें विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े विद्वान अपने-अपने ढंग से विषयों के गुढ़ रहस्यों को बतायेंगे। यह विश्वविद्यालय प्राच्य विद्या का संरक्षण ऐसे विभिन्न माध्यमों से करते हुये अपने दायित्वों का निर्वहन कर रहा है।

पूर्व कुलपति प्रो0 वी0 कुटुम्ब शास्त्री ने कहा कि शास्त्र परम्परा का निर्वहन त्याग के भाव से ही सम्भव है।

उक्त सम्मेलन के दौरान व्याकरणा,न्याय,मीमांसा एवं वैशेशिक आदि विषयों पर शास्त्रार्थ हुआ। जिसमें मुख्य रूप से प्रो0 विशिष्ठ त्रिपाठी, डॉ0 नागराज पातुरी, प्रो0 रामकिशोर त्रिपाठी, प्रो0 रामपूजन पाण्डेय, कृष्ण जोशी, भूटान के राजगुरू स्वामी विवेकानन्द सरस्वती, ब्रम्हश्री मणि शास्त्री द्रविण, हरिराम भट्ट, डॉ0 पवन शुक्ला, ज्ञानेन्द्र सापकोटा आदि लोग उपस्थित थें।
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