तो क्या कोयला माफ़िया "शांत उर्जान्चल"को "बंगाल" बना देंगे !


के.सी.शर्मा
सिंगरौली।। इस समय सोसल मीडिया में एक "वीडियो" खूब वायरल हो रही है, जिसमे एक शख्स कोल ट्रांसपोर्टरों के द्वारा अनपरा थाने पर अपने मांगो के समर्थन में किए जारहे प्रदर्शन के दौरान एक गाड़ी पर खड़ा हो के प्रदर्शनकारियों को सम्बोधित करते हुए सीना तान के ललकार कर कह रहा है कि हम "शांत उर्जान्चल"को "बंगाल" बना देंगे-!
उसने यह भी घोषणा की है कि हमने एन सी एल के डाइरेक्टर को स्पष्ट चेतावनी दे दी है कि अगर ट्रकों के पहिये थमे तो हम डायरेक्टर को बंगले से बाल बच्चों सहित बाहर निकल देंगे और उन्हें जो सैलरी मिलती है उससे ट्रक आपरेटर अपने परिवार का परवरिश करेंगे।
इसी घोषणा के बाद से पिछले पांच दशको से शांत "सिंगरौली परिक्षेत्र" के "उर्जान्चल" की फिजा में भविष्य में अशांति के आहट के संकेत साफ साफ उभरते नजर आर हे है।

ट्रक ऑपरेटरों के आंदोलन से गूंजी यह आवाज भविष्य के उर्जान्चल का संकेत ही नही देरही है, बल्कि उर्जान्चल का आम जन भविष्य के "उर्जान्चल" की कल्पना कर अब ख़ौफ़ जदा हो उठा है। क्योकि यह तो सभी जानते है कि एन सी एल को मिली सुप्रीमकोर्ट द्वारा यह राहत फौरी राहत है।मुकदमा सर्बोच्च न्यायालय विचाराधीन आज नही कल फैसला आना ही है,फैसला क्या हो सकता है यह तो अभी भविष्य के गर्भ में है,पर यह तो इसीसे से समझा जासकता है कि एनसीएल ने न्यालय में साफ साफ कहा है कि हम "एनजीटी" की सभी गाइड लाइन को मानेंगे ,और सुरक्षा मानकों का ध्यान में रख कोल परिवहन करेंगे।

घावनुमा सड़कछाप मनबढों पर लगाम जरुरी!

तो अब सवाल उठता है कि "पब्लिक रोड" पर कोल ट्रांसपोर्ट को एनजीटी द्वारा प्रतिबंधित किये गए निर्णय के आलोक में ही जानकारों के अनुसार भबिष्य में न्यालय का फैसला आसकता है।

फिर सवाल उठता है? कि उन घोषणाओं का क्या होगा?,जो सिंगरौली परिक्षेत्र के वायुमंडल में बह रहा है कि इस क्षेत्र को बंगाल बना देंगे..., डाइरेक्टर को बंगले से बाहर निकाल...सैलरी... आदि का...?

यह तो तय है कि समय रहते एनसीएल प्रबंधन ने "एनजीटी" के गाईडलाईन के अनुसार वैकल्पिक व्यवस्था नही किया  तो देर सबेर ट्रकों के पहिये तो "पब्लिक रोड" पर थमनी ही है। इसी को लेकर कई अनुत्तरित सवाल उर्जान्चल वासियों के समक्ष खड़े हो गये है,जिसका जेहन में ख्याल आते ही लोग अभी से भविष्य के "उर्जान्चल" का आंकलन कर सहम जारहे है।

सोनभद्र जिले के अनपरा थाने के नाक पर से धमकी भरा यह ऐलान उ. प्र. पुलिस की छाती पर चढ़ "हड्डी पर कबड्डी" खेलने जैसा जानकारों को प्रतीत हो रहा है।यदि पुलिस और प्रशासन ने इसे गम्भीरता से अभी से नही लिया तो यह "घाव" आने वाले समय तक "नासूर" हो जाएगा, जिसका इलाज तब ऑपरेशन ही मात्र बचेगा...?तब तक बहुत देर हो चुकी होगी।


वही एनसीएल प्रबंधन ने खुलेआम सरेराह एक जन सभा मे "डाइरेक्टर" को मिली धमकी को यदि हल्के में लिया तो आने वाले वक्त में इसके परिणाम भयावह हो सकते है की सम्भावनाओ से इनकार नही किया जा सकता है।आवश्यकता है ऐसे मनबढे,सरहंग किस्म के आपराधिक विचारों में विश्वास करने वाले तत्वों को चिन्हित कर कम्पनी से बाहर का रास्ता दिखाए,वरना यदि बंगाल,धनबाद यह कोयलांचल बनता है तो उसके लिए प्रबंधन को ही लोग जिम्मेदार समझेंगे।जिसे सिंगरौली का इतिहास भी कभी माफ नही करेगा।

प्रशासन व एन सी एल प्रवंधन की भूमिका और कार्यवाही पर उर्जान्चल वासियों की नजरें टिकी हुई है।

ज्ञात हो कि सिंगरौली के मूल निवासी सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता अश्वनी दुबे के विगत 6 वर्ष पूर्व शुरू किए गए "सिंगरौली बचाओ आंदोलन" के संघर्ष ने अब अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया है।पूरे सिंगरौली परिक्षेत्र के औद्योगिक अंचल में बीते एक सप्ताह से भूचाल सा आगया था।कही गम तो कही खुशी का माहौल था।पिछले पांच दशक में पहली बार ऐसा देखने को मिल रहा कि सिंगरौली परिक्षेत्र के उर्जान्चल को चारागाह समझने वालों और आम उर्जान्चलवासियों की राहे अलग अलग हो गयी है।

उर्जान्चल में पूंजीवादी लोग आंदोलन की राह पर चल पड़े है तो उर्जान्चल के आम जन भी अधिबक्ता अश्वनी दूबे के पक्ष में तथा बढ़ते प्रदूषण के विरोध लामबन्द होना शुरू कर दिए है।बीते दो -तीन दिनों से सिंगरौली परिक्षेत्र में विभिन्न सामाजिक संगठनों व आम नागरिक अलग अलग बैठक और चर्चा करते देखे जा रहे है,जो स्थानीय समाचार पत्रों की खूब सुर्खियां बटोरे हुए है।

इस मामले में आग में "घी" डालने का काम तब हुवा जब पूंजीवादी शक्तियों एवं "कोल माफियाओं" के गुर्गों ने अधिवक्ता अश्वनी दूबे को खुलेआम "जान से मारने" की धमकी देने और आपत्ति जनक नारा लगाया जाने लगा और जिला प्रशासन को भी खुली चुनोउती यह कह के दिया जाने लगा कि सिंगरौली को भी बंगाल, धनवाद जैसा बना देंगे? तभी से उर्जान्चल का वायुमंडल तल्ख हो उठा है।इस विषय पर इस समय हर चट्टी चौराहे पर आम से खास की जुबान पर एक ही यही चर्चा व्याप्त है ।

बीते 1 जुलाई कल सुप्रीम कोर्ट में एक तरफ थे सिंगरौली के लाल समाजसेवी ,पर्यावरणविद, अधिबक्ता अश्वनी दूबे, तो दूसरी तरफ थे देश के नामी गिरामी दो दर्जन से अधिक, एनसीएल, कार्पोरेट घरानों,व सार्वजनिक प्रतिष्ठानों, भारत सरकार के अधिबक्ता, जहा देश के टॉप थ्री प्रदूषित शहरों में सुमार सिंगरौली के पर्यावरणीय भविष्य पर आए फैसले में फिलहाल एनसीएल को सशर्त फौरी राहत सुप्रीम कोर्ट से मिल गयी है, उन्हें फैसला आने तक कोल परिवहन पूर्वत करने की अनुमति मिल गयी है, पर यह सिर्फ तत्कालिक राहत है।

आपको बता दे कि सिंगरौली निवासी अधिवक्ता अश्वनी दूबे के कारण जहाँ सिंगरौली के जनता को अमूल्य लाभ हुआ एनजीटी के निर्णय से हुवा था, वहीँ उन लुटेरे नेताओं, कोल माफियाओं, पुलिस, प्रसाशन,प्रवंधन,जिला पंचायत के वैरियर ठीकेदारों, परिवहन विभाग, आदि को भारी नुकसान भी हुआ था, परन्तु सुप्रीम कोर्ट के फैसले से फिलहाल एक बार फिर उनकी चाँदी है और वे बल्ले कर रहे है, जनता मायूस और ठगी महसूस कर रही है, फिर भी मायूस नही है। नए सिरे से फिर अगले संघर्ष की तैयारी में जुट गई है।अब लोग सड़क से न्यालय तक एक साथ लड़ने का मन बनारहे है।

सवाल है "धमकी" और "विरोध"... ?

जो डंपरों से हर ट्रिप के पैसे लेते थे, उन मोटर मालिकों का नुकसान हो सकता है जो इसमें अपना करियर तलाश रहे थे और आमदनी होती थी,उन लुटेरी कंपनियों का नुकसान हो सकता है जो मुनाफा के लिए वातावरण में जहर घोल रहै है। उन बैरियर वालों का टोल वालों का नुकसान हो सकता है जो पैसे वसूल रहे है।

उन मोटर कंपनियों का नुकसान हो सकता है जहाँ से कोल परिवहन के लिए गाड़ियां खरीदी जाती है, उन पेट्रोल पम्प वालों का नुकसान हो सकता है जहाँ से डीजल लिया जाता है, उन वर्कशॉप वालों का नुकसान हो सकता है जहाँ गाड़ियां मरम्मत होती है।उन चालकों का नुकसान हो सकता है जो इन गाड़ियों को चलाते है। उन लेबरों का नुकसान हो सकता है जो इसमें काम करते है।उन कोयला चोरों का भी नुकसान हो सकता है जो कोयला चोरी करते है। उन दलालों का भी नुकसान हो सकता है जो प्रशासन में बैठ के कमीशन खाते है आदि आदि...?

जाहिर सी बात है हर वर्ग के लोगों को नुकसान हो सकतस है तो विरोध में नारे तो लगेंगे ही,जान से मारने की धमकी तो मिलनी ही है।आज ये सभी उक्त कथित उर्जान्चल को दीमक की तरह चाटने वाले एक साथ आकर अपने हितों को पूर्व की भांति साधने के लिए संगठित हो गए है।

और बेरोजगरी बढ़ने का संवेदनशील हवाला देते हुए अपने निजी हितों वाले मुठ्ठी भर के पूंजीपतियों के आंदोलन को जन आंदोलन बनाने में लगे हुए है।एकाद स्थानीय जनप्रतिनिधि,कुछेक कलमकारों की जमीर खरीद सुनियोजित तरीके से ट्रक ऑपरेटरों के निजी आंदोलन को कथित जनांदोलन बनाने का कुछ लोग असफल प्रयास कर रहे है।लेकिन ये सिंगरौली परिक्षेत्र की पब्लिक है, जो सब जानती है।
जनहित और सिंगरौली के माटी के प्रति प्यार के जज्बे ने इतने सारे एक साथ दुश्मन सिंगरौली के लाल अधिवक्ता अश्वनी दूबे ने खड़े कर लीये हैं।इस हिम्मत और हौसलेपूर्ण जज्बे के साथ कल वे सुप्रीम कोर्ट में निडर अडिग सिंगरौली का पक्ष रखने के लिए मजबूती से खड़े रहे ,को क्या सलाम नही करना चाहिए?
मेरा तो इस निडर,साहसी,अपने कर्तव्य पथ पर अडिग, सिंगरौली के सासों में घुल रहे जहर से जान बचाने के लिए अपने जान को जोखिम में डाल लाखो लोगो को जीवनदान दिलाने के लिए अपने जान की बाजी लगा कृतसंकल्पित जज्बे को दिल से है सलाम!

इसी का परिणाम है कि अधिवक्ता अश्वनी के संघर्षों ने जब अपना असर दिखाना शुरू किया तो सिंगरौली की प्रकृति आज खुल कर लंबी सांस ले रही थी ,जिसे एक सप्ताह में सिंगरौली की जनता ने भी देख समझ लिया। जिसे एक बार फिर न्यालय के फैसले ने प्रदुषण की अपनी बेड़ियों में जकड के रखा दिया है।इस बेड़ी को तोड़ने के लिए अब समय की मांग है कि सिंगरौली की जनता सड़क पर उतर हुंकार भरे।


कल उस माँ को न्याय मिल था, जिसने अपने लाल को इन दानव रूपी डंपरों के चपेट में खोया था।कल उस बाप को न्याय मिल था जिसने अपना वारिस खोया था।उन बच्चों को न्याय मिल था जिसने अपने पिता को खोया था।

आज उसी न्याय दिलाने वाले के खिलाफ सारे पूंजीपति, कोल माफिया,कारपोरेट घराने ,सरकार, सार्वजनिक प्रतिष्ठान का प्रबंधन, आदि सबके सब अधिवक्ता अश्वनी के खिलाफ खड़े हैं।इस लिए यह समय की मांग है कि सब स्वार्थ त्याग कर के जनता को निःस्वार्थ, प्रकृति के लाल अश्वनी जी के समर्थन में खड़ा होना चाहिए।आखिर उन्होंने ये सब सिंगरौली के लिए ही किया है नहीं तो उनके पास खरबों के चपत लगाने से बचने के लिए कई अवसर मिले होंगे।

सड़क मार्ग से होता है प्रतिदिन 50 हजार टन से अधिक कोयले का परिवहन,चलते है सड़क पर हजारो ट्रक-!

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद एनजीटी की ओवर साइट कमेंटी द्वारा एनसीएल की खदानों से सड़क मार्ग द्वारा कोल परिवहन पर पूर्णता रोक लगा दी गई थी, जिसके बाद से ही हजारों की तादाद में ट्रक मालिक, ड्राइवर मैकेनिक व इस व्यवसाय से जुड़े लोगों पर बेरोजगारी के बादल मंडराने लगे थे। वहीं एनसीएल प्रबंधन द्वारा 2 खदानों से सड़क मार्ग द्वारा कोल परिवहन जारी रखने के विरोध में सिंगरौली मोटर एसोसिएशन लामबंद होकर बीते 6 दिनों से धरना प्रदर्शन कर रहे था।

गौरतलब है की एनसीएल की खदानों से प्रतिदिन करीब पौने दो लाख टर्न कोयले का उत्पादन किया जाता है। जिसमें से करीब 80 हजार टन कोयले का डिस्पैच सड़क मार्ग द्वारा होता है, जो बीते 6 दिनों से प्रभावित है।

अतः इस कारण कोल ट्रांसपोर्टरों से लेकर एनसीएल व उससे जुड़े बिजली घरों पर चिंता के बादल मंडरा रहे थे और सबकी निगाहें अब कल के सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर टिकीं थी। जिसमे उन्हें फौरी राहत मिल गयी है।इस मामले में प्रशासन भी सतर्कता बरते हुए था क्योंकि एनजीटी की "ओवर साइट कमेटी" द्वारा सिंगरौली व सोनभद्र जिलाधिकारी को यह सीधे निर्देश दिए गए थे की सड़क मार्ग द्वारा कोल परिवहन करते किसी भी वाहन की जानकारी होते ही सीज़ करें।साथ ही कमेटी द्वारा एनसीएल को यह निर्देशित किया गया था कि अपने सभी खदानों के एग्जिट पॉइंट पर सीसीटीवी कैमरे लगाकर निगरानी करें।


सिंगरौली विधायक रामलल्लू वैश्य ने दिया था आश्वासन
कोल ट्रांसपोर्टर के समर्थन में आए सिंगरौली विधायक रामलल्लू वैश्य ने ट्रांसपोर्टरों की तरफ से एनसीएल निदेशकों से बीती दिनों बात कर यह भरोसा जताया था की उच्चतम न्यायालय द्वारा एनसीएल प्रबंधन के पक्ष में फैसला आएगा और आगामी 2 जुलाई से कोल ट्रांसपोर्टेशन पुनः शुरू हो जाएगा।हालांकि प्रबंधन और विधायक भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर निर्भर थे और कोर्ट से राहत की उम्मीद लगाए बैठे थे। जो उनके अनुमान के अनुसार ही आया और एनसीएल को फौरी तौर पर राहत मिल गई।जिसे ट्रांसपोर्टर अपनी जीत बता जश्न मना रहे है,जबकि मामला न्यायालय में अभी विचारधीन है।

अधिवक्ता के पक्ष और विरोध में लग रहे नारे-!

इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट में परिवाद दाखिल करने वाले सिंगरौली निवासी सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता अश्वनी दुबे के विरोध में जहां सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक नारे लग रहे हैं। लोग अधिवक्ता अश्वनी दुबे के विरोध में सड़क पर नारे लगा रहे हैं तो वही सोशल मीडिया में भी उन्हें ट्रोल किया जा रहा है।

वहीं प्रदूषण और दुर्घटना से निजात पाकर सिंगरौली की तमाम जनता व तमाम सामाजिक संगठन, विस्थापित संगठन, उनके पक्ष में आ खड़े हुए है।बीते तीन दिन से उर्जान्चल में उनके समर्थन में बैठकों का देर रात तक अलग अलग जगहों पर सिलसिला कल तक जारी रहा।

इन बैठकों में अधिवक्ता अश्वनी दूबे को जान से मारने की धमकी और आपत्तिजन नारो को लेकर लोगो मे गहरी नाराजगी दिखी, जीसका सामाजिक संगठनों ने कड़े शव्दों में निंदा करते हुए आक्रोश का भी इजहार किया है। तथा आगे संघर्ष जारी रखने पर जोर दिया है और शासन व जिला प्रशासन से अधिवक्ता की सुरक्षा किये जाने की मांग की है।

क्या है सुप्रीम कोर्ट का फैसला-!

सुप्रीम कोर्ट में एनसीएल Vs. अश्वनी कुमार दुबे की याचिका जिसमें एक साल के अंदर रेलवे से कोयला परिवहन करने के लिए रेलवे लाइन का कार्य पूर्ण करने व अलग सड़क निर्माण त्वरित करने के प्रेयर पर लोगों की सुरक्षा, नियमों के अनुसार कुछ महीनों के लिए परिवहन की अनुमति दी है।

सार्वजनिक सड़कों पर कोयला परिवहन से मौत और प्रदूषण पर हर हाल में अंकुश लगाया जायेगा। - अश्वनी दुबे

ज्ञात हो कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को एनसीएल की याचिका पर बीते 22अप्रैल को दिये गये स्टेट्स को,ऐज आप टूडे,को स्पष्ट करते हुए फिलहाल सड़क से कोयला परिवहन को अनुमति प्रदान की है।यह जानकारी सुप्रीमकोर्ट के अधिवक्ता अश्वनी दूबे ने दी है।

उन्होंने बताया कि एनसीएल ने स्वयं ही अपनी याचिका में सड़क परिवहन के दौरान एनजीटी के दिशा-निर्देश का कड़ाई से अनुपालन करने तथा निर्धारित समय सीमा तक ही कोयला सड़क परिवहन करने देने के लिए प्रार्थाना की है।श्री दुबे ने कहा है कि उल्लंघन करने पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय में यह मामला पुरजोर ढंग से रखा जायेगा।
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